सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 267 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 26

कबीर साहिब १७
(२)
दरमाँदे ठाढ़े दरबार ॥टेक॥
तुम बिन सुरत करै को मेरी, दरसन दीजै खोलि किवार ॥१॥
तुम हौ धनी उदार दयालू, श्रवनन सुनियत सुजस तुम्हारा॥२
माँगाँ कौन रंक सब देखौँ, तुम्हहीं तैं मेरो निस्तार ॥३॥
जैदेव नामा विप्र सुदामा१, तिन पर किरपा भई अपार ॥४
कह कबीर तुम समरथ दाता, चार पदारथ देत न बार ॥५॥
॥ साधु ॥
नारद साध से अंतर नाहीं।
जो कोइ साध से अंतर राखै, सो नर नरकै जाहीं ॥१॥
जागै साध तो मैं हूँ जागूँ, सोवै साध तो सोऊँ।
जो कोइ मेरे साध दुखावै, जरा मूल से खोऊँ ॥२॥
जहाँ साध मेरो जस गावै, तहाँ करूँ मैं बासा।
साध चलै आगे उठ धाऊँ, मोहिँ साध की आसा ॥३॥
माया मेरी अर्ध-सरीरी, औ भक्तन की दासी।
अठसठ तीरथ साध के चरनन, कोटि गया औ कासी ॥४
अंतरध्यान नाम निज केरा, जिन भजिया तिन पाई।
कहत कबीर साध की महिमा, हरि अपने मुख गाई ॥५॥
॥ सार गहनी ॥
मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै ॥ टेक ॥
हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार वार वा को क्यों खोलै ॥१
हलकी थी जब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै ॥२
सुरत कलारी भइ मतवारी, मदवा पी गइ बिन तोले ॥३॥
हंसा पाये मानसरोवर, ताल तलैया क्यों डोलै ॥४॥
(१) जैदेव और नामदेव परम भक्त और सुदामा श्रीकृष्ण के सहपाठी महा
दरिद्र थे जिन की गाढ़ में भारी सहायता हुई ।
३