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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 332 में से

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पृष्ठ 304

३१२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने ऐसे कोरे पांडित्य को समाप्त कर देने की शिक्षा दी है। 'चारो वेदो का
अध्ययन करके भी जीवात्मा का ईश्वर से भक्ति नही हुई। भक्ति के तत्त्व रूपी फल
(बाल) को तो कबीर ने अपना लिया अब पंडित लोग तो व्यर्थ के वाद विवाद को खोज
रहे है।'१
(३) सद्गुरु-महत्त्व प्रतिपादन—हमारे यहां उपनिषद् काल से ही गुरु की
महिमा चली आ रही है। गुरु के महत्त्व का कारण यह है कि साधक को अपने
साधना-काल में अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं जिससे वह कभी कभी पथभ्रष्ट भी हो
जाता है। ऐसी दुविधा की अवस्था में साधक अपने गुरु से अपनी शंकाओं की निवृत्ति
करा सकता है।
नामदेव कहते हैं कि 'सद्गुरु के बिना सत्य का अनुभव भी कैसे हो सकता है ?
गुरु ने अपने उपदेशों से मेरा जन्म सफल कर दिया। गुरु-कृपा से मुझे ब्रह्म ज्ञान रूपी
अंजन प्राप्त हो गया है।'२
यह निश्चित है कि बिना गुरु-कृपा के कुछ प्राप्त नही होता।३
गुरु ने नामदेव को सब कुछ दिया है। गुरु ने उनको अठसठ तीर्थों का दर्शन
घट के भीतर ही कराया। अतः वे कहीं आना जाना नही चाहते।४
इस संदर्भ में नामदेव ने अपने गुरु विसोबा खेचर का सश्रद्ध स्मरण
१. चारिउं वेद पढ़ाइ करि हरि सूँ न लाया हेत।
बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूँढे खेत॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३६।
२. सफल जनमु मोकउ गुर कीना॥
दुख बिसारि सुख अंतरि लीना॥
गिआन अंजतु मोकउ गुर दीना॥
राम नाम बिनु जोवनु मन हीना॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०४।
३. प्रणवत नामदेव गुरु प्रसादे। पाया तिनही सुहाया॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६४।
४. तीरथ जाऊँ न जल में पैसूँ जीव जंत न सताऊँगा।
अठसठि तीरथि गुरु लखाये। घट ही भीतरि न्हाऊँगा॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६६।