संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ - शब्द संग्रह
ऊसर खेत कै कुसा मँगाये, चाँचुर चवर१ कै पानी ।
जीवत ब्रह्म को कोई न पूजै, मुरदा कै मिहमानी ॥३॥
सिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, सेस सहस मुख होई ।
जो जो जन्म लियो बसुधा२ में, थिर न रह्यो है कोई॥४
पाप पुन्य हैं जन्म संघाती, समुझि देख नर लोई ।
कहत कबीर अभि अंतर की गति, जानत बिरला कोई ॥५॥
(१०)
उपजै निपजै निपजि समाई, नैनन देखि चल्योजगजा। १
लाज न मरो कहो घर मेरा, अंत की बार नहीं कछु तेरा ॥२
अनेक जतन करि काया पालो, मरती बेर अगिन सँग जाली३
चोवा चंदन मरदन अंगा, सो तन जरै काठ के संगा ॥४॥
कहत कबीर सुनो रे गुनिया, बिनसै रूप देखैगी दुनियाँ ॥५॥
(११)
यही घड़ी यह बेला साधो ॥ टेक ॥
लाख खरच फिर हाथ न आवै, मानुष जनम सुहेला ॥१॥
ना कोइ संगी ना कोइ साथी, जाता हंस अकेला ॥२॥
क्यों सोया उठि जागु सबेरे, काल मारँदा सेला३ ॥३॥
कहत कबीर गुरू गुन गावो, झूठा है सब मेला ॥४॥
(१)
हटरी छोड़ि चल' बनिजारा ॥ टेक ॥
इस हटरी बिच मानिक मोती, कोइ बिरला परखनहारा ॥१
इस हटरी के नौ दरवाजे, दसवाँ ठाकुरद्वारा ॥ २ ॥
निकसि गइ थंभी ढहि परा मन्दिर, रलि गया चिक्कड़ गारा ३
कहत कबीर सुनो भइ साधो, झूठा जगत पसारा ॥ ४ ॥
(१) परती ज़मीन की छिछुली तलैया । (२) पृथ्वी । (३) तलवार ।