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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 332 में से

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पृष्ठ 310

३१८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब के अनुसार दादू पंथ में बाह्याचारों का बिल्कुल महत्त्व नहीं है।
जो, बाह्याचारों के साधन-स्वरूप माला, तिलक, तीरथ, मूर्ति आदि का त्याग करता है
वह दादू पंथ में परम पुरुष के समान माना जाता है ।¹
(६) अनन्य प्रेम भावना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । संत नामदेव कहते है—'राम की वंदना
कर मैं और किसी की वंदना न करूँगा । मेरा लौकिक जीवन भले ही नष्ट हो मैं अपना
पारलौकिक जीवन नष्ट न होने दूंगा । मैं अन्य देवताओं से याचना न करूँगा । केवल
राम रसायन का आस्वाद लूँगा ।'²
क्योकि उन्हें विश्वास है कि परमात्मा प्राणि-मात्र में समाया हुआ है ।'³
और यही कारण है कि जिसके लिए उन्होंने त्रिभुवन की खाक छानी वह अमो-
लिक 'वस्तु' उनको अपने हृदय में ही मिली । नामदेव कहते हैं कि अब मुझे कही
आने-जाने की आवश्यकता नहीं है । मैं घर बैठे अपने हृदयस्थ राम के गुण गाऊँगा ।⁴
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेमभावना को नामदेव के ढंग पर ही अपनाया है ।
वे अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं—'हे मन ! तू अनस्थिरता या चंचलता
की वृत्ति को छोड़ दे । जब तूने आत्मोपलब्धि के व्रत का अंगीकार कर लिया तो तुझे
अब अपने को जला कर समाप्त कर देने में ही कुशल है ।'⁵
'अजी ओ गुसांईं ! मैं आपका गुलाम हूँ । मुझे बेच दो । यह सारा तन मन
१. माला तिलक न मानई, तीरथ मूरति त्याग ।
सो दिल दादू पंथ में परम पुरुष सूँ लाग ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३१३ ।
२. राम जुहारि न और जुहारौं । जीवति जाइ जनम कत हारौं ।
आन देव सौं दीन न भाषौं । राम रसाइन रसना चाषौं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
३. थावर जंगम कीट पतंगा सुरय राम सबहिन के संगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये । सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहे कहूँ आइये न जाइये । अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६ ।
५. डग मग छांड़ि दे मन बौरा ।
अब तो जरै बरै वनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधौरा ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १६६ ।