सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२५
तेरा गुण गाते है ।'१
'हे परमात्मा ! तेरी गति तू ही जानता है, अल्प मति जीव उसका क्या वर्णन
कर सकेंगे ? लोग जैसा तुझे बताते हैं वैसा तू नही है। तू जैसा है, वैसा है ।'२
नामदेव कहते है कि उस निगुंण ब्रह्म का हम वर्णन नही कर सकते । वैसा
उसका वर्णन करने लगे तो कागज बिगड़ जाता है । ऐसे सकल भुवन पति मुझे सहज
ही मिले है ।३
निगुंण ब्रह्म का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैं कि उसके किसी प्रकार का
रूप तथा आकार नही है । उसके रूप अरूप भी नही है । वह पुष्प की सुगन्ध से सूक्ष्म
अनुपम तत्त्व है ।४
'वह गुणरहित है उसका नाम नही रखा जा सकता । वह 'गुन विहूँन' है ।'५
सन्त रैदास उस परम तत्त्व का परिचय इस प्रकार देते है—'वह निगुंण ब्रह्म
अगम, अगोचर, अविनाशी तथा अतर्क्य है । वह सदा अज्ञेय है । वह जीव-मुक्त महा-
पुरुषों के लिए काशी सदृश आधार स्थल है ।'६
१. तूं अगाध बैकुंठनाथा । तेरे चरनौ मेरा माथा ॥
सबै भूत नाना पेषूं । जत्र जाऊँ तत्र तू ही देखूं ॥
जल थल मही थल काष्ट पषाना । आगम निगम सब वेद पुराना ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२ ।
२. तेरी गति तू ही जाने । अल्प जीव गति कहा बखाने ॥ टेक ॥
जैसा तूं कहिये तैसा तू नाही । जैसा तू है तैसा आधि गुसाईं ॥ १ ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४ ।
३. अकथ कथ्यौ न जाइ । कागद लिख्यौ न माइ ।
सकल भुवनपति मिल्यौ है सहज भाई ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६ ।
४. जाके मुंह माथा नही नाहिं रूप अरूप ।
पुहुप वास से पातस, ऐसा तत्व अनूप ॥ —कबीर वचनावली, पृ० १ ।
५. अवगति की गति क्या कहूँ जसकार गाँव न नाँव ।
गुन विहूं का पेखिये, काकर धरिये नांव ॥ —कबीर ग्रन्थावली, पृ० २२६ ।
६. निश्चल निराकार अज अनुपम निरभय गति गोविंदा ।
अगम अगोचर अच्छर अतरक निरगुन अंत अनदा ॥
सदा अतीत ज्ञानघन बर्जित निरविकार अविनासी ।
कहै रैदास सहज सुन्न सत, जीवन मुक्त निधि कासी ॥
—सन्त काव्य, पृ० १८६ ।