सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
DevanagariHindipublished332 पृष्ठ
पृष्ठ 316, कुल 332 में से
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३२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सन््त रज्जब के अनुसार—'वह सब में समान रूप से विद्यमान है। वह सदा
एक रस है। वह किसी से लिप्त नहीं है। रज्जब कहते हैं कि ऐसे जगपति की लीला
कोई विरला ही जानता है।’१
(१) करनी तथा कथनी में एकता—संतों ने व्यवहार और आदर्श के साथ
विचार और आचरण में सामंजस्य लाने पर बल दिया है। उन्होंने जो कुछ लिखा है
अपने अनुभव के आधार पर लिखा है। उन्होंने जैसा उपदेश दिया वैसा आचरण भी
किया। उनकी उक्ति तथा वृत्ति में कदाचित् ही कोई विरोध मिले। निर्गुण मत के
सभी सन्तों में इस ढंग की बात मिलती है। नामदेव ने भी करनी बिना कथनी की
आलोचना की।
'जब तक अंत करण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि से क्या लाभ ?
सांप केंचुली छोड़ता है परन्तु विष नहीं छोड़ता। पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते,
रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'२
'व्यक्ति बातें तो बहुत बढ़ा चढ़ाकर करता है किन्तु विरला ही कोई उनको
कार्यान्वित करता है।'३
'पाखंडपूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'४
कबीर ने भी "करनी बिना कथनी" की निंदा की है। उनके अनुसार जब
तक मनुष्य के वचन और कर्म में मेल नहीं होगा तब उसका सारा परिश्रम व्यर्थ है।
जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे नरक
१. सरवगो समसरि सब ठाहर काहू लिपित न होई ।
उन रज्जब जगपति की लीला, बूझै विरला कोई ॥
—संत काव्य, पृ० ३३२।
२. काहे कूं कीजै ध्यान जपना जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छोड़ै विष नहीं छाडै । उदिक में बग ध्यान माझै ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
३. कथनी वदनी सब कोई कहै।
करनी जन कोई विरला रहै।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७७।
४. पाखंड भगति राम नहीं रीझै।
बाहरि आधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।