सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० नामदेव की हिन्दी कविता
स्थान नही ।१
(७) श्रम और अध्यात्म भावना का समन्वय — प्रत्येक भक्त को उत्पादक श्रम
करना चाहिए। नामदेव, कबीर, रैदास, सेना आदि भक्तो ने जीवन पर्यन्त अपना पेशे-
वर कार्य किया । नामदेव ने स्थान स्थान पर अपने को 'सिंपी' जाति का और तदनुसार
कपडे सीने और रंगने के व्यवसाय का उल्लेख किया है । नामदेव कहते है — 'मैं कपड़ा
रँगने और सिलने का काम करता हूँ । घड़ी भर के लिए भी भगवन्नाम को विस्मृत नही
करता हूँ । मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है । नामदेव कहते हैं — मेरा चित
भगवान से लगा हुआ है ।'२
नामदेव की यह प्रवृत्ति कबीर में भी पाई जाती है । ज्ञान भक्ति की सतत्
साधना करते हुए भी कबीर ने अपना घरेलू व्यवसाय नही छोड़ा ।३ काढ़ा बुनते समय
भी उनकी लौ राम से ही लगी रहती थी ।४
कबीर के समान सन्त रैदास की वाणी में भी यही भावना पल्लवित है ।५
१. पतिव्रता के पीव बिन पुरुष न जन्म्या कोइ ।
त्यू रज्जब रामहि रचै, तिनके दिल नहि दोई ॥
— सत काव्य, पृष्ठ ३३७ ।
२ मन मरो गजु जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटउ जम की फाँसी ॥ १ ॥
राँगनि राँगउ सीवनि सीवउ ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली पद, १८ ।
३. हम घर सूत तनहि नित ताना, कंठ जनेऊ तुम्हारे ।
तुम तो वेद पढ़हु गायत्री गोविंद रिदै हमारे ॥
तू बाह्मन मैं कासी का जुलाहा बूझहु मोर गियाना ।
तुम तो पाचे भूपति राजे हरि सो मोर धियाना ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३३० ।
४ तनना बुनना तज्या कबीर राम नाम लिखि लिया सरीर ।
जब लग भरौं नली का बेहु तब लग टूटे राम सनेह ॥
—गुरु ग्रंथ साहब, गूज, २ ।
५. मेरी संगति पोच सोच दिन रातो ।
मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभाँति ॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, गउडी — १ ।