संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ शब्द संग्रह
धीरे पाँव धरौ पलँगा पर, जागत ननद जिठानी ॥३॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, लोक लाज बिलछाती१ ॥४॥
(६)
होली
नैहरवा हम काँ नहिँ भावै ॥ टेक ॥
साँईँ की नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोइ जाय न आवै ।
चाँद सुरज जहाँ पवन न पानी, को सँदेस पहुँचावै,
दरद यह साईँ को सुनावै ॥ १ ॥
आगे चलौँ पंथ नहिँ सूझै, पीछे दोष लगावै ।
केहि बिधि ससुरे जावँ मोरी सजनी, बिरहा जोर जनावै,
बिषै रस नाच नचावै ॥ २ ॥
बिन सतगुरु अपनो नहिँ कोई, जो यह राह बतावै ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपने न प्रीतम पावै,
तपन यह जिय की बुझावै ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
बहुत दिनन मैँ प्रीतम आये, भाग भले घर बैठे पाये ॥१॥
मंगलचार महा मन राखो, नाम रसायन रसना२ चांखो ॥२॥
मंदिर महा भयो उँजियारा, लै सूती अपनो पिय प्यारा ॥३
मैं निरास जो नौनिधि पाई, कहा करौँ पिय तुम्हरी बड़ाई४
कहतकबीरमैं कछुन हिँकीन्हा, सहज सुहाग पिया मोहिँ दीन्हा ॥५
(२)
घूँघट का पट खोल रे, तो को पीव मिलैँगे ॥टेक
घट घट में वोहि साईँ रमता, कटुक बचन मत बोल रे(तो को०
धन जोबन का गर्ब न कीजे, झूठा पचरँग चोल रे(तो को०) ॥
(१) छोड़ी । (२) जीभ ।