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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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पृष्ठ 311

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१६
धन आपका है।' १
'हरि मेरे प्रियतम हैं। मैं उनके बिना रह नहीं सकता । मैं उनकी बहुरिया हूँ।
वे बहुत बड़े हैं, मैं बहुत छोटी हूँ।' २
संत रैदास कहते हैं कि यह अनन्य भक्ति नहीं है। जब तक मन की प्रवृत्तियां
चंचल रहा करतो हैं तब तक वह उन्ही मे लीन रहता है। वही मन हरि से विलग
होकर कुमार्ग की ओर जाता है और काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर आदि षड्रिपुओ
को पलभर के लिए भी नहीं भूलता । ३
दादू अपनी एकान्त निष्ठा व्यक्त करते हुए कहते हैं—'हमें राम रस का यह
प्याला बहुत भाता है। रिद्धि-सिद्धि और मुक्ति आप जिसे चाहें उसे दें । मेरे मन तथा
शरीर पर तेरा अधिकार है। मेरा सब कुछ तेरा है और तू मेरा है।' ४
प्रत्येक पतिव्रता के लिए प्रियतम के रूप में कोई न कोई पुरुष अवश्य होता है ।
संत रज्जब कहते हैं कि में राम पर अनुरक्त हूँ। मेरे अन्तःकरण में और किसी के लिए
१. मै गुलाम मोहि बेचि गुसाईं ।
तन मन धन मेरा रामजी कैं ताईं ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२४ ।
२. हरि मेरा पीव भाई हरि मेरा पीव ।
हरि बिन रहि न सकै मेरा जीव ॥टेक॥
हरि मेरा पीव मै हरि की बहुरिया ।
राम बड़े मैं छुटक लहुरिया ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२५ ।
३. संतो अनिन भगति यह नाही ।
जब लग सिरजत मन पांचो गुन ब्यापत है या माही ॥
सोई आन अंतर करि हरिसों अपमारग को आने ।
काम क्रोध मद लोभ मोह की पल पल पूजा ठाने ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १८७ ।
४. प्रेम पियासा राम रस हमको भावै येह ।
रिधि सिधि मांगें मुकति फल चाहैं तिनकों देह ॥
तन भी तेरा मन भी तेरा तेरा पिंड परान ।
सब कुछ तेरा तू है मेरा यहु दादू का ज्ञान ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २६१ ।