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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 267 में से

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कबीर साहिब १३
सुन्न महल मैं दियना बारिले, आसा से मत डोल रे (तो को०) ॥३
भोग जुगत से रंग महल मैं, पिय पाये अनमोल रे (तो को०) ॥४
कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे (तो को०) ॥५॥
(३)
मैं तौ वा दिन फागमचैहौं, जा दिन पिया मोरे द्वारे ऐहैं ॥टेक॥
रंग वही रँगरेजवा वाही, सुरँग चुनरिया रँगैहौं ॥१॥
जोगिन होइ के बन बन ढूँढ़ौं, वाही नगर मैं रहिहौं ॥२॥
बालपना गल सेलिह बनैहौं, अंग भभूत लगैहौं ॥३॥
कह कबीर पिये द्वारे ऐहैं, केसर माथ रँगैहौं ॥४॥
(४)
पिया मेरा जागै मैं कैसे सोई री ॥ टेक ॥
पाँच सखी मेरे सँग की सहेली,
उन रँग रँगी पिया रँग न मिली री ॥ १ ॥
सास सयानी ननद दीरानी,
उन डर डरी पिय सार न जानी री ॥ २ ॥
द्वादस ऊपर सेज बिछानी,
चढ़ न सकौं मारी लाज लजानी री ॥ ३ ॥
रात दिवस मोहिं कूका मारै,
मैं न सुना रचि रही सँग जार री ॥ ४ ॥
कह कबीर सुनु सखी सयानी,
बिन सतगुरु पिय मिले न मिलानो री ॥ ५ ॥
(५)
खंजरि लगि गये बान सुरंगी हो ॥ टेक ॥
फूल सतगुरु उपदेस दियो है, होइ गयो चित्त बिरंगी हो ॥१
आन पुरुष की बनी है तिरिया, घायल पाँचो संगी हो ॥२