संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
८ - शब्द संग्रह
ऊसर खेत कै कुसा मँगाये, चाँचुर चवर१ कै पानी ।
जीवत ब्रह्म को कोई न पूजै, मुरदा कै मिहमानी ॥३॥
सिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, सेस सहस मुख होई ।
जो जो जन्म लियो बसुधा२ में, थिर न रह्यो है कोई॥४
पाप पुन्य हैं जन्म संघाती, समुझि देख नर लोई ।
कहत कबीर अभि अंतर की गति, जानत बिरला कोई ॥५॥
(१०)
उपजै निपजै निपजि समाई, नैनन देखि चल्योजगजा। १
लाज न मरो कहो घर मेरा, अंत की बार नहीं कछु तेरा ॥२
अनेक जतन करि काया पालो, मरती बेर अगिन सँग जाली३
चोवा चंदन मरदन अंगा, सो तन जरै काठ के संगा ॥४॥
कहत कबीर सुनो रे गुनिया, बिनसै रूप देखैगी दुनियाँ ॥५॥
(११)
यही घड़ी यह बेला साधो ॥ टेक ॥
लाख खरच फिर हाथ न आवै, मानुष जनम सुहेला ॥१॥
ना कोइ संगी ना कोइ साथी, जाता हंस अकेला ॥२॥
क्यों सोया उठि जागु सबेरे, काल मारँदा सेला३ ॥३॥
कहत कबीर गुरू गुन गावो, झूठा है सब मेला ॥४॥
(१)
हटरी छोड़ि चल' बनिजारा ॥ टेक ॥
इस हटरी बिच मानिक मोती, कोइ बिरला परखनहारा ॥१
इस हटरी के नौ दरवाजे, दसवाँ ठाकुरद्वारा ॥ २ ॥
निकसि गइ थंभी ढहि परा मन्दिर, रलि गया चिक्कड़ गारा ३
कहत कबीर सुनो भइ साधो, झूठा जगत पसारा ॥ ४ ॥
(१) परती ज़मीन की छिछुली तलैया । (२) पृथ्वी । (३) तलवार ।
कबीर साहिब ६
(१३)
होली
आई गवनवाँ की सारी, उमिरि अबहीँ मोरी वारी ॥टेक॥
साज समाज पिया लै आये, और कहरिया चारी ।
वम्हना बेदरदी अचरा पकरि कै, जोरत गँठिया हमारी ।
सखी सब पारत गारी ॥ १ ॥
विधि¹ गति वाम कछु समझ परत ना, वैरी भई महतारी ।
रोय रोय अँखियाँ मोर पोंछत, घरवाँ से देत निकारी ।
भई सब का हम भारी ॥ २ ॥
गवन कराय पिया लै चाले, इत उत बाट निहारी ।
छूटत गाँव नगर से नाता, छूटै महल अटारी ।
करम गति टरै न टारी ॥ ३ ॥
नदिया किनारे बलम मोर रसिया, दीन्ह घुँघट पट टारी ।
थरथराय तन काँपन लागे, काहू न देख हमारी ।
पिया लै आये गोहारी ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, यह पद लेहु विचारी ।
अब के गौना बहुरि नहिँ औना, करिले भेंट अँकवारी ।
एक बेर मिलि ले प्यारी ॥ ५ ॥
॥ लय ॥
जो कोइ या बिधि मन को लगावै, मन के लगाये प्रभु पावै१
जैसे नटवा चढ़त बाँस पर, ढोलिया ढोल बजावै ।
अपना बोझ धरै सिर ऊपर, सुरति बरत² पर लावै ॥२॥
जैसे भुवंगम³ चरत बनहिँ मैं, ओस चाटने आवै ।
कभी चाटै कभी मनि तन चितवै, मनि तजि प्रान गँवावै॥३
(१) ब्रह्मा । (२) डोरी । (३) साँप ।
१० शब्द संग्रह
जैसे कामिनि भरे कूप जल, कर छोड़े बतरावै¹।
अपना रँग सखियन सँग राचै, सुरति गगर पर लावै ॥४॥
जैसे, सती चढ़ी सर² ऊपर, अपनी काया जरावै।
मातु पिता सब कुटुंब तियागै, सुरति पिया पर लावै ॥५॥
धूप दीप नैबेद अरगजा, ज्ञान की आरत लावै।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, फेर जनम नहिँ पावै ॥६॥
॥ विरह ॥
(१)
बालम आओ हमारे गेह रे, तुम बिन दुखिया देह रे॥टे० ।
सब कोइ कहै तुम्हारी नारी, मो को यह संदेह रे।
एकमेक ह्वै सेज न सोवै, तब लगि कैसा सनेह रे ॥ १ ॥
अन्न न भावै नींद न आवै, गृह बन धरै न धीर रे।
ज्यौँ कामी को कामिनि प्यारी, ज्यौँ प्यासे को नीर रे ॥२
है कोइ ऐसा परउपकारी, पिय से कहै सुनाय रे।
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे ॥३
(२)
प्रीति लगी तुम नाम की, पल बिसरै नाहीं।
नजर करो अब मिहर की, मोहिँ मिलौ गुसाईँ ॥ १॥
बिरह सतावै मोहिँ को, जिव तड़पै मेरा।
तुम देखन की चाव है, प्रभु मिलौ सबेरा ॥ २ ॥
नैना तरसै दरस को, पल पलक न लागै।
दर्दवंद दीदार का, निसि बासर जागै ॥ ३ ॥
जो अब के प्रीतम मिलैँ, करूँ निमिख³ न न्यारा।
अब कबीर गुरु पाइया, मिला प्रान पियारा ॥ ४ ॥
(१) बात करती है। (२) आग, चिता। (३) छिन भर।
कबीर साहिब ११
(३)
मिलना कठिन है, कैसे मिलौंगी पिय जाय ॥टेक॥
समझि सोचि पग धरौं जतन से, बार बार डिग जाय ।
ऊँची गैल राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय ॥१॥
लोक लाज कुल की मरजादा, देखत मन सकुचाय ।
नैहर वास बसौं पीहर मैं, लाज तजी नहिं जाय ॥२॥
अधर भूमि जहँ महल पिया का, हम पै चढ़ो न जाय ।
धन भइ बारी पुरुप भये भोला, सुरत झकोला खाय ॥३॥
दूतो सतगुरु मिले बीच मैं, दीन्हो भेद बताय ।
दास कबीर पिया से भेंटे, सीतल कंठ लगाय ॥४॥
(४)
कौन मिलावै मोहिँ जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय ॥टेक॥
हौँ१ हिरनी पिय पारधी२ हो, मारे सबद के बान ।
जाहि लगो सो जानही हो, और दरद नहिँ जान ॥१॥
मैं प्यासी हौँ पीव की हो, रटत सदा पिव पीव ।
पिया मिले तो जीव है, ना तो सहजै त्यागौँ जीव ॥२॥
पिय कारन पियरी भई हो, लोग कहै तन रोग ।
छः छः लंघन मैं करौं रे, पिया मिलन के जोग ॥३॥
कह कबीर सुन जोगिनी हो, तन मैं मनहिँ मिलाय ।
तुम्हरी प्रीति के कारने हो, बहुरि मिलैंगे आय ॥४॥
(५)
होली
ये अँखियाँ अलसानी हो, पिय सेज चलो ॥ टेक ॥
खंभ पकरि पतंग अस डोलै, बोलै मधुरी बानी ॥१॥
फूलन सेज बिछाय जो राख्यो, पिया बिना कुम्हिलानी ॥२॥
(१) मैं । (२) शिकारी ।
१२ शब्द संग्रह
धीरे पाँव धरौ पलँगा पर, जागत ननद जिठानी ॥३॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, लोक लाज बिलछाती१ ॥४॥
(६)
होली
नैहरवा हम काँ नहिँ भावै ॥ टेक ॥
साँईँ की नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोइ जाय न आवै ।
चाँद सुरज जहाँ पवन न पानी, को सँदेस पहुँचावै,
दरद यह साईँ को सुनावै ॥ १ ॥
आगे चलौँ पंथ नहिँ सूझै, पीछे दोष लगावै ।
केहि बिधि ससुरे जावँ मोरी सजनी, बिरहा जोर जनावै,
बिषै रस नाच नचावै ॥ २ ॥
बिन सतगुरु अपनो नहिँ कोई, जो यह राह बतावै ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपने न प्रीतम पावै,
तपन यह जिय की बुझावै ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
बहुत दिनन मैँ प्रीतम आये, भाग भले घर बैठे पाये ॥१॥
मंगलचार महा मन राखो, नाम रसायन रसना२ चांखो ॥२॥
मंदिर महा भयो उँजियारा, लै सूती अपनो पिय प्यारा ॥३
मैं निरास जो नौनिधि पाई, कहा करौँ पिय तुम्हरी बड़ाई४
कहतकबीरमैं कछुन हिँकीन्हा, सहज सुहाग पिया मोहिँ दीन्हा ॥५
(२)
घूँघट का पट खोल रे, तो को पीव मिलैँगे ॥टेक
घट घट में वोहि साईँ रमता, कटुक बचन मत बोल रे(तो को०
धन जोबन का गर्ब न कीजे, झूठा पचरँग चोल रे(तो को०) ॥
(१) छोड़ी । (२) जीभ ।
कबीर साहिब १३
सुन्न महल मैं दियना बारिले, आसा से मत डोल रे (तो को०) ॥३
भोग जुगत से रंग महल मैं, पिय पाये अनमोल रे (तो को०) ॥४
कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे (तो को०) ॥५॥
(३)
मैं तौ वा दिन फागमचैहौं, जा दिन पिया मोरे द्वारे ऐहैं ॥टेक॥
रंग वही रँगरेजवा वाही, सुरँग चुनरिया रँगैहौं ॥१॥
जोगिन होइ के बन बन ढूँढ़ौं, वाही नगर मैं रहिहौं ॥२॥
बालपना गल सेलिह बनैहौं, अंग भभूत लगैहौं ॥३॥
कह कबीर पिये द्वारे ऐहैं, केसर माथ रँगैहौं ॥४॥
(४)
पिया मेरा जागै मैं कैसे सोई री ॥ टेक ॥
पाँच सखी मेरे सँग की सहेली,
उन रँग रँगी पिया रँग न मिली री ॥ १ ॥
सास सयानी ननद दीरानी,
उन डर डरी पिय सार न जानी री ॥ २ ॥
द्वादस ऊपर सेज बिछानी,
चढ़ न सकौं मारी लाज लजानी री ॥ ३ ॥
रात दिवस मोहिं कूका मारै,
मैं न सुना रचि रही सँग जार री ॥ ४ ॥
कह कबीर सुनु सखी सयानी,
बिन सतगुरु पिय मिले न मिलानो री ॥ ५ ॥
(५)
खंजरि लगि गये बान सुरंगी हो ॥ टेक ॥
फूल सतगुरु उपदेस दियो है, होइ गयो चित्त बिरंगी हो ॥१
आन पुरुष की बनी है तिरिया, घायल पाँचो संगी हो ॥२
१४ शब्द संग्रह
घायल की गति घायल जानै, क्या जानै जाति पतंगी हो ॥३॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, निसि दिन प्रेम उमंगी हो ॥४॥
(६)
हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ।
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥१॥
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर बदर फिरते ।
हमारा यार है हम मैं, हमन को इन्तिजारी क्या ॥२॥
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है ।
हमन गुरु नाम साचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ॥३॥
न पल बिछुड़ पिया हम से, न हम बिछुड़ैं पियारे से ।
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ॥४॥
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से ।
जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ॥५॥
(७)
मन लागो मेरो यार फकीरी मैं ॥ टेक ॥
जो सुख पावो नाम भजन मैं, सो सुख नाहिं अमीरी मैं ॥१
भला बुरा सब को सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी मैं ॥२॥
प्रेम नगर मैं रहनि हमारी, भलि बनि आई सबूरी मैं ॥३॥
हाथ मैं कूँड़ी बगल मैं सोंटा, चारो दिसि जागीरी मैं ॥४॥
आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहा फिरत मगरूरी मैं ॥५
कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिलै सबूरी मैं ॥६॥
(८)
साधो सहज समाधि भली ।
गुरु प्रताप जा दिन से जागो, दिन दिन अधिक चली ॥१
जहँ जहँ डोलौं सो परिकरमा, जो कछु करौं सो सेवा ।
जब सोवौं तब करौं दंडवत, पूजौँ और न देवा ॥२॥
कबीर साहिब १५
कहौँ सो नाम सुनौँ सो सुमिरन, खावँ पियौँ सो पूजा ।
गिरह उजाड़ एक सम लेखौँ, भाव मिटावौँ दूजा ॥३॥
आँख न मूँदौँ कान न रूँधौँ, तनिक कष्ट नहिँ धारौँ ।
खुले नैन पहिचानौँ हँसि हँसि, सुंदर रूप निहारौँ ॥४॥
शबद निरन्तर से मन लागा, मलिन वासना त्यागी ।
ऊठत बैठत कबहुँ न छूटै, ऐसी तारी लागी ॥ ५ ॥
कह कबीर यह उनमुनि रहनी, सो परगट करि गाई ।
दुख सुख से कोइ परे परम पद, तेहि पद रहा समाई ॥६
(९)
गुरू ने मोहिँ दीन्ही अजब जड़ी ॥ टेक ॥
सोई जड़ी मोहिँ प्यारी लगतु है, अमृत रसन भरी ॥१॥
काया नगर अजब इक बँगला, ता मैं गुप्त घरी ॥ २ ॥
पाँचो नाग पच्चीसो नागिन, सूँघत तुरत मरी ॥ ३ ॥
या कारे ने सब जग खायो, सतगुरु देख डरी ॥ ४ ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, लै परिवार तरी ॥ ५ ॥
(१०)
होली
ऋतु फागुन नियरानी, कोइ पिया से मिलावै ॥ टेक ॥
सोइ तो सुंदर जाको पियको ध्यान है, सोइ पियके मनमानी।
खेलत फाग अंग नहिँ मोड़ै, सतगुरु से लिपटानी ॥१॥
इक इक सखियाँ खेल घर पहुँचीँ, इक इक कुल अरुझानी।
इक इक नाम बिना बहकानी, हो रहि ऐँचा तानी ॥२॥
पिय को रूप कहाँ लग बरनौँ, रूपहि माहिँ समानी ।
जो रँग रँगे सकल छवि छाके, तन मन सभी भुलानी ॥३॥
यौँ मत जाने यहि रे फाग है, यह कछु अकथ कहानी ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह गति बिरले जानी ॥४॥
१६ शब्द संग्रह
(१)
॥ बिनय ॥
(चौपाई)
दरसन, दीजे नाम सनेहो । तुम बिन दुख पावै मेरी देही ॥
(छंद)
दुखित तुम बिन रटत निसि दिन, प्रगट दरसन दीजिये ।
बिनती सुन प्रिय स्वामियाँ, बलि जाउँ विलंब न कीजिये ॥१॥
(चौपाई)
अन्न न भावै नींद न आवै । बार बार मोहिँ बिरह सतावै ॥
(छंद)
बिबिध बिधि हम भईँ ब्याकुल, बिन देखे जिव ना रहै ।
तपत तन जिव उठत झाला, कठिन दुख अब को सहै ॥२
(चौपाई)
नैनन चलत सजल जलधारा । निसिदिन पंथ निहारौँ तुम्हारा ॥
(छंद)
गुन औगुन अपराध छिमा करि, औगन कछु न बिचारिये ।
पतित-पावन राखु परमति१, अपना पन न बिसारिये ॥३॥
(चौपाई)
गृह आँगन मोहिँ कछु न सुहाई, बज्र भई और फिरयो न जाई ॥
(छंद)
नैन अरि भरि रहे निरखत, निमिख नेह न तुड़ाइये ।
बाँह दीजे बंदी-छेड़ा, अब के बंद छुड़ाइये ॥४॥
(चौपाई)
मीन मरै जैसे बिन नीरा । ऐसे तुम बिन दुखित सरीरा ॥
(छंद)
दास कबीर यह करत बिनती, महा पुरुष अब मानिये ।
दया कीजे दरस दीजे, अपना करि मोहिँ जानिये ॥५॥
(१) उच्च मत या भाव ।
कबीर साहिब १७
(२)
दरमाँदे ठाढ़े दरबार ॥टेक॥
तुम बिन सुरत करै को मेरी, दरसन दीजै खोलि किवार ॥१॥
तुम हौ धनी उदार दयालू, श्रवनन सुनियत सुजस तुम्हारा॥२
माँगाँ कौन रंक सब देखौँ, तुम्हहीं तैं मेरो निस्तार ॥३॥
जैदेव नामा विप्र सुदामा१, तिन पर किरपा भई अपार ॥४
कह कबीर तुम समरथ दाता, चार पदारथ देत न बार ॥५॥
॥ साधु ॥
नारद साध से अंतर नाहीं।
जो कोइ साध से अंतर राखै, सो नर नरकै जाहीं ॥१॥
जागै साध तो मैं हूँ जागूँ, सोवै साध तो सोऊँ।
जो कोइ मेरे साध दुखावै, जरा मूल से खोऊँ ॥२॥
जहाँ साध मेरो जस गावै, तहाँ करूँ मैं बासा।
साध चलै आगे उठ धाऊँ, मोहिँ साध की आसा ॥३॥
माया मेरी अर्ध-सरीरी, औ भक्तन की दासी।
अठसठ तीरथ साध के चरनन, कोटि गया औ कासी ॥४
अंतरध्यान नाम निज केरा, जिन भजिया तिन पाई।
कहत कबीर साध की महिमा, हरि अपने मुख गाई ॥५॥
॥ सार गहनी ॥
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै ॥ टेक ॥
हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार वार वा को क्यों खोलै ॥१
हलकी थी जब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै ॥२
सुरत कलारी भइ मतवारी, मदवा पी गइ बिन तोले ॥३॥
हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोलै ॥४॥
(१) जैदेव और नामदेव परम भक्त और सुदामा श्रीकृष्ण के सहपाठी महा
दरिद्र थे जिन की गाढ़ में भारी सहायता हुई ।
३
१८ शब्द संग्रह
तेरा साहिब है घट माहीं, बाहर नैना क्याँ खोलै ॥५॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिल गये तिल ओले१॥६
॥ सतसंग ॥
मैं तो आन पड़ी चोरन के नगर, सतसंग बिना जिय तरसे॥१
इस सतसँग मैं लाभ बहुत है, तुरत मिलावै गुरु से ॥२॥
मूरख जन कोई सार न जानै, सतसँग मैं अमृत बरसे ॥३॥
सबद सा हीरा पटकि हाथ से, मुट्ठी भरी कंकर से ॥४॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सुरत करो वहि घर से ॥
॥ भेद बानी ॥
(१)
सार सबद गहि बाचिहौ२, मानौ इतबारा ॥ १॥
सत्त पुरुष अच्छै बिरिछ, निरंजन डारा ॥ २॥
तीन देव साखा भये, पाती संसारा ॥ ३॥
ब्रह्मा बेद सही किया, सिव जोग पसारा ॥ ४॥
ब्रिसनु माया परगट किया, उरले३ ब्योहारा ॥ ५॥
तिरदेवा ब्याधा४ भये, लिये बिष का चारा ॥ ६॥
कर्म की बंसी डारि के, फाँसा संसारा ॥ ७॥
जोति सरूपी हाकिमा, जिन अमल पसारा ॥ ८॥
तीन लोक दसहूँ दिसा, जम रोके द्वारा ॥ ९॥
अमल मिटावौं ताहि का, पठवौं भव पारा ॥१०॥
कह कबीर अम्मर करौं, जो होय हमारा ॥११॥
(२)
अहरम होय सो जानै साधो, ऐसा देस हमारा ॥टेक॥
बेद कतेब पार नहिँ पावत, कहन सुनन से न्यारा ।
जाति बरन कुल किरिया नाहीं, संध्या नेम अचारा ॥१॥
(१) ओट । (२) बचोगे । (३) इधर का अर्थात पिंड देश का । (४) चिड़ीमार ।
कबीर साहिब १९
बिन जल बूँद परत जहँ झारी, नहिँ मीठा नहिँ खारा ।
सुन्न-महल में नौबत बाजै, किंगरी बीन सितारा ॥२॥
बिन बादर जहँ बिजुरी चमकै, बिन सूरज उँजियारा ।
बिना सीप जहँ मोती उपजै, बिन सुर सबद उचारा ॥३॥
जोति लजाय ब्रह्म जहँ दरसै, आगे अगम- अपारा ।
कह कबीर वहँ रहनि हमारी, बूझै गुरुमुख प्यारा ॥४॥
(३)
रेख़ता
गंग औ जमुन के घाट को खोजि ले,
भँवर गुंजार तहँ करत भाई ।
सरसुती नीर तहँ देखु निर्मल बहै,
तासु के नीर पिये प्यास जाई ॥ १ ॥
पाँच की प्यास तहँ देखि पूरी भई,
तीन की ताप तहँ लगै नाहीं ।
कहै कब्बीर यह अगम का खेल है,
गैब का चाँदना देख माहीं ॥ २ ॥
(४)
रेख़ता
करत कलोल दरियाव के बीच में,
ब्रह्म की छौल मेँ हंस झूलै ।
अर्ध औ उर्ध की पैँग बाढ़ी तहाँ,
पलटि मन पवन को कँवल फूलै ॥ १ ॥
गगन गरजै तहाँ सदा पावस झरै,
होत झनकार नित बजत तूरा ।
बेद कत्तेब की गम्म नाहीं तहाँ,
कहै कब्बीर कोइ रमै सूरा ॥ २ ॥
२० शब्द संग्रह
॥ उपदेश ॥
(१)
छाड़ि दे मन बौरा डगमग ॥ टेक ॥
अब तो जरे मरे बनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधोरा :
प्रीत प्रतीत करो दृढ़ गुरु की, सुने सबद् घनघोरा ॥१॥
होइ निसंक मगन ह्वै नाचै, लोभ मोह भ्रम छाड़ै ।
सूरा कहा मरन से डरपै, सती न संचय भाँड़े ॥ २ ॥
लोक लाज कुल की मरजादा, यही गले में फाँसी ।
आगे ह्वै पग पाछे धरिहौ, होय जक्त में हाँसी ॥३॥
अगिन जरे ना सती कहावै, रन जूझै नहिँ सूरा ।
बिरह अगिन अंतर में जारै, तब पावै पद पूरा ॥ ४ ॥
यह संसार सकल जग मैला, नाम गहे तेहि सूचा ।
कहै कबीर भक्ति मत छोड़ो, गिरत परत चढ़ ऊँचा ॥५॥
(२)
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हम को भावै ॥टेक॥
घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिँ जावै ।
बन के गये कलपना उपजै, तब धौँ कहाँ समावै ॥१॥
घर में जुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरु अलख लखावै ।
सहज सुन्न में रहै समाना, सहज समाधि लगावै ॥ २ ॥
उनमुनि रहै ब्रह्म को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै ।
सुरत निरत से मेला हरिके, अनहद नाद बजावै ॥३॥
घर में बसत बस्तु भी घर है, घर ही बस्तु मिलावै ।
कहै कबीर सुनो हो अवधू, ज्यौँ का त्यौँ ठहरावै ॥४॥
(३)
भजि ले सिरजनहार, सुघर तन पांय के ॥ टेक ॥
काहे रहौ अचेत, कहाँ यह औसर पैहौ ।
फिर नहिँ ऐसी दैह, बहुरि पाछे पछितैहौ ॥
(१) चरतन ।
कबीर साहिब २१
लख चौरासी जोनि मैं, मानुष जन्म अनूप।
ताहि पाय नर चेतत नाहीं, कहा रंक कहा भूप ॥ १ ॥
गर्भ वास मैं रह्यो, कह्यो मैं भजिहौँ तोहीं।
निस दिन सुमिरौँ नाम, कष्ट से काढ़ौ मोहीं ॥
चरनन ध्यान लगाइ के, रहौँ नाम लै लाय।
तनिक न तोहि बिसारिहौँ, यह तन रहै कि जाय ॥ २ ॥
इतना कियो करार, काढ़ि गुरु बाहर कीन्हा।
भूलि गयौ वह बात, भयौ माया आधीना ॥
भूली बातें उद्र की, आन पड़ी सुधि एत।
बारह बरस बीति गे या विधि, खेलत फिरत अचेत ॥३॥
बिषया बान समान, दँह जोवन मद माती।
चलत निहारत छाँह, तमक के बोलत बाती ॥
चोवा चंदन लाइ के, पहिरे बसन रँगाय।
गलियाँ गलियाँ झाँकी मारै, पर तिरिया लख मुसकाय ॥४
तरुनापन गइ बीत, बुढ़ापा आनि तुलाने।
काँपन लागे सीस, चलत दोउ चरन पिराने ॥
नैन नासिका चूवन लागे, मुख तैँ आवत बास।
कफ पित कंठै घेर लियो है, छुटि गइ घर की आस ॥५॥
मातु पिता सुत.नारि, कहौ का के सँग जाई।
तन धन घर औ काम धाम, सबही छुटि जाई ॥
आखिर काल घसीटिहै, पड़िहै। जम के फन्द।
बिन सतगुरु नहिँ बाचिहै।, समुझ देख मति मन्द ॥६॥
सुफल होत यह देंह, नेह सतगुरु से कीजै।
मुक्ती मारग जानि, चरन सतगुरु चित दीजै ॥
नाम गहै। निरभय रहा, तनिक न व्यापै पीर।
यह लीला है मुक्ति की, गावत दास कबीर ॥७॥
(४)
करो जतन सखि साईँ मिलन की ॥ टेक ॥
गुड़िया गुड़वा सूप सुपलिया।
तजि दे बुधि लरिकैयाँ खेलन की ॥१॥
देवता पित्तर भुइयाँ भवानी।
यह मारग चौरासी चलन की ॥२॥
ऊँचा महल अजब रँग बँगला।
साईँ की सेज जहाँ लगी फूलन की ॥३॥
तन मन धन सब अर्पन करि वहाँ।
सुरत सम्हार परु पइयाँ सजन की ॥४॥
कहै कबीर निर्भय होय हंसा।
कुंजी बता द्यौँ ताला खुलन की ॥५॥
(५)
जाग पियारी अब का सोवै।
रैन गई दिन काहे को खोवै ॥१॥
जिन जागा तिन मानिक पाया।
तैँ बौरी सब सोय गँवाया ॥२॥
पिय तेरे चतुर तू मूरख नारी।
कबहुँ न पिय की सेज सँवारी ॥३॥
तैँ बौरी बौरापन कीन्हो।
भर जोबन पिय अपन न चीन्हो ॥४॥
जाग देख पिय सेज न तेरे।
तोहि छाड़ि उठि गये सबेरै ॥५॥
कहै कबीर सोई धन जागे ।
सबद बान उर अन्तर लागै ॥६॥
(६)
अँधियरवा मैं ठाढ़ि गोरी का करलू ॥ टेक ॥
जब लगि तेल दिया मैं बाती, येहि अँजोरवा बिछाय घलतू।
मन का पलँग सँतोष बिछौना, ज्ञान कै तकिया लगाय रखतू
जरि गया तेल बुझाय गइ बाती, सुरत मैं मुरत समाय रखतू
कहै कबीर सुनो भाई साधो, जोतिया मैं जोतिया मिलायरखतू
(७)
उठो सोहंगम नारि, प्रीति पिय से करो ।
यह उरले व्योहार, दूर दुरमति धरो ॥१॥
पाँच चोर बड़ जोर, संगि एते घने ।
इन ठगियन के साथ, मुसै घर निसु दिने ॥२॥
सोवत जागत चोर, करै चोरी घनी ।
आपु भये कुतवाल, भली विधि लूटहीं ॥३॥
द्वादस नगर मँझार, पुरुष इक देखिये ।
सोभा अगम अपार, सुरति छबि पेखिये ॥४॥
होत सबद घनघोर, संख धुनि अति घनी ।
तंतन की झनकार, बजत झीनी झिनी ॥५॥
है कोइ महरम साध, भले पहिचानिये ।
सतगुरु कहै कबीर, संत को बानि ये ॥६॥
(८)
राग जँतसार
सुरति मकरिया गाड़हु हे सजनी-अहे सजनी ।
दूनौँ रे नयनवाँ जोतिया लावहु रे की ॥१॥
२४ • शब्द संग्रह
मन धरू मन धरू मन धरू हे सजनी-अहे सजनी ।
अइसन समइया फिरि नहिँ पावहु रे की ॥२॥
दिन दस रजनी सुख करू हे सजनी-अहे सजनी ।
इक दिन चाँद छपाइल रे की ॥३॥
सँगहिँ अछत पिया भरम भुलइली हे सजनी-अहे सजनी।
मोरे लेखे पिया परदेसहिँ रे की ॥४॥
नव दस नदिया अगम बहे सोतिया हे सजनी-अहे सजनी।
बिचहिँ पुरइनि दह१ लागल रे की ॥५॥
फुल इक फुलले अनुप फुल सजनी-अहे सजनी ।
तेहि फुल भँवरा लुभाइल रे की ॥६॥
सब सखि हिलिमिलि निज घर जाइब हे सजनी-अहे सजनी।
समुँद लहरिया समाइब रे की ॥७॥
दास कबीर यह गवलैँ लगनियाँ हे सजनी-अहे सजनी ।
अब तो पिया घर जाइब रे की ॥८॥
(६)
रेखता
सुख सिंध की सैर का स्वाद तब पाइहै,
चाह का चौतरा भूलि जावै।
बीज के माहिँ ज्यौँ बृच्छ बिस्तार,
यौं चाह के माहिँ सब रोग आवै ॥१॥
दृढ़ बैराग में होय आरूढ़ मन,
चाह के चौतरे आग दीजै।
कहै कबीर यौं होय निरबासना,
तत्त से रत्त है काज कीजै ॥२॥
(१) कोईँ का तलाव ।
कबीर साहित्य २५.
॥ मिश्रित ॥
तन मन धन बाजी लागी हो ॥ टेक ॥
चौपड़ खेलूँ पीव से रे, तन मन बाजी लगाय ।
हारी तो पिय की भई रे, जीती तो पिय मोर हो ॥१॥
चौसरिया के खेल मैं रे, जुग्ग मिलन की आस ।
नर्द अकेली रहि गई रे, नहिं जीवन की आस हो ॥२॥
चार वरन घर एक है रे, भाँति भाँति के लोग ।
मनसा वाचा कर्मना, कोइ प्रीति निबाहै ओर हो ॥३॥
लख चौरासी भरमत भरमत, पौ पै अटकी आय ।
जो अब के पौ ना पड़ी रे, फिर चौरासी जाय हो ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से रे, जीती बाजी मत हार ।
अब के सुरत चढ़ाइ दे रे, सोई सुहागिन नारि हो ॥५॥
(२)
या जग अंधा मैं केहि समुझावौं ॥ टेक ॥
इक दुइ होयँ उन्हैं समझावौं ।
सबहि भुलाना पेट के धन्धा, मैं केहि० ॥१॥
पानी कै घोड़ा पवन असवरवा ।
ढरकि परै जस ओस कै बुन्दा, मैं केहि० ॥२॥
गहिरी नदिया अगम बहै धरवा ।
खेवनहारा पड़िगा फन्दा, मैं केहि० ॥३॥
घर की बस्तु निकट नहिं आवत ।
दियना बारि के ढूँढ़त अंधा, मैं केहि० ॥४॥
लागी आग सकल बन जरिगा ।
बिन गुरज्ञान भटकिगा बन्दा, मैं केहि० ॥५॥
कहै कबीर सुनो भाई साधो ।
इक दिन जाय लँगौटी झार बन्दा, मैं केहि० ॥६
१२
२६ शब्द संग्रह
(३)
पिया मिलन की आस, रहौँ कब लौं खड़ी।
ऊँचे चढ़ि नहिं जाय, मनैं लज्जा भरी ॥ १ ॥
पाँव नहीं ठहराय, चढ़ूँ गिरि गिरि पड़ूँ ।
फिरि फिरि चढ़हूँ सम्हारि, तो पग आगे धरूँ ॥ २ ॥
अंग अंग थहराय, तो बहु बिधि डरि रहूँ ।
कर्म कपट मग घेरि, तो भ्रम मैं भुलि रहूँ ॥ ३ ॥
निपट अनारी बादि, तो झीनी गैल ।
अटपट चाल तुम्हारि, मिलन कस होइ है ॥४॥
तेजो१ कुमति बिकार, सुमति गहि लीजिये ।
सतगुरु सबद सम्हारि, चरन चित दीजिये ॥ ५ ॥
अंतर पट दे खोलि, सबद उर लाव री ।
दिल बिच दास कबीर, मिलैं तोहि बावरी ॥६॥
(४)
ऐसा है रे भाई हरि रस ऐसा है रे भाई, जा के पिये अमर ह्वै जाई ॥ १
ध्रुव पीया प्रहलादहु पीया, पीया मीराबाई ।
बलख बुखारे के मीयाँ पीया, छोड़ी है बादसाही ॥२॥
हरि रस महँगा मोल का रे, पीयै बिरला कोय ।
हरि रस महँगा सो पियै, जा के घर पै सीस न होय ॥३॥
आगे आगे दौं जलै रे, पीछे हरिया होय ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, हरि भज निर्मल होय ॥४॥
(५)
जहँ सतगुरु खेलत ऋतु बसंत । परम जोत जहँ साध संत ॥१
तीन लोक से भिन्न राज । जहँ अनहद बाजा बजै बाज ॥२
चहुँ दिसि जोति की बहै धार । बिरला जन कोइ उतरै पार ॥३
(१) तजो ।
कबीर साहिब २७
कोटि कृस्न जहँ जोरैँ हाथ। कोटि विस्नु जहँ नवैँ माथ॥४
कोटिन ब्रह्मा पढ़ें पुरान। कोटि महेस जहँ धरैँ ध्यान ॥५
कोटि सरस्वति धारैँ राग। कोटि इन्द्र जहँ गगन लाग ॥६
सुर गन्ध्र्व मुनि गने न जायँ। जहँ साहिब प्रगटे आप आय ७
चोवा चंदन औ अबीर। पुहुप बास रस रह्यो गँभीर ॥८
सिरजत हिये निवास लीन्ह। सो यहि लोक से रहत भिन्न॥९
जब बसंत गहि राग लीन्ह। सतगुरु सबद उच्चार कीन्ह॥१०
कह कबीर मन हृदय लाय। नरक-उधारन नाम आहि ॥११
(६)
रेख़ता
सूरे संग्राम को देखि भागै नहीं,
देखि भागै सोई सूर नाहीं।
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना,
मँडा घमसान तहँ खेत माहीं॥
सील औ सच संतोष साही भये,
नाम समसेर तहँ खूब बाजै।
कहै कब्बीर कोइ जूझिहै सूरमा,
कायराँ भीड़ तहँ तुरत भाजै ॥
(७)
रेख़ता
बिना वैराग कहु ज्ञान केहि काम का,
पुरुष बिनु नारि नहिँ सोभ पावै।
स्वाँग तो साहु का काम है चोर का,
कपट की झपट मैं बहुत धावै ॥
बात बहुते कहै झूठ छूटै नहीं,
मुख के कहे कहा खाँड़ खावै।