सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०५
से जो उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं उनसे स्पष्ट होता है कि नामदेव उनसे किस
प्रकार प्रभावित हैं। नामदेव ने भी उसी प्रकार की बातें कही हैं जिस प्रकार की इन
नाथों तथा सिद्धों ने कही हैं। कुछ उदाहरण नामदेव के समकालीन नाथों की रचनाओं
से भी प्रस्तुत किये गये हैं।
सिद्ध और नाथ पंथी दोनों दार्शनिक योगी थे, परम तत्त्व के अन्वेषक। दोनों
ने परमात्मा को बाह्य जगत में न ढूंढ़ा। "घट" के भीतर ही परम तत्त्व का निवास
है। वही शून्य का साक्षात्कार हो सकता है। दोनों का यही सिद्धांत था। फलतः दोनों
ने अन्तःसाधना पर जोर दिया। सरह (८वीं शताब्दी) ने 'घट' के बाहर परमात्मा
को ढूंढने वाले पंडितों को खूब फटकारा "घट" में बुद्ध है यह नहीं जानता। आवागमन
को भी खण्डित नहीं किया। तो भी निर्लज्ज कहता है कि मैं 'पण्डित हूँ।'१
'मूर्ख जो वस्तु घर में है उसे बाहर ढूंढता है। जैसे कोई मूढ़ नारी पति को
सामने देख रही हो फिर भी पड़ौसी से पूछ रही हो कि वह कहाँ है। अरे मूर्ख आत्मा
को पहचानने की कोशिश कर क्योंकि वह ध्यान, धारण या जप से नहीं मिलता।'"
नाथ पंथियों ने भी परम तत्त्व को न हिन्दू के मन्दिर में देखा न मुसलमानों
की मस्जिद में। क्योंकि योगी तो उसे वहाँ देखता है जहाँ न मन्दिर है न मस्जिद।
अर्थात् अपने 'घट' मे ही उसका साक्षात्कार करता है।३
१. पंडिअ सअल सत नवखाणइ ।
देहहहि बुद्ध वसन्त ण जाणइ ।।
अमणा गमण ण तेन विखण्डिअ ।
तोवि णिलज्ज भणइ हउं पण्डिअ ।।
"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पंथ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य" शीर्षक लेख
--"साहित्य सन्देश" मार्च १६५३ पृष्ठ ३६८ ।
२. घरे अच्छइ बाहिरे पुच्छइ ।
पहु देखइ पडियेसो पुच्छइ ।।
सरह भणइ वड़ झाणउ अप्पा ।
णउ सो धेअण, धारण जप्पा ।।
३. हिंदू ध्यावै देउरा ।
मुसलमान मसीत ।।
योगी ध्यावै परम पद ।
जहाँ देउरा न मसीत ।
-'साहित्य सन्देश' (मार्च १६५३) पृ० ३६८ ।
२०
१०६ नामदेव की हिन्दी कविता
गोरखपन्थी योगियो के अनुसार सारे तीर्थं काया गढ के भीतर ही है ।१
जिस तरह अन्त साधना पर इन दोनो पदो में जोर दिया गया है उसी तरह
बाह्याडम्बरो के तीव्र विरोध पर भी क्योकि बाह्याडम्बर अन्त. साधना का प्रबल शत्रु है।
बोधिसत्वो को ब्रह्मा, विरणु, महेशादि की पूजा नही करनी चाहिए । पत्थर
आदि देवताओ की भी पूजा नही करनी चाहिए । न तीर्थ जाना चाहिए । बाह्य देव-
पूजा से मोक्ष नही मिलता ।२
भिन्न भिन्न तीर्थों मे घूम कर अनेक देवताओ की पूजा वा आराधना को योगियो
ने मूर्खता कहा है ।३
वेद पुराणादि के अध्ययन से पडित फूला नही समाता किन्तु जैसे पके बेल के
चारो ओर भौरा मँडराता ही है, कुछ पाता नही वैसे ही यह पडित भी बाहर ही बाहर
भ्रमता है, कुछ समझता नही ।४
गोरख (९वीं शताब्दी) ने शास्त्रीय ज्ञान की स्पष्ट शब्दो मे निंदा की है ।५
"नाद' और "बिन्दु" इन दोनो तत्त्वो से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है इसे
सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पथ दोनो ही स्वीकार करते है ।६
१. घट ही भीतर अठसठी तीरथ ।
कहां भ्रमई रे भाई ॥
२. ब्रह्मा विहणु महेसुर देवा ।
बोहिसत्त ना करहु सेवा ।
देव ण पूजहु तिरथ ण जावा ।
देव पूजा ही तिरथ ण जावा ॥
—साहित्य सन्देश (मार्च १९५३) पृष्ठ ३६८ ।
३. न्हाइये नो तीरष न पूजिये को देव ।
भणंत गोरख अलख अभेव ॥
४ आगम वेअ पुराणेहि पण्डिअ माण वहंति ।
पक्क सिरिफले अलिअ जिमि बहिरिअ भ्रमन्ति ॥
५ वेदे न शास्त्रे कतेबे न पुराने ।
पुस्तवे न बाच्या जाई ।
तेवत जाणै विरला योगी ।
और दुनि सब धंधे लागी ॥
६. नादांशो नादो नादांश प्राण । शक्त्यंशो बिन्दु ।
बिन्दोरंश शरीरम् ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०७
परम तत्व की उपलब्धि होने पर अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति होती है ।
नाथपंथी उस अनिर्वचनीयता को इस प्रकार व्यक्त करते है ।१
इस सम्बन्ध में सिद्ध लुइपा (६वी शताब्दी) का कथन भी दृष्टव्य है ।२
इस अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्ति गुरु उपदेश के बिना असंभव है । सरहपा
कहते हैं कि जिसने दौड़कर गुरु-उपदेश के अमृत रस का पान नही किया वह वृथा
शास्त्रार्थ रूप मरुस्थल में प्यासा ही मर गया ।३
इसी तरह नाथ पंथ में "निगुरे" की गति नही है ।४
चरपटी नाथ (गोरखनाथ के थोड़े परवर्ती) बाह्याडम्बरों की निंदा करते हुए
कहते हैं—"नहा धोकर अंग प्रक्षालन करता है । बाहर से तो स्वच्छ है परन्तु भीतर
से मलीन । होम तथा जप भी करता है । एकादशी का व्रत भी रखता है किन्तु परब्रह्म
का स्मरण नही करता ।"५
नाग अरजुन (१२वीं शताब्दी) कहते हैं कि "अहंकार को दूर कर गुरु को
१. शिवं न जानामि कथं वदामि ।
शिवं च जानामि कथं वदामि ॥
२. भाव न होई, अभाव न होई ।
अइस संबोहे को पतिआइ ।
३. गुरु-उपए से अमिअ-रस ।
धावण पीअउ जेहि ॥
बहु सत्यत्थ मरुत्थलहि ।
तिसिए मरिअउ तेहि ॥
—"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य"
शीर्षक लेख 'साहित्य सन्देश, मार्च १६५३ से उद्धृत ।
४. गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला ।
गुरु बिन ज्ञानं न पाइला रे भाईला ॥
—"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य"
(शीर्षक लेख) "साहित्य सन्देश" मार्च १६५३ से उद्धृत ।
५. न्हावै धोवै पषालै अंग ,
भीतरि मैला बाहरि चंग ॥
होम जाप इग्यारी करै ।
पारब्रह्म के सुध न धरै । ।१५।। ।१५६।।
—नाथ सिद्धो की बानियाँ, पृष्ठ २७ ।
३०८ नामदेव की हिन्दी कविता
स्थान देकर, "उनमन की डोरी" से जब मन खींचा जाता है तब परम ज्योति का
साक्षात्कार होता है ।"१
हणवंतजी (चौदहवीं शताब्दी के पूर्व के) "घट" के भीतर ही परम तत्त्व का
साक्षात्कार कर लेने को कहते हैं—"अड़सठ तीर्थ जिसके चरणों में है वही देव तुम्हारे
अन्तःकरण में है । उसे पाने के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता नही ।"२
घूघली मल (१४वीं शती का उत्तरार्द्ध) कहते हैं—'जो सोये वे नष्ट हुए ।
उनका जन्म व्यर्थ हो गया । काल रूपी अहेरी ने देखते-देखते काया रूपी हरिणी का
तथा संसार का संहार किया ।"३
नामदेव के समकालीन संत
सिक्खों के चौथे गुरु अर्जुनदेव ने सं० १६६१ में जिस "आदि ग्रंथ" का संग्रह
कराया उसमें स्वामी रामानन्द और उनके शिष्यों की कविताएं भी संगृहीत है । इनके
अतिरिक्त जिन अन्य संतों की कविता का भी "आदि ग्रन्थ" में संग्रह किया गया है वे
हैं जयदेव, नामदेव और त्रिलोचन । इनमें से अंतिम दो का नाम कबीर ने कई बार
१. आपा भेटिला सतगुर थापिला ।
न करिबा जोग जुगति का हेला ।
उनमन डोरी जब पेंचीजा ।
तब सहज जोति का मेला ॥२॥ ॥४२६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ ६७ ।
२. अटसठि तीरथ जाके चरणा ।
सोई देव तुम्हारे अंतहकरणा ।
हणवंत कहै मन अस्थिर धरणा ।
बाहिर कितहू भटकि न भरणां ॥६॥ ७४६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ १२७ ।
३. आइस जी सोवो ॥
बाबा से सूता ते परा विगूता ।
जनम गया अरु हारया ॥
काया हिरणी काल अहेड़ी ।
हम देखत जग मार्या ॥६॥ ४१६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ ६५ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०६
लिया है।¹
संत जयदेव, संस्कृत के शृङ्गारी कवि जयदेव से निश्चय ही भिन्न हैं। उनके
सम्बन्ध में कोई निश्चित प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं है। वे जिस राजा लक्ष्मण सेन
की सभा के पंच रत्नों में से एक थे उसका राजस्व काल सन् ११७० ई० से आरम्भ
होता है। अतः ये नामदेव के समकालीन नहीं हो सकते। उनके दो पद "श्री गुरु ग्रंथ
साहब" में संगृहीत हैं।
त्रिलोचन : फरकुहर ने त्रिलोचन को नामदेव का समकालीन माना है। इनकी
कुछ कविता "आदि ग्रन्थ" में संगृहीत है। इनकी अन्य रचनाएं उपलब्ध नहीं हैं।
यह बड़े खेद की बात है कि नामदेव का समकालीन संत साहित्य प्राप्त नहीं
होता। संतों की एक परम्परा होती है। किसी संत का एकाएक आविर्भाव नहीं होता।
नामदेव के समसामयिक संत अवश्य हुए होंगे, उन्होंने रचनाएँ भी की होंगी परन्तु
दुर्भाग्य से वे रचनाएँ प्राप्त नहीं होतीं। जो थोड़ी बहुत फुटकर रचनाएँ प्राप्त होती हैं
उनमें निर्गुण विचारधारा के बहुत से तत्त्व उपलब्ध होते हैं। वस्तुतः ये सारे संत उसी
परम्परा के थे। जैसा ये लोग लिख रहे थे वैसे नामदेव भी लिख रहे थे। दोनों एक
दूसरे से प्रभाव ग्रहण कर रहे थे।
नामदेव का परवर्ती साहित्य पर प्रभाव
वास्तव में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तन और कबीर तथा उत्तरी भारत की संत
परम्परा पर नामदेव का जितना प्रभाव पड़ा उतना अन्य किसी संत का नहीं। परिणाम-
स्वरूप उनकी हिंदी रचनाओं की प्रवृत्तियों का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।
कालान्तर में ये ही प्रवृत्तियाँ निर्गुण विचारधारा के संतों और उनके काव्य का प्रेरणा-
स्रोत बनीं और उसका अभिन्न अंग बन गईं।
अब हम यह सिद्ध करेंगे कि नामदेव के हिंदी पदों में निर्गुण विचारधारा की
सारी विशेषताएँ विद्यमान हैं। साथ-साथ यह दिखाने का प्रयत्न किया जायेगा परवर्ती
संत नामदेव से किस प्रकार प्रभावित हुए हैं।
(१) ईश्वर की सर्वव्यापकता-परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सबके
बाहर तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकान्तनिष्ठ होकर हमें रहना
चाहिए। इस प्रकार के भावों से नामदेव का हृदय सदा भरा रहता है और इसी कारण,
१. जाने सुक उधव अक्रूर हणवंत जागे ले लंगूर ।
संकर जागे चरन सेव कलि जागे नामा जैदेव ॥
-- कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २१६, ३८७।
११० नामदेव की हिन्दी कविता
सारे जगत् को वे एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखते हैं ।
नामदेव कहते हैं— 'ईश्वर एक है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है । जिधर
भी देखो वही दिखलाई पड़ता है । माया के विचित्र चित्रों से संसार मुग्ध है, कोई
विरला ही उसे जान पाता है ।' १
कबीर साहब कहते हैं—"सगुण में निर्गुणत्व का आरोप एवं निर्गुण के लिए
सगुणत्व की भावना स्वाभाविक है । इसे त्याग, दोनों में से किसी भी एक ओर बहना
ठीक नहीं । उस अलक्ष्य के लिए अजर अमर आदि कहना भी उपयुक्त नहीं । उसका
कोई रूप नहीं, कोई वर्ण नहीं । वह घट-घट वासी है, सर्वव्यापक है ।' २
गुरु नानक कहते हैं—' घट घट में वह परम तत्त्व, वह परब्रह्म छिपा हुआ है ।
घट-घट में उसकी ज्योति प्रकाशित है ।' ३
ब्रह्म की सर्वव्यापकता का वर्णन करते हुए दादू कहते हैं—"मै उस निरंजन
को सदा अपने पास ही देखता हूँ । क्या भीतर क्या बाहर वह समान रूप से सारे संसार
में समाया हुआ है ।' ४
संत रज्जब अपनी ब्रह्म की अनुभूति का वर्णन करते हुए कहते हैं—"वह
अप्राप्य सब जगह प्राप्त होता है । सभी ठौर उसके दर्शन होते हैं । वह सब में समाया
हुआ है । उसकी गति बड़ी अज्ञेय है । वह किसी से अलग नहीं है । वह हर एक वस्तु
१. एक अनेक विआपक पूरक जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझे कोई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
२. संतो धोखा कासू कहिये ।
गुण में निर्गुण निरगुण में गुण है बाट छांड़ि क्यो बहिये ॥टेक॥
अजरा अमर कथै सब कोई अलख न करणा जाई ।
नाति सरूप वरण नहि जाकै, घटि-घटि रह्यो समाई ।
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १४६, पद १८० ।
३. घट-घट अंतरि ब्रह्म लुकाइया, घटि-घटि जोति समाई ।
वजर कपाट भुरेत गुरमती, निरभै ताड़ी लाई ।
संत काव्य, पृष्ठ २२० ।
४. निकटि निरंजन देखिहौ छिन दूरि न जाई ।
बाहरि भीतरि येकरा, सब रह्या समाई ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २५३ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३११
का अविभाज्य अंग है ।"१
(२) प्रत्यक्ष अनुभव से सत्यान्वेषण—नामदेव स्वानुभूति पर बल देते हैं ।
उन्होंने श्रुतिप्रामाण्य अथवा शब्द-प्रमाण का विरोध किया है । वे "रिदै" (हृदय) में
विचार करने पर जोर देते हैं । वे कहते हैं कि हृदय में विचार कर देखो तो पता
चलेगा कि घट-घट में वही एक मुरारी व्याप्त है ।२
नामदेव ने सत्य का कितना मार्मिक रूप उद्घाटित किया है । वे कहते हैं—
'हे परमात्मा ! सकल जीवों की उत्पत्ति आपसे हुई है । सकल जीवो में आप हैं । आप
घट-घट व्यापी हैं । संसार के लोग माया से मोहित होने के कारण इस बात को
जानते नहीं ।'३
अपने इसी सत्यान्वेषण के आधार पर वे डंके की चोट पर यह निर्णय देते हैं
कि राम की भक्ति के बिना संसार सागर को पार करने की कोई मार्ग नहीं है ।४
नामदेव के परवर्ती संत कबीर ने भी कोरे पांडित्य की निंदा की है । वे पंडितों
को संबोधित करते हुए कहते हैं—'मैं आँखिन देखी' अर्थात् स्वानुभव की बात कहता
हूँ और तू 'कागद की लेखी' अर्थात् 'श्रुति प्रामाण्य' को लेकर चलता है । मै सुलझाने
वाली बात कहता हूँ तो तू उलझानेवाली कहता है ।'५
१. अमित मिल्या सब ठौर है अकल सकल सब मांहि ।
रज्जब अजब अगह गति काहूँ न्यारा नाहिं ।
—सत काव्य, पृष्ठ ३३६ ।
२. कहत नामदेऊ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ।
घट-घट अंतरि सरब निरंतरी केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
३. जामै सकल जीव की उत्पति । सकल जीवमै आप जी ।
माया मोह करि जगत भुलाया घटि घटि व्यापक बाप जी ।
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ४८ ।
४. राम भगति बिन गति न तिरन की ।
कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६२ ।
५. मै कहता हूँ आँखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे ।
मै कहता सुरझावनहारी, तूं रह्यो अरुझाई रे ॥
—कबीर ग्रन्थावली ।
३१२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने ऐसे कोरे पांडित्य को समाप्त कर देने की शिक्षा दी है। 'चारो वेदो का
अध्ययन करके भी जीवात्मा का ईश्वर से भक्ति नही हुई। भक्ति के तत्त्व रूपी फल
(बाल) को तो कबीर ने अपना लिया अब पंडित लोग तो व्यर्थ के वाद विवाद को खोज
रहे है।'१
(३) सद्गुरु-महत्त्व प्रतिपादन—हमारे यहां उपनिषद् काल से ही गुरु की
महिमा चली आ रही है। गुरु के महत्त्व का कारण यह है कि साधक को अपने
साधना-काल में अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं जिससे वह कभी कभी पथभ्रष्ट भी हो
जाता है। ऐसी दुविधा की अवस्था में साधक अपने गुरु से अपनी शंकाओं की निवृत्ति
करा सकता है।
नामदेव कहते हैं कि 'सद्गुरु के बिना सत्य का अनुभव भी कैसे हो सकता है ?
गुरु ने अपने उपदेशों से मेरा जन्म सफल कर दिया। गुरु-कृपा से मुझे ब्रह्म ज्ञान रूपी
अंजन प्राप्त हो गया है।'२
यह निश्चित है कि बिना गुरु-कृपा के कुछ प्राप्त नही होता।३
गुरु ने नामदेव को सब कुछ दिया है। गुरु ने उनको अठसठ तीर्थों का दर्शन
घट के भीतर ही कराया। अतः वे कहीं आना जाना नही चाहते।४
इस संदर्भ में नामदेव ने अपने गुरु विसोबा खेचर का सश्रद्ध स्मरण
१. चारिउं वेद पढ़ाइ करि हरि सूँ न लाया हेत।
बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूँढे खेत॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३६।
२. सफल जनमु मोकउ गुर कीना॥
दुख बिसारि सुख अंतरि लीना॥
गिआन अंजतु मोकउ गुर दीना॥
राम नाम बिनु जोवनु मन हीना॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०४।
३. प्रणवत नामदेव गुरु प्रसादे। पाया तिनही सुहाया॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६४।
४. तीरथ जाऊँ न जल में पैसूँ जीव जंत न सताऊँगा।
अठसठि तीरथि गुरु लखाये। घट ही भीतरि न्हाऊँगा॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६६।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१३
किया है।¹
कबीर ने गुरु के महत्त्व का वर्णन मुक्त कण्ठ के किया है। उनके लिए तो गुरु
तथा गोविन्द दोनों में कोई अन्तर नही है। गुरु तो गोविन्द का दूसरा रूप ही है। इस
लिए जो व्यक्ति गुरु की सेवा में अपने को मिटा देता है वही ईश्वर को प्राप्त कर
सकता है।²
कबीर साहब कहते हैं कि मेरे समक्ष गुरु और गोविन्द दोनो खड़े हैं।
मै किस के चरण पकड़ू ? हे गुरु आप धन्य हैं कि आपने मुझे गोविन्द से मिला
दिया।³
गुरु नानक गुरु के महत्त्व का वर्णन करते हुए कहते हैं—गुरु के उपदेश से
ब्रह्मादि देवता तथा कितने ही मुनि तरे। सनक सनंदन जैसे तपस्वी महात्मा गुरु-कृपा
से पार हुए।⁴
दादू गुरु के अनुग्रह का वर्णन इस प्रकार करते—'सद्गुरु ने अंजन का प्रयोग
कर मेरे नयन-पटल खोल दिये। गुरु-कृपा से बहरे कानों से सुनने लगे तथा गूँगे
बोलने लगे।'⁵
अन्य एक स्थल पर कहते हैं—'समर्थ गुरु ने मुझे परम तत्त्व के दर्शन कराये।
१. मन मेरी सुई तनो मेरा धागा।
खेचरजी के चरण पर नामा छिपी लागा ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १८८।
२. गुर गोविंद तो एक है दूजा यहु आकार ॥
आपा मेट जीवत मरे तो पावै करतार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३।
३. गुरु गोविंद दोऊ खडे काके लागौ पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार । पृ० ५६।
४. गुर के सबदि तरे मुनि केते, इंद्रादिक ब्रह्मादि वरे ।
सनक सनंदन तपसी जन केते, गुर परसादी पारि परे ॥
—संत काव्य, पृ० २१० ।
५. दादू सतगुर अंजन बाहि करि नैन पटल सब खोले ।
बहरे कानीं सुनने लागे गूँगे मुख सौं बोले ॥
—संत काव्य, पृ० २५६ ।
३१४ नामदेव की हिन्दी कविता
मैंने अपने भीतर ही ब्रह्मानन्द रूपी घृत खा लिया और हृष्ट पुष्ट हो गया ।'१
संत रज्जब ने गुरु को 'नीर क्षीर' विवेकवाला हंस कहा है "माया रूपी पानी
तथा दूध रूपी मन भली भाँति एकरूप हो गये। संत रज्जब कहते हैं कि गुर रूपी हंस
इन दोनों को एक दूसरे से अलग कर देता है ।'२
(४) सुमिरन अथवा नाम स्मरण का महत्त्व—नामदेव ने 'सुमिरन' को बहुत
महत्त्व दिया है। सर्वसाधारण जनता के लिए भी यह साधन सुलभ है। इस पर कुछ
खर्च नही करना पड़ता। अत नाम स्मरण पर नामदेव का आग्रह है। वे कहते हैं—
'हे परमात्मा ! तुम्हारी कृपा से पत्थर समुद्र पर तैर उठे थे । फिर तुम्हारा स्मरण
करने से भक्त भला भवसागर क्यो न तर जायेंगे ?'३
'हरि नाम की महिमा अपार है। वही तो इस विश्व में सार तत्व है। नामदेव
कहते हैं कि इसी का आधार लेकर मैं भवसागर पार हुआ।'४
'तुम्हारा नाम सार-स्वरूप सत्य है। सारा संसार मायाजाल है। कलियुग में
भक्तो के लिए केवल तुम्हारा नाम एकमात्र आधार है ।'५
नाम के इस महत्त्व का अनुभव कर नामदेव कहते हैं कि राम-नाम रूपी पूँजी
म मेरी लो लगी है ।⁶
१. साचा समरथ गुर मिल्या, तिन तत दिया बताइ ।
दादू मोट महाबली घटि घृत मधि करि पाई ॥
—संत काव्य, पृ० २५६ ।
२. माया पानी दूध मन मिले सु मुहुकम संधि ।
जन रज्जब बलि हंस गुरु सोधि लही सो संघि ॥
—संत काव्य, पृ० ३३५ ।
३. देवा पाहन तारिअलै । राम कहत जन कस न तरे ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४६ ।
४. हरि नाव सकल भुवन सतसारा ।
हरि नाव नामदेव उतरे पारा ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १ ।
५. सार तुम्हारा नांव है झूठा सब संसार ।
मनसा वाचा कर्मना कलि केवल नांव अधार ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१ ।
६. राम नाम मेरे पूँजी घनां ।
ता पूँजी मेरी लागौ मना ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२८ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१५
कबीर साहब कहते हैं कि मैं अनेक बार कह चुका हूँ। ब्रह्मा और महेश भी
कह चुके हैं कि यदि प्राणि के मोक्ष का कोई साधन है तो वह केवल तत्त्व-रूप राम का
नाम है। वही प्रत्येक मनुष्य के लिए उचित उपदेश है।¹
यदि संसार में ईश्वर भक्ति और भजन है तो वह केवल राम के नाम का स्मरण
करना ही है। इसके अतिरिक्त जो अन्य उपायों से भक्ति का प्रदर्शन करते हैं वह सब
दुःख का कारण है। कबीरदास कहते हैं कि इसीलिए मन, वचन और कर्म से तत्त्व-
स्वरूप ब्रह्म का स्मरण करना चाहिए।²
संत रैदास नाम-महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं—'नाना प्रकार के
आख्यान, पुराण, वेद-विधि आदि वर्णमाला के चौंतीस अक्षरों के अन्तर्गत ही आते हैं।
व्यास ने ठीक ही कहा है कि ये सब राम-नाम की समता नहीं कर सकते।'³
संत दादू 'सुमिरण' के अनन्य महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—
'निरंतर नाम-स्मरण करने से एक दिन परमात्मा का साक्षात्कार होगा। 'सुमिरण' का
यह सहज मार्ग सद्गुरु ने मुझे बता दिया।'⁴
गुरु नानक नाम-स्मरण पर अपना अविचल भाव व्यक्त करते हुए कहते हैं—
'मेरा आधे शरीर काट दीजिये अथवा सिर पर करवत चलाइये अथवा हिमालय में मेरे
शरीर को गला दीजिये तो भी मेरा मन तुम्हारा गुण-गान करता रहेगा। मैने यह
१. कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस।
राम नाँव तत सार है, सब कोहू उपदेस॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ५।
२. भगति भजन हरि नांव है, दूजा दुक्ख अपार।
मनसा वाचा क्रमनां, कबीर सुमिरण सार॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ५।
३. नाना खिआन पुरान वेद विधि चउतीस अषर मांही।
विआस बिचारि कहिउ परमारथु राम नाम सरि नाही।
—संत काव्य, पृष्ठ १६५।
४—सासै सास सँभालता इक दिन मिलिहै आइ।
सुमिरण पँडा सहज का सतगुर दिया बताइ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ २७६।
३१६ नामदेव की हिन्दी कविता
अच्छी तरह जांच लिया कि रामनाम की समता अन्य कोई साधन नहीं कर सकता ।'१
(५) बाह्याडम्बर की व्यर्थता—नामदेव के अनुसार बाह्य कर्म काण्डों से कोई
लाभ नहीं होता । इनको अपना कर तो जीवन व्यर्थ ही नष्ट होता है । जब तक अंत -
करण शुद्ध नहीं है तब तक बाह्याचारों का प्रदर्शन केवल दिखावा है, ढोंग है ।
'यदि कोई शरीर में लगे कीचड़ को कीचड़ से धोना चाहता है तो वह स्वच्छ
न होगा और उसका यह प्रयास व्यर्थ ही होगा । जो भीतर से मैला और बाहर से
स्वच्छ है वह उस ढोंगी के समान है जो केवल पानी से धोता है । नामदेव कहते हैं कि
सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़कर कोई भवसागर कैसे पार कर सकता है ?'२
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । बिना विश्वास के,
बिना श्रद्धा के तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । नामदेव कहते हैं कि जब मैं अपने गन्तव्य
स्थान पर पहुँचा तब मैंने सीढ़ी छोड़ दी ।'३
मूर्ति पूजा और बलि का नामदेव ने बार-बार खण्डन किया है ।'४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है । 'मन स्थिर हो अथवा
न हो लोग दिखावा अवश्य करते हैं । अंतःकरण तो मलीन है फिर भवसागर कैसे पार
हो सकता है ? बिना उसका मर्म जाने रुद्राक्ष माला, छापा, तिलक आदि का प्रयोग
करने से क्या लाभ ? स्वयं अज्ञानी होकर दूसरों को मार्ग-दर्शन करने का दावा करते
१. अरध सरीरु कटाइऐ सिरि करवतु धराइ ।
तनु हेमंचलि गालोअै भी मन तेरो गुन गाइ ।
हरि नामै तुलि न पूजई सभ फिठो ठोकि बजाइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१८ ।
२. लागो पंक पंक से धोवै । निर्मल न होवै जनम विगोवै ।
भीतरि मैला बाहिरि धोया । पाणी पिंड पखाले धोया ।
नामदेव कहै सुरही परहरिये । भेड़ पूँछ कैसे भवजल तरिये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
३. तीरथ बरत जगत की बासा । फोकट सोजे बिन बिसवासा ।
एकादसी जगत को करनी । पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६ ।
४. पाहन लागे देव कटीला । वाको प्रान नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारे । दैवत जनम आपनौ हारे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१७
हैं। ऐसे कपटाचरण से मुक्ति कैसे होगी ?'१
कबीर ने मूर्ति पूजा का खण्डन किया है। उनके अनुसार जो लोग पत्थर
का पुतला बनाकर उसे कर्तार समझ कर उसकी पूजा करते हैं वे पाप की धारा में डूब
जाते हैं।२
मूर्ति पूजा ही नहीं, भक्ति से रहित जप और तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर
विश्वास करना भी कबीर के अनुसार भ्रम है। ये सब सेंबर के फूल के समान हैं जो
देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन हैं।३
संत मलूकदास कहते हैं कि अंतःकरण में यदि दया-भाव नहीं तो मक्का, मदीना,
द्वारका, बद्री-केदार आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा व्यर्थ है।४
स्वामी सुन्दरदास ने भी बाह्याचारों का विरोध किया है। जो मनुष्य-निर्मित
मूर्ति की पूजा करते हैं, तीर्थस्थानों को जाते हैं, गले में माला डालते हैं, माथे पर तिलक
लगाते हैं वे गुरु के बिना ईश्वर से मिलने का रास्ता कैसे पा सकते हैं ?५
१. मन थिर होइ वा रे न होइ । ऐसा चिन्ह करे संसार ।
भीतरि मैला धूतिग फिरै । क्यूँ उतरे भव पार ॥टेक॥
रुद्राष सपा जप माला भडै । ताको मरम न जाने कोई ॥
आप न देपै और दिवावै । कपट मुक्ति कयो होई ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे ते बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४३।
३. जप तप दीसै थोथरा तीरथ ब्रत वेसास ।
सूवै सेंवल सेविया, यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर, ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४।
४. मक्का मदिना द्वारका बद्री केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३६५।
५. तो भक्त न भावै दूरि बतावै तीरथ जावै फिरि आवै ।
जो कृत्रिम गावै पूजा लावै झूठ दिखावै बहिकावै ॥
अरु माला नांखै तिलक बनावै क्यों पावै गुरु बिन गेला ।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुन्दर न्यारा ह्वै खेला ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३४८।
३१८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब के अनुसार दादू पंथ में बाह्याचारों का बिल्कुल महत्त्व नहीं है।
जो, बाह्याचारों के साधन-स्वरूप माला, तिलक, तीरथ, मूर्ति आदि का त्याग करता है
वह दादू पंथ में परम पुरुष के समान माना जाता है ।¹
(६) अनन्य प्रेम भावना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । संत नामदेव कहते है—'राम की वंदना
कर मैं और किसी की वंदना न करूँगा । मेरा लौकिक जीवन भले ही नष्ट हो मैं अपना
पारलौकिक जीवन नष्ट न होने दूंगा । मैं अन्य देवताओं से याचना न करूँगा । केवल
राम रसायन का आस्वाद लूँगा ।'²
क्योकि उन्हें विश्वास है कि परमात्मा प्राणि-मात्र में समाया हुआ है ।'³
और यही कारण है कि जिसके लिए उन्होंने त्रिभुवन की खाक छानी वह अमो-
लिक 'वस्तु' उनको अपने हृदय में ही मिली । नामदेव कहते हैं कि अब मुझे कही
आने-जाने की आवश्यकता नहीं है । मैं घर बैठे अपने हृदयस्थ राम के गुण गाऊँगा ।⁴
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेमभावना को नामदेव के ढंग पर ही अपनाया है ।
वे अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं—'हे मन ! तू अनस्थिरता या चंचलता
की वृत्ति को छोड़ दे । जब तूने आत्मोपलब्धि के व्रत का अंगीकार कर लिया तो तुझे
अब अपने को जला कर समाप्त कर देने में ही कुशल है ।'⁵
'अजी ओ गुसांईं ! मैं आपका गुलाम हूँ । मुझे बेच दो । यह सारा तन मन
१. माला तिलक न मानई, तीरथ मूरति त्याग ।
सो दिल दादू पंथ में परम पुरुष सूँ लाग ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३१३ ।
२. राम जुहारि न और जुहारौं । जीवति जाइ जनम कत हारौं ।
आन देव सौं दीन न भाषौं । राम रसाइन रसना चाषौं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
३. थावर जंगम कीट पतंगा सुरय राम सबहिन के संगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये । सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहे कहूँ आइये न जाइये । अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६ ।
५. डग मग छांड़ि दे मन बौरा ।
अब तो जरै बरै वनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधौरा ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १६६ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१६
धन आपका है।' १
'हरि मेरे प्रियतम हैं। मैं उनके बिना रह नहीं सकता । मैं उनकी बहुरिया हूँ।
वे बहुत बड़े हैं, मैं बहुत छोटी हूँ।' २
संत रैदास कहते हैं कि यह अनन्य भक्ति नहीं है। जब तक मन की प्रवृत्तियां
चंचल रहा करतो हैं तब तक वह उन्ही मे लीन रहता है। वही मन हरि से विलग
होकर कुमार्ग की ओर जाता है और काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर आदि षड्रिपुओ
को पलभर के लिए भी नहीं भूलता । ३
दादू अपनी एकान्त निष्ठा व्यक्त करते हुए कहते हैं—'हमें राम रस का यह
प्याला बहुत भाता है। रिद्धि-सिद्धि और मुक्ति आप जिसे चाहें उसे दें । मेरे मन तथा
शरीर पर तेरा अधिकार है। मेरा सब कुछ तेरा है और तू मेरा है।' ४
प्रत्येक पतिव्रता के लिए प्रियतम के रूप में कोई न कोई पुरुष अवश्य होता है ।
संत रज्जब कहते हैं कि में राम पर अनुरक्त हूँ। मेरे अन्तःकरण में और किसी के लिए
१. मै गुलाम मोहि बेचि गुसाईं ।
तन मन धन मेरा रामजी कैं ताईं ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२४ ।
२. हरि मेरा पीव भाई हरि मेरा पीव ।
हरि बिन रहि न सकै मेरा जीव ॥टेक॥
हरि मेरा पीव मै हरि की बहुरिया ।
राम बड़े मैं छुटक लहुरिया ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२५ ।
३. संतो अनिन भगति यह नाही ।
जब लग सिरजत मन पांचो गुन ब्यापत है या माही ॥
सोई आन अंतर करि हरिसों अपमारग को आने ।
काम क्रोध मद लोभ मोह की पल पल पूजा ठाने ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १८७ ।
४. प्रेम पियासा राम रस हमको भावै येह ।
रिधि सिधि मांगें मुकति फल चाहैं तिनकों देह ॥
तन भी तेरा मन भी तेरा तेरा पिंड परान ।
सब कुछ तेरा तू है मेरा यहु दादू का ज्ञान ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २६१ ।
३२० नामदेव की हिन्दी कविता
स्थान नही ।१
(७) श्रम और अध्यात्म भावना का समन्वय — प्रत्येक भक्त को उत्पादक श्रम
करना चाहिए। नामदेव, कबीर, रैदास, सेना आदि भक्तो ने जीवन पर्यन्त अपना पेशे-
वर कार्य किया । नामदेव ने स्थान स्थान पर अपने को 'सिंपी' जाति का और तदनुसार
कपडे सीने और रंगने के व्यवसाय का उल्लेख किया है । नामदेव कहते है — 'मैं कपड़ा
रँगने और सिलने का काम करता हूँ । घड़ी भर के लिए भी भगवन्नाम को विस्मृत नही
करता हूँ । मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है । नामदेव कहते हैं — मेरा चित
भगवान से लगा हुआ है ।'२
नामदेव की यह प्रवृत्ति कबीर में भी पाई जाती है । ज्ञान भक्ति की सतत्
साधना करते हुए भी कबीर ने अपना घरेलू व्यवसाय नही छोड़ा ।३ काढ़ा बुनते समय
भी उनकी लौ राम से ही लगी रहती थी ।४
कबीर के समान सन्त रैदास की वाणी में भी यही भावना पल्लवित है ।५
१. पतिव्रता के पीव बिन पुरुष न जन्म्या कोइ ।
त्यू रज्जब रामहि रचै, तिनके दिल नहि दोई ॥
— सत काव्य, पृष्ठ ३३७ ।
२ मन मरो गजु जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटउ जम की फाँसी ॥ १ ॥
राँगनि राँगउ सीवनि सीवउ ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली पद, १८ ।
३. हम घर सूत तनहि नित ताना, कंठ जनेऊ तुम्हारे ।
तुम तो वेद पढ़हु गायत्री गोविंद रिदै हमारे ॥
तू बाह्मन मैं कासी का जुलाहा बूझहु मोर गियाना ।
तुम तो पाचे भूपति राजे हरि सो मोर धियाना ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३३० ।
४ तनना बुनना तज्या कबीर राम नाम लिखि लिया सरीर ।
जब लग भरौं नली का बेहु तब लग टूटे राम सनेह ॥
—गुरु ग्रंथ साहब, गूज, २ ।
५. मेरी संगति पोच सोच दिन रातो ।
मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभाँति ॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, गउडी — १ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२१
(८) भेदभाव विहीनता--जिस भेदभाव विहीनता का बीजारोपण स्वामी
रामानुजाचार्य ने किया था तथा जो भागवत में भी यत्र तत्र प्रतिध्वनित मिलती है,
हीन जाति के होने के कारण सन्त नामदेव ने उसका निराकरण किया। उनकी वाणी
में अनेक स्थलों पर यह बात ध्वनित हुई है।
'हे यादवराय ! मेरी जाति हीन है। भला मैने छीपे के घर जन्म क्यों लिया ?
जिसके फलस्वरूप मैं भक्ति करने से वंचित रखा गया ?'१
'हिंदू अंधा है और मुसलमान काणा। इन दोनो में ज्ञानी चतुर है। मैं तो ऐसे
भगवान् को आराधना करता हूँ जो न मंदिर में है न मसजिद में।'२
नामदेव भक्ति के क्षेत्र में जाति-पाँति के झगड़े को निरर्थक समझते थे। उन्होंने
स्पष्ट रूप से कहा है-'मै जाति-पाँति को लेकर क्या करूं? मै तो दिन-रात राम नाम
का जप करता हूँ।'३
अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त इस बात का अनुसरण कबीर ने भी किया है।
वे कहते हैं सभी मानवों को हरिजन होना है। उनको ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र,
ईसाई या मुसलमान नहीं होनी है। मानव के ये रूप भक्त रूप से तुच्छ हैं। भक्त के
समान ये नहीं है।४
जाके कुटुम्ब सब ढोर ढोवंत फिरहि अजहुँ बनारसी आसपासा ।
आचार सहित विप्र करहिं डडउति तिन तन रैदास दासानुदासा ॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, रैदास रागु मलार २ ।
१. हौनडी जात मेरी जादिम राइआ ।
छीपे के जनमि काहे कउ आइआ ॥
—पञ्जाबातील नामदेव, पृ० १२६ ।
२. हिन्दू अन्ना तुरकू काणा दोहां ते गिआनो सिआणा ।
हिन्दू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीत ।
नामै सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०८ ।
३. का करी जाती का करी पाती। राजाराम सेकौं दिन राती।
—सन्त नामदेव की पदावली, पद १८ ।
४. अवरन वरन न गनिय रंक धनि, विमल वास निज सोई।
बाह्मन छत्रिय वैस सूद्र सब भगत समान न कोई ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृ० ५५ ।
२१
३२२ नामदेव की हिन्दी कविता
यदि सिरजनहार चार वर्णों के भेद का विचार करता तो वह जन्म से ही एक
समान सबके साथ भौतिक, दैहिक और दैविक ये तीन दण्ड क्यों लगा देता ? कोई
हल्का ( छोटा ) नही है। जिसके मुख में राम नाम नहीं है वह छोटा है ।१
सन्तो की जाति नही पूछनी चाहिए। उनकी जाति नही होती । सभी जातियों
में सन्त हुए हैं। सभी लोगो को सन्तों के चरित्र से शिक्षा लेनी है ।२
कबीर ने हिन्दुओं के तीर्थ व्रत और पूजा की निंदा की तो मुसलमानों के रोजा
नमाज की भी खूब खबर ली । इस प्रकार उन्होंने दोनों की बुराइयों का दिग्दर्शन
किया ।३
(६) ब्रह्म की निर्गुणता—प्रसिद्ध है कि नामदेव पहले मूर्तिपूजक और सगुणो-
पासक थे किन्तु बाद में कट्टर निर्गुणोपासक हो गये । वे ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप में
विश्वास करते थे । ब्रह्म के इस निर्गुण रूप का वर्णन उन्होने अनेक प्रकार से अनेक
स्थलो पर किया है ।
'वह निर्गुण ब्रह्म अनेक ओर एक सब कुछ है । सर्वत्र उसी का प्रकाश दिखाई
पड़ता है ।'४
'हे बैकुंठनाथ ! तेरी लीला अगाध है । मैं तुझे प्रणाम करता हूँ । मैं प्राणि-
मात्र में तुझे देखता हूँ। जल, थल, काष्ट, पाषाण सबमें तू है । निगमागम तथा पुराण
१. जौ पै करता वरण विचारे ।
तो जनमत तीनि डाँडि किन सारे ॥ टेक ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद ४१, पृ० १०१ ।
२. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
हिंदू तुर्क दुइ दीन बने हैं कछु नहीं पहचनियां ।
—संक्षिप्त सन्त सुधा-सार, पृ० ४८ ।
३. अरे इन दोउन राह न पाई ।
हिंदुन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन राह ह्वै जाई ॥
—संक्षिप्त सन्त सुधा-सार, पृ० ५४ ।
१. एक अनेक बिआपक रज जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र बिमोहित बिरला बूझै कोई ।
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहिं कोई ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२५
तेरा गुण गाते है ।'१
'हे परमात्मा ! तेरी गति तू ही जानता है, अल्प मति जीव उसका क्या वर्णन
कर सकेंगे ? लोग जैसा तुझे बताते हैं वैसा तू नही है। तू जैसा है, वैसा है ।'२
नामदेव कहते है कि उस निगुंण ब्रह्म का हम वर्णन नही कर सकते । वैसा
उसका वर्णन करने लगे तो कागज बिगड़ जाता है । ऐसे सकल भुवन पति मुझे सहज
ही मिले है ।३
निगुंण ब्रह्म का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैं कि उसके किसी प्रकार का
रूप तथा आकार नही है । उसके रूप अरूप भी नही है । वह पुष्प की सुगन्ध से सूक्ष्म
अनुपम तत्त्व है ।४
'वह गुणरहित है उसका नाम नही रखा जा सकता । वह 'गुन विहूँन' है ।'५
सन्त रैदास उस परम तत्त्व का परिचय इस प्रकार देते है—'वह निगुंण ब्रह्म
अगम, अगोचर, अविनाशी तथा अतर्क्य है । वह सदा अज्ञेय है । वह जीव-मुक्त महा-
पुरुषों के लिए काशी सदृश आधार स्थल है ।'६
१. तूं अगाध बैकुंठनाथा । तेरे चरनौ मेरा माथा ॥
सबै भूत नाना पेषूं । जत्र जाऊँ तत्र तू ही देखूं ॥
जल थल मही थल काष्ट पषाना । आगम निगम सब वेद पुराना ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२ ।
२. तेरी गति तू ही जाने । अल्प जीव गति कहा बखाने ॥ टेक ॥
जैसा तूं कहिये तैसा तू नाही । जैसा तू है तैसा आधि गुसाईं ॥ १ ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४ ।
३. अकथ कथ्यौ न जाइ । कागद लिख्यौ न माइ ।
सकल भुवनपति मिल्यौ है सहज भाई ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६ ।
४. जाके मुंह माथा नही नाहिं रूप अरूप ।
पुहुप वास से पातस, ऐसा तत्व अनूप ॥ —कबीर वचनावली, पृ० १ ।
५. अवगति की गति क्या कहूँ जसकार गाँव न नाँव ।
गुन विहूं का पेखिये, काकर धरिये नांव ॥ —कबीर ग्रन्थावली, पृ० २२६ ।
६. निश्चल निराकार अज अनुपम निरभय गति गोविंदा ।
अगम अगोचर अच्छर अतरक निरगुन अंत अनदा ॥
सदा अतीत ज्ञानघन बर्जित निरविकार अविनासी ।
कहै रैदास सहज सुन्न सत, जीवन मुक्त निधि कासी ॥
—सन्त काव्य, पृ० १८६ ।
३२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सन््त रज्जब के अनुसार—'वह सब में समान रूप से विद्यमान है। वह सदा
एक रस है। वह किसी से लिप्त नहीं है। रज्जब कहते हैं कि ऐसे जगपति की लीला
कोई विरला ही जानता है।’१
(१) करनी तथा कथनी में एकता—संतों ने व्यवहार और आदर्श के साथ
विचार और आचरण में सामंजस्य लाने पर बल दिया है। उन्होंने जो कुछ लिखा है
अपने अनुभव के आधार पर लिखा है। उन्होंने जैसा उपदेश दिया वैसा आचरण भी
किया। उनकी उक्ति तथा वृत्ति में कदाचित् ही कोई विरोध मिले। निर्गुण मत के
सभी सन्तों में इस ढंग की बात मिलती है। नामदेव ने भी करनी बिना कथनी की
आलोचना की।
'जब तक अंत करण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि से क्या लाभ ?
सांप केंचुली छोड़ता है परन्तु विष नहीं छोड़ता। पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते,
रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'२
'व्यक्ति बातें तो बहुत बढ़ा चढ़ाकर करता है किन्तु विरला ही कोई उनको
कार्यान्वित करता है।'३
'पाखंडपूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'४
कबीर ने भी "करनी बिना कथनी" की निंदा की है। उनके अनुसार जब
तक मनुष्य के वचन और कर्म में मेल नहीं होगा तब उसका सारा परिश्रम व्यर्थ है।
जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे नरक
१. सरवगो समसरि सब ठाहर काहू लिपित न होई ।
उन रज्जब जगपति की लीला, बूझै विरला कोई ॥
—संत काव्य, पृ० ३३२।
२. काहे कूं कीजै ध्यान जपना जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छोड़ै विष नहीं छाडै । उदिक में बग ध्यान माझै ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
३. कथनी वदनी सब कोई कहै।
करनी जन कोई विरला रहै।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७७।
४. पाखंड भगति राम नहीं रीझै।
बाहरि आधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।