सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०६
लिया है।¹
संत जयदेव, संस्कृत के शृङ्गारी कवि जयदेव से निश्चय ही भिन्न हैं। उनके
सम्बन्ध में कोई निश्चित प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं है। वे जिस राजा लक्ष्मण सेन
की सभा के पंच रत्नों में से एक थे उसका राजस्व काल सन् ११७० ई० से आरम्भ
होता है। अतः ये नामदेव के समकालीन नहीं हो सकते। उनके दो पद "श्री गुरु ग्रंथ
साहब" में संगृहीत हैं।
त्रिलोचन : फरकुहर ने त्रिलोचन को नामदेव का समकालीन माना है। इनकी
कुछ कविता "आदि ग्रन्थ" में संगृहीत है। इनकी अन्य रचनाएं उपलब्ध नहीं हैं।
यह बड़े खेद की बात है कि नामदेव का समकालीन संत साहित्य प्राप्त नहीं
होता। संतों की एक परम्परा होती है। किसी संत का एकाएक आविर्भाव नहीं होता।
नामदेव के समसामयिक संत अवश्य हुए होंगे, उन्होंने रचनाएँ भी की होंगी परन्तु
दुर्भाग्य से वे रचनाएँ प्राप्त नहीं होतीं। जो थोड़ी बहुत फुटकर रचनाएँ प्राप्त होती हैं
उनमें निर्गुण विचारधारा के बहुत से तत्त्व उपलब्ध होते हैं। वस्तुतः ये सारे संत उसी
परम्परा के थे। जैसा ये लोग लिख रहे थे वैसे नामदेव भी लिख रहे थे। दोनों एक
दूसरे से प्रभाव ग्रहण कर रहे थे।
नामदेव का परवर्ती साहित्य पर प्रभाव
वास्तव में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तन और कबीर तथा उत्तरी भारत की संत
परम्परा पर नामदेव का जितना प्रभाव पड़ा उतना अन्य किसी संत का नहीं। परिणाम-
स्वरूप उनकी हिंदी रचनाओं की प्रवृत्तियों का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।
कालान्तर में ये ही प्रवृत्तियाँ निर्गुण विचारधारा के संतों और उनके काव्य का प्रेरणा-
स्रोत बनीं और उसका अभिन्न अंग बन गईं।
अब हम यह सिद्ध करेंगे कि नामदेव के हिंदी पदों में निर्गुण विचारधारा की
सारी विशेषताएँ विद्यमान हैं। साथ-साथ यह दिखाने का प्रयत्न किया जायेगा परवर्ती
संत नामदेव से किस प्रकार प्रभावित हुए हैं।
(१) ईश्वर की सर्वव्यापकता-परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सबके
बाहर तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकान्तनिष्ठ होकर हमें रहना
चाहिए। इस प्रकार के भावों से नामदेव का हृदय सदा भरा रहता है और इसी कारण,
१. जाने सुक उधव अक्रूर हणवंत जागे ले लंगूर ।
संकर जागे चरन सेव कलि जागे नामा जैदेव ॥
-- कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २१६, ३८७।