सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 297, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०५
से जो उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं उनसे स्पष्ट होता है कि नामदेव उनसे किस
प्रकार प्रभावित हैं। नामदेव ने भी उसी प्रकार की बातें कही हैं जिस प्रकार की इन
नाथों तथा सिद्धों ने कही हैं। कुछ उदाहरण नामदेव के समकालीन नाथों की रचनाओं
से भी प्रस्तुत किये गये हैं।
सिद्ध और नाथ पंथी दोनों दार्शनिक योगी थे, परम तत्त्व के अन्वेषक। दोनों
ने परमात्मा को बाह्य जगत में न ढूंढ़ा। "घट" के भीतर ही परम तत्त्व का निवास
है। वही शून्य का साक्षात्कार हो सकता है। दोनों का यही सिद्धांत था। फलतः दोनों
ने अन्तःसाधना पर जोर दिया। सरह (८वीं शताब्दी) ने 'घट' के बाहर परमात्मा
को ढूंढने वाले पंडितों को खूब फटकारा "घट" में बुद्ध है यह नहीं जानता। आवागमन
को भी खण्डित नहीं किया। तो भी निर्लज्ज कहता है कि मैं 'पण्डित हूँ।'१
'मूर्ख जो वस्तु घर में है उसे बाहर ढूंढता है। जैसे कोई मूढ़ नारी पति को
सामने देख रही हो फिर भी पड़ौसी से पूछ रही हो कि वह कहाँ है। अरे मूर्ख आत्मा
को पहचानने की कोशिश कर क्योंकि वह ध्यान, धारण या जप से नहीं मिलता।'"
नाथ पंथियों ने भी परम तत्त्व को न हिन्दू के मन्दिर में देखा न मुसलमानों
की मस्जिद में। क्योंकि योगी तो उसे वहाँ देखता है जहाँ न मन्दिर है न मस्जिद।
अर्थात् अपने 'घट' मे ही उसका साक्षात्कार करता है।३
१. पंडिअ सअल सत नवखाणइ ।
देहहहि बुद्ध वसन्त ण जाणइ ।।
अमणा गमण ण तेन विखण्डिअ ।
तोवि णिलज्ज भणइ हउं पण्डिअ ।।
"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पंथ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य" शीर्षक लेख
--"साहित्य सन्देश" मार्च १६५३ पृष्ठ ३६८ ।
२. घरे अच्छइ बाहिरे पुच्छइ ।
पहु देखइ पडियेसो पुच्छइ ।।
सरह भणइ वड़ झाणउ अप्पा ।
णउ सो धेअण, धारण जप्पा ।।
३. हिंदू ध्यावै देउरा ।
मुसलमान मसीत ।।
योगी ध्यावै परम पद ।
जहाँ देउरा न मसीत ।
-'साहित्य सन्देश' (मार्च १६५३) पृ० ३६८ ।
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