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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 332 में से

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पृष्ठ 309

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१७
हैं। ऐसे कपटाचरण से मुक्ति कैसे होगी ?'१
कबीर ने मूर्ति पूजा का खण्डन किया है। उनके अनुसार जो लोग पत्थर
का पुतला बनाकर उसे कर्तार समझ कर उसकी पूजा करते हैं वे पाप की धारा में डूब
जाते हैं।२
मूर्ति पूजा ही नहीं, भक्ति से रहित जप और तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर
विश्वास करना भी कबीर के अनुसार भ्रम है। ये सब सेंबर के फूल के समान हैं जो
देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन हैं।३
संत मलूकदास कहते हैं कि अंतःकरण में यदि दया-भाव नहीं तो मक्का, मदीना,
द्वारका, बद्री-केदार आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा व्यर्थ है।४
स्वामी सुन्दरदास ने भी बाह्याचारों का विरोध किया है। जो मनुष्य-निर्मित
मूर्ति की पूजा करते हैं, तीर्थस्थानों को जाते हैं, गले में माला डालते हैं, माथे पर तिलक
लगाते हैं वे गुरु के बिना ईश्वर से मिलने का रास्ता कैसे पा सकते हैं ?५
१. मन थिर होइ वा रे न होइ । ऐसा चिन्ह करे संसार ।
भीतरि मैला धूतिग फिरै । क्यूँ उतरे भव पार ॥टेक॥
रुद्राष सपा जप माला भडै । ताको मरम न जाने कोई ॥
आप न देपै और दिवावै । कपट मुक्ति कयो होई ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे ते बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४३।
३. जप तप दीसै थोथरा तीरथ ब्रत वेसास ।
सूवै सेंवल सेविया, यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर, ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४।
४. मक्का मदिना द्वारका बद्री केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३६५।
५. तो भक्त न भावै दूरि बतावै तीरथ जावै फिरि आवै ।
जो कृत्रिम गावै पूजा लावै झूठ दिखावै बहिकावै ॥
अरु माला नांखै तिलक बनावै क्यों पावै गुरु बिन गेला ।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुन्दर न्यारा ह्वै खेला ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३४८।