सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०७
परम तत्व की उपलब्धि होने पर अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति होती है ।
नाथपंथी उस अनिर्वचनीयता को इस प्रकार व्यक्त करते है ।१
इस सम्बन्ध में सिद्ध लुइपा (६वी शताब्दी) का कथन भी दृष्टव्य है ।२
इस अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्ति गुरु उपदेश के बिना असंभव है । सरहपा
कहते हैं कि जिसने दौड़कर गुरु-उपदेश के अमृत रस का पान नही किया वह वृथा
शास्त्रार्थ रूप मरुस्थल में प्यासा ही मर गया ।३
इसी तरह नाथ पंथ में "निगुरे" की गति नही है ।४
चरपटी नाथ (गोरखनाथ के थोड़े परवर्ती) बाह्याडम्बरों की निंदा करते हुए
कहते हैं—"नहा धोकर अंग प्रक्षालन करता है । बाहर से तो स्वच्छ है परन्तु भीतर
से मलीन । होम तथा जप भी करता है । एकादशी का व्रत भी रखता है किन्तु परब्रह्म
का स्मरण नही करता ।"५
नाग अरजुन (१२वीं शताब्दी) कहते हैं कि "अहंकार को दूर कर गुरु को
१. शिवं न जानामि कथं वदामि ।
शिवं च जानामि कथं वदामि ॥
२. भाव न होई, अभाव न होई ।
अइस संबोहे को पतिआइ ।
३. गुरु-उपए से अमिअ-रस ।
धावण पीअउ जेहि ॥
बहु सत्यत्थ मरुत्थलहि ।
तिसिए मरिअउ तेहि ॥
—"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य"
शीर्षक लेख 'साहित्य सन्देश, मार्च १६५३ से उद्धृत ।
४. गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला ।
गुरु बिन ज्ञानं न पाइला रे भाईला ॥
—"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य"
(शीर्षक लेख) "साहित्य सन्देश" मार्च १६५३ से उद्धृत ।
५. न्हावै धोवै पषालै अंग ,
भीतरि मैला बाहरि चंग ॥
होम जाप इग्यारी करै ।
पारब्रह्म के सुध न धरै । ।१५।। ।१५६।।
—नाथ सिद्धो की बानियाँ, पृष्ठ २७ ।