सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 267 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

१६ शब्द संग्रह
(१)
॥ बिनय ॥
(चौपाई)
दरसन, दीजे नाम सनेहो । तुम बिन दुख पावै मेरी देही ॥
(छंद)
दुखित तुम बिन रटत निसि दिन, प्रगट दरसन दीजिये ।
बिनती सुन प्रिय स्वामियाँ, बलि जाउँ विलंब न कीजिये ॥१॥
(चौपाई)
अन्न न भावै नींद न आवै । बार बार मोहिँ बिरह सतावै ॥
(छंद)
बिबिध बिधि हम भईँ ब्याकुल, बिन देखे जिव ना रहै ।
तपत तन जिव उठत झाला, कठिन दुख अब को सहै ॥२
(चौपाई)
नैनन चलत सजल जलधारा । निसिदिन पंथ निहारौँ तुम्हारा ॥
(छंद)
गुन औगुन अपराध छिमा करि, औगन कछु न बिचारिये ।
पतित-पावन राखु परमति१, अपना पन न बिसारिये ॥३॥
(चौपाई)
गृह आँगन मोहिँ कछु न सुहाई, बज्र भई और फिरयो न जाई ॥
(छंद)
नैन अरि भरि रहे निरखत, निमिख नेह न तुड़ाइये ।
बाँह दीजे बंदी-छेड़ा, अब के बंद छुड़ाइये ॥४॥
(चौपाई)
मीन मरै जैसे बिन नीरा । ऐसे तुम बिन दुखित सरीरा ॥
(छंद)
दास कबीर यह करत बिनती, महा पुरुष अब मानिये ।
दया कीजे दरस दीजे, अपना करि मोहिँ जानिये ॥५॥
(१) उच्च मत या भाव ।