सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ नामदेव की हिन्दी कविता
स्थान देकर, "उनमन की डोरी" से जब मन खींचा जाता है तब परम ज्योति का
साक्षात्कार होता है ।"१
हणवंतजी (चौदहवीं शताब्दी के पूर्व के) "घट" के भीतर ही परम तत्त्व का
साक्षात्कार कर लेने को कहते हैं—"अड़सठ तीर्थ जिसके चरणों में है वही देव तुम्हारे
अन्तःकरण में है । उसे पाने के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता नही ।"२
घूघली मल (१४वीं शती का उत्तरार्द्ध) कहते हैं—'जो सोये वे नष्ट हुए ।
उनका जन्म व्यर्थ हो गया । काल रूपी अहेरी ने देखते-देखते काया रूपी हरिणी का
तथा संसार का संहार किया ।"३
नामदेव के समकालीन संत
सिक्खों के चौथे गुरु अर्जुनदेव ने सं० १६६१ में जिस "आदि ग्रंथ" का संग्रह
कराया उसमें स्वामी रामानन्द और उनके शिष्यों की कविताएं भी संगृहीत है । इनके
अतिरिक्त जिन अन्य संतों की कविता का भी "आदि ग्रन्थ" में संग्रह किया गया है वे
हैं जयदेव, नामदेव और त्रिलोचन । इनमें से अंतिम दो का नाम कबीर ने कई बार
१. आपा भेटिला सतगुर थापिला ।
न करिबा जोग जुगति का हेला ।
उनमन डोरी जब पेंचीजा ।
तब सहज जोति का मेला ॥२॥ ॥४२६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ ६७ ।
२. अटसठि तीरथ जाके चरणा ।
सोई देव तुम्हारे अंतहकरणा ।
हणवंत कहै मन अस्थिर धरणा ।
बाहिर कितहू भटकि न भरणां ॥६॥ ७४६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ १२७ ।
३. आइस जी सोवो ॥
बाबा से सूता ते परा विगूता ।
जनम गया अरु हारया ॥
काया हिरणी काल अहेड़ी ।
हम देखत जग मार्या ॥६॥ ४१६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ ६५ ।