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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 305

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१३
किया है।¹
कबीर ने गुरु के महत्त्व का वर्णन मुक्त कण्ठ के किया है। उनके लिए तो गुरु
तथा गोविन्द दोनों में कोई अन्तर नही है। गुरु तो गोविन्द का दूसरा रूप ही है। इस
लिए जो व्यक्ति गुरु की सेवा में अपने को मिटा देता है वही ईश्वर को प्राप्त कर
सकता है।²
कबीर साहब कहते हैं कि मेरे समक्ष गुरु और गोविन्द दोनो खड़े हैं।
मै किस के चरण पकड़ू ? हे गुरु आप धन्य हैं कि आपने मुझे गोविन्द से मिला
दिया।³
गुरु नानक गुरु के महत्त्व का वर्णन करते हुए कहते हैं—गुरु के उपदेश से
ब्रह्मादि देवता तथा कितने ही मुनि तरे। सनक सनंदन जैसे तपस्वी महात्मा गुरु-कृपा
से पार हुए।⁴
दादू गुरु के अनुग्रह का वर्णन इस प्रकार करते—'सद्गुरु ने अंजन का प्रयोग
कर मेरे नयन-पटल खोल दिये। गुरु-कृपा से बहरे कानों से सुनने लगे तथा गूँगे
बोलने लगे।'⁵
अन्य एक स्थल पर कहते हैं—'समर्थ गुरु ने मुझे परम तत्त्व के दर्शन कराये।
१. मन मेरी सुई तनो मेरा धागा।
खेचरजी के चरण पर नामा छिपी लागा ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १८८।
२. गुर गोविंद तो एक है दूजा यहु आकार ॥
आपा मेट जीवत मरे तो पावै करतार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३।
३. गुरु गोविंद दोऊ खडे काके लागौ पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार । पृ० ५६।
४. गुर के सबदि तरे मुनि केते, इंद्रादिक ब्रह्मादि वरे ।
सनक सनंदन तपसी जन केते, गुर परसादी पारि परे ॥
—संत काव्य, पृ० २१० ।
५. दादू सतगुर अंजन बाहि करि नैन पटल सब खोले ।
बहरे कानीं सुनने लागे गूँगे मुख सौं बोले ॥
—संत काव्य, पृ० २५६ ।