संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहिब १७
(२)
दरमाँदे ठाढ़े दरबार ॥टेक॥
तुम बिन सुरत करै को मेरी, दरसन दीजै खोलि किवार ॥१॥
तुम हौ धनी उदार दयालू, श्रवनन सुनियत सुजस तुम्हारा॥२
माँगाँ कौन रंक सब देखौँ, तुम्हहीं तैं मेरो निस्तार ॥३॥
जैदेव नामा विप्र सुदामा१, तिन पर किरपा भई अपार ॥४
कह कबीर तुम समरथ दाता, चार पदारथ देत न बार ॥५॥
॥ साधु ॥
नारद साध से अंतर नाहीं।
जो कोइ साध से अंतर राखै, सो नर नरकै जाहीं ॥१॥
जागै साध तो मैं हूँ जागूँ, सोवै साध तो सोऊँ।
जो कोइ मेरे साध दुखावै, जरा मूल से खोऊँ ॥२॥
जहाँ साध मेरो जस गावै, तहाँ करूँ मैं बासा।
साध चलै आगे उठ धाऊँ, मोहिँ साध की आसा ॥३॥
माया मेरी अर्ध-सरीरी, औ भक्तन की दासी।
अठसठ तीरथ साध के चरनन, कोटि गया औ कासी ॥४
अंतरध्यान नाम निज केरा, जिन भजिया तिन पाई।
कहत कबीर साध की महिमा, हरि अपने मुख गाई ॥५॥
॥ सार गहनी ॥
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै ॥ टेक ॥
हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार वार वा को क्यों खोलै ॥१
हलकी थी जब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै ॥२
सुरत कलारी भइ मतवारी, मदवा पी गइ बिन तोले ॥३॥
हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोलै ॥४॥
(१) जैदेव और नामदेव परम भक्त और सुदामा श्रीकृष्ण के सहपाठी महा
दरिद्र थे जिन की गाढ़ में भारी सहायता हुई ।
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