सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ नामदेव की हिन्दी कविता
अच्छी तरह जांच लिया कि रामनाम की समता अन्य कोई साधन नहीं कर सकता ।'१
(५) बाह्याडम्बर की व्यर्थता—नामदेव के अनुसार बाह्य कर्म काण्डों से कोई
लाभ नहीं होता । इनको अपना कर तो जीवन व्यर्थ ही नष्ट होता है । जब तक अंत -
करण शुद्ध नहीं है तब तक बाह्याचारों का प्रदर्शन केवल दिखावा है, ढोंग है ।
'यदि कोई शरीर में लगे कीचड़ को कीचड़ से धोना चाहता है तो वह स्वच्छ
न होगा और उसका यह प्रयास व्यर्थ ही होगा । जो भीतर से मैला और बाहर से
स्वच्छ है वह उस ढोंगी के समान है जो केवल पानी से धोता है । नामदेव कहते हैं कि
सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़कर कोई भवसागर कैसे पार कर सकता है ?'२
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । बिना विश्वास के,
बिना श्रद्धा के तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । नामदेव कहते हैं कि जब मैं अपने गन्तव्य
स्थान पर पहुँचा तब मैंने सीढ़ी छोड़ दी ।'३
मूर्ति पूजा और बलि का नामदेव ने बार-बार खण्डन किया है ।'४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है । 'मन स्थिर हो अथवा
न हो लोग दिखावा अवश्य करते हैं । अंतःकरण तो मलीन है फिर भवसागर कैसे पार
हो सकता है ? बिना उसका मर्म जाने रुद्राक्ष माला, छापा, तिलक आदि का प्रयोग
करने से क्या लाभ ? स्वयं अज्ञानी होकर दूसरों को मार्ग-दर्शन करने का दावा करते
१. अरध सरीरु कटाइऐ सिरि करवतु धराइ ।
तनु हेमंचलि गालोअै भी मन तेरो गुन गाइ ।
हरि नामै तुलि न पूजई सभ फिठो ठोकि बजाइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१८ ।
२. लागो पंक पंक से धोवै । निर्मल न होवै जनम विगोवै ।
भीतरि मैला बाहिरि धोया । पाणी पिंड पखाले धोया ।
नामदेव कहै सुरही परहरिये । भेड़ पूँछ कैसे भवजल तरिये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
३. तीरथ बरत जगत की बासा । फोकट सोजे बिन बिसवासा ।
एकादसी जगत को करनी । पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६ ।
४. पाहन लागे देव कटीला । वाको प्रान नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारे । दैवत जनम आपनौ हारे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।