सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० नामदेव की हिन्दी कविता
सारे जगत् को वे एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखते हैं ।
नामदेव कहते हैं— 'ईश्वर एक है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है । जिधर
भी देखो वही दिखलाई पड़ता है । माया के विचित्र चित्रों से संसार मुग्ध है, कोई
विरला ही उसे जान पाता है ।' १
कबीर साहब कहते हैं—"सगुण में निर्गुणत्व का आरोप एवं निर्गुण के लिए
सगुणत्व की भावना स्वाभाविक है । इसे त्याग, दोनों में से किसी भी एक ओर बहना
ठीक नहीं । उस अलक्ष्य के लिए अजर अमर आदि कहना भी उपयुक्त नहीं । उसका
कोई रूप नहीं, कोई वर्ण नहीं । वह घट-घट वासी है, सर्वव्यापक है ।' २
गुरु नानक कहते हैं—' घट घट में वह परम तत्त्व, वह परब्रह्म छिपा हुआ है ।
घट-घट में उसकी ज्योति प्रकाशित है ।' ३
ब्रह्म की सर्वव्यापकता का वर्णन करते हुए दादू कहते हैं—"मै उस निरंजन
को सदा अपने पास ही देखता हूँ । क्या भीतर क्या बाहर वह समान रूप से सारे संसार
में समाया हुआ है ।' ४
संत रज्जब अपनी ब्रह्म की अनुभूति का वर्णन करते हुए कहते हैं—"वह
अप्राप्य सब जगह प्राप्त होता है । सभी ठौर उसके दर्शन होते हैं । वह सब में समाया
हुआ है । उसकी गति बड़ी अज्ञेय है । वह किसी से अलग नहीं है । वह हर एक वस्तु
१. एक अनेक विआपक पूरक जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझे कोई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
२. संतो धोखा कासू कहिये ।
गुण में निर्गुण निरगुण में गुण है बाट छांड़ि क्यो बहिये ॥टेक॥
अजरा अमर कथै सब कोई अलख न करणा जाई ।
नाति सरूप वरण नहि जाकै, घटि-घटि रह्यो समाई ।
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १४६, पद १८० ।
३. घट-घट अंतरि ब्रह्म लुकाइया, घटि-घटि जोति समाई ।
वजर कपाट भुरेत गुरमती, निरभै ताड़ी लाई ।
संत काव्य, पृष्ठ २२० ।
४. निकटि निरंजन देखिहौ छिन दूरि न जाई ।
बाहरि भीतरि येकरा, सब रह्या समाई ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २५३ ।