सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३११
का अविभाज्य अंग है ।"१
(२) प्रत्यक्ष अनुभव से सत्यान्वेषण—नामदेव स्वानुभूति पर बल देते हैं ।
उन्होंने श्रुतिप्रामाण्य अथवा शब्द-प्रमाण का विरोध किया है । वे "रिदै" (हृदय) में
विचार करने पर जोर देते हैं । वे कहते हैं कि हृदय में विचार कर देखो तो पता
चलेगा कि घट-घट में वही एक मुरारी व्याप्त है ।२
नामदेव ने सत्य का कितना मार्मिक रूप उद्घाटित किया है । वे कहते हैं—
'हे परमात्मा ! सकल जीवों की उत्पत्ति आपसे हुई है । सकल जीवो में आप हैं । आप
घट-घट व्यापी हैं । संसार के लोग माया से मोहित होने के कारण इस बात को
जानते नहीं ।'३
अपने इसी सत्यान्वेषण के आधार पर वे डंके की चोट पर यह निर्णय देते हैं
कि राम की भक्ति के बिना संसार सागर को पार करने की कोई मार्ग नहीं है ।४
नामदेव के परवर्ती संत कबीर ने भी कोरे पांडित्य की निंदा की है । वे पंडितों
को संबोधित करते हुए कहते हैं—'मैं आँखिन देखी' अर्थात् स्वानुभव की बात कहता
हूँ और तू 'कागद की लेखी' अर्थात् 'श्रुति प्रामाण्य' को लेकर चलता है । मै सुलझाने
वाली बात कहता हूँ तो तू उलझानेवाली कहता है ।'५
१. अमित मिल्या सब ठौर है अकल सकल सब मांहि ।
रज्जब अजब अगह गति काहूँ न्यारा नाहिं ।
—सत काव्य, पृष्ठ ३३६ ।
२. कहत नामदेऊ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ।
घट-घट अंतरि सरब निरंतरी केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
३. जामै सकल जीव की उत्पति । सकल जीवमै आप जी ।
माया मोह करि जगत भुलाया घटि घटि व्यापक बाप जी ।
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ४८ ।
४. राम भगति बिन गति न तिरन की ।
कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६२ ।
५. मै कहता हूँ आँखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे ।
मै कहता सुरझावनहारी, तूं रह्यो अरुझाई रे ॥
—कबीर ग्रन्थावली ।