सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 314, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें३२२ नामदेव की हिन्दी कविता
यदि सिरजनहार चार वर्णों के भेद का विचार करता तो वह जन्म से ही एक
समान सबके साथ भौतिक, दैहिक और दैविक ये तीन दण्ड क्यों लगा देता ? कोई
हल्का ( छोटा ) नही है। जिसके मुख में राम नाम नहीं है वह छोटा है ।१
सन्तो की जाति नही पूछनी चाहिए। उनकी जाति नही होती । सभी जातियों
में सन्त हुए हैं। सभी लोगो को सन्तों के चरित्र से शिक्षा लेनी है ।२
कबीर ने हिन्दुओं के तीर्थ व्रत और पूजा की निंदा की तो मुसलमानों के रोजा
नमाज की भी खूब खबर ली । इस प्रकार उन्होंने दोनों की बुराइयों का दिग्दर्शन
किया ।३
(६) ब्रह्म की निर्गुणता—प्रसिद्ध है कि नामदेव पहले मूर्तिपूजक और सगुणो-
पासक थे किन्तु बाद में कट्टर निर्गुणोपासक हो गये । वे ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप में
विश्वास करते थे । ब्रह्म के इस निर्गुण रूप का वर्णन उन्होने अनेक प्रकार से अनेक
स्थलो पर किया है ।
'वह निर्गुण ब्रह्म अनेक ओर एक सब कुछ है । सर्वत्र उसी का प्रकाश दिखाई
पड़ता है ।'४
'हे बैकुंठनाथ ! तेरी लीला अगाध है । मैं तुझे प्रणाम करता हूँ । मैं प्राणि-
मात्र में तुझे देखता हूँ। जल, थल, काष्ट, पाषाण सबमें तू है । निगमागम तथा पुराण
१. जौ पै करता वरण विचारे ।
तो जनमत तीनि डाँडि किन सारे ॥ टेक ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद ४१, पृ० १०१ ।
२. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
हिंदू तुर्क दुइ दीन बने हैं कछु नहीं पहचनियां ।
—संक्षिप्त सन्त सुधा-सार, पृ० ४८ ।
३. अरे इन दोउन राह न पाई ।
हिंदुन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन राह ह्वै जाई ॥
—संक्षिप्त सन्त सुधा-सार, पृ० ५४ ।
१. एक अनेक बिआपक रज जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र बिमोहित बिरला बूझै कोई ।
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहिं कोई ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।