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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 332 में से

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पृष्ठ 298

१०६ नामदेव की हिन्दी कविता
गोरखपन्थी योगियो के अनुसार सारे तीर्थं काया गढ के भीतर ही है ।१
जिस तरह अन्त साधना पर इन दोनो पदो में जोर दिया गया है उसी तरह
बाह्याडम्बरो के तीव्र विरोध पर भी क्योकि बाह्याडम्बर अन्त. साधना का प्रबल शत्रु है।
बोधिसत्वो को ब्रह्मा, विरणु, महेशादि की पूजा नही करनी चाहिए । पत्थर
आदि देवताओ की भी पूजा नही करनी चाहिए । न तीर्थ जाना चाहिए । बाह्य देव-
पूजा से मोक्ष नही मिलता ।२
भिन्न भिन्न तीर्थों मे घूम कर अनेक देवताओ की पूजा वा आराधना को योगियो
ने मूर्खता कहा है ।३
वेद पुराणादि के अध्ययन से पडित फूला नही समाता किन्तु जैसे पके बेल के
चारो ओर भौरा मँडराता ही है, कुछ पाता नही वैसे ही यह पडित भी बाहर ही बाहर
भ्रमता है, कुछ समझता नही ।४
गोरख (९वीं शताब्दी) ने शास्त्रीय ज्ञान की स्पष्ट शब्दो मे निंदा की है ।५
"नाद' और "बिन्दु" इन दोनो तत्त्वो से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है इसे
सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पथ दोनो ही स्वीकार करते है ।६
१. घट ही भीतर अठसठी तीरथ ।
कहां भ्रमई रे भाई ॥
२. ब्रह्मा विहणु महेसुर देवा ।
बोहिसत्त ना करहु सेवा ।
देव ण पूजहु तिरथ ण जावा ।
देव पूजा ही तिरथ ण जावा ॥
—साहित्य सन्देश (मार्च १९५३) पृष्ठ ३६८ ।
३. न्हाइये नो तीरष न पूजिये को देव ।
भणंत गोरख अलख अभेव ॥
४ आगम वेअ पुराणेहि पण्डिअ माण वहंति ।
पक्क सिरिफले अलिअ जिमि बहिरिअ भ्रमन्ति ॥
५ वेदे न शास्त्रे कतेबे न पुराने ।
पुस्तवे न बाच्या जाई ।
तेवत जाणै विरला योगी ।
और दुनि सब धंधे लागी ॥
६. नादांशो नादो नादांश प्राण । शक्त्यंशो बिन्दु ।
बिन्दोरंश शरीरम् ।