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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 267 में से

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पृष्ठ 24

कबीर साहिब १५
कहौँ सो नाम सुनौँ सो सुमिरन, खावँ पियौँ सो पूजा ।
गिरह उजाड़ एक सम लेखौँ, भाव मिटावौँ दूजा ॥३॥
आँख न मूँदौँ कान न रूँधौँ, तनिक कष्ट नहिँ धारौँ ।
खुले नैन पहिचानौँ हँसि हँसि, सुंदर रूप निहारौँ ॥४॥
शबद निरन्तर से मन लागा, मलिन वासना त्यागी ।
ऊठत बैठत कबहुँ न छूटै, ऐसी तारी लागी ॥ ५ ॥
कह कबीर यह उनमुनि रहनी, सो परगट करि गाई ।
दुख सुख से कोइ परे परम पद, तेहि पद रहा समाई ॥६
(९)
गुरू ने मोहिँ दीन्ही अजब जड़ी ॥ टेक ॥
सोई जड़ी मोहिँ प्यारी लगतु है, अमृत रसन भरी ॥१॥
काया नगर अजब इक बँगला, ता मैं गुप्त घरी ॥ २ ॥
पाँचो नाग पच्चीसो नागिन, सूँघत तुरत मरी ॥ ३ ॥
या कारे ने सब जग खायो, सतगुरु देख डरी ॥ ४ ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, लै परिवार तरी ॥ ५ ॥
(१०)
होली
ऋतु फागुन नियरानी, कोइ पिया से मिलावै ॥ टेक ॥
सोइ तो सुंदर जाको पियको ध्यान है, सोइ पियके मनमानी।
खेलत फाग अंग नहिँ मोड़ै, सतगुरु से लिपटानी ॥१॥
इक इक सखियाँ खेल घर पहुँचीँ, इक इक कुल अरुझानी।
इक इक नाम बिना बहकानी, हो रहि ऐँचा तानी ॥२॥
पिय को रूप कहाँ लग बरनौँ, रूपहि माहिँ समानी ।
जो रँग रँगे सकल छवि छाके, तन मन सभी भुलानी ॥३॥
यौँ मत जाने यहि रे फाग है, यह कछु अकथ कहानी ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, यह गति बिरले जानी ॥४॥