सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२१
(८) भेदभाव विहीनता--जिस भेदभाव विहीनता का बीजारोपण स्वामी
रामानुजाचार्य ने किया था तथा जो भागवत में भी यत्र तत्र प्रतिध्वनित मिलती है,
हीन जाति के होने के कारण सन्त नामदेव ने उसका निराकरण किया। उनकी वाणी
में अनेक स्थलों पर यह बात ध्वनित हुई है।
'हे यादवराय ! मेरी जाति हीन है। भला मैने छीपे के घर जन्म क्यों लिया ?
जिसके फलस्वरूप मैं भक्ति करने से वंचित रखा गया ?'१
'हिंदू अंधा है और मुसलमान काणा। इन दोनो में ज्ञानी चतुर है। मैं तो ऐसे
भगवान् को आराधना करता हूँ जो न मंदिर में है न मसजिद में।'२
नामदेव भक्ति के क्षेत्र में जाति-पाँति के झगड़े को निरर्थक समझते थे। उन्होंने
स्पष्ट रूप से कहा है-'मै जाति-पाँति को लेकर क्या करूं? मै तो दिन-रात राम नाम
का जप करता हूँ।'३
अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त इस बात का अनुसरण कबीर ने भी किया है।
वे कहते हैं सभी मानवों को हरिजन होना है। उनको ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र,
ईसाई या मुसलमान नहीं होनी है। मानव के ये रूप भक्त रूप से तुच्छ हैं। भक्त के
समान ये नहीं है।४
जाके कुटुम्ब सब ढोर ढोवंत फिरहि अजहुँ बनारसी आसपासा ।
आचार सहित विप्र करहिं डडउति तिन तन रैदास दासानुदासा ॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, रैदास रागु मलार २ ।
१. हौनडी जात मेरी जादिम राइआ ।
छीपे के जनमि काहे कउ आइआ ॥
—पञ्जाबातील नामदेव, पृ० १२६ ।
२. हिन्दू अन्ना तुरकू काणा दोहां ते गिआनो सिआणा ।
हिन्दू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीत ।
नामै सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०८ ।
३. का करी जाती का करी पाती। राजाराम सेकौं दिन राती।
—सन्त नामदेव की पदावली, पद १८ ।
४. अवरन वरन न गनिय रंक धनि, विमल वास निज सोई।
बाह्मन छत्रिय वैस सूद्र सब भगत समान न कोई ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृ० ५५ ।
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