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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव २६६
जाति-हीनत्व, क्षुद्र देवता, तीर्थों के अनाचार तथा शास्त्र-ज्ञान के अभि-
मान के विरुद्ध नामदेव की वाणी तेजस्वी हो गई। वह समझौता करना जानती ही
नही। हिंदुत्व के अभिमान को धारणा करते हुए उन्होंने विशुद्ध हृदय-धर्म को आधार
भूत सत्य माना और तत्त्व-वाद के रूप में मंदिर-मसजिद के बीच ऐसी समन्वय-भूमि
की खोज की जहाँ मनुष्य अपने मानव रूप में ही गौरवान्वित हो सकता था। इसमे
कोई संदेह नहीं कि नामदेव जैसे हीन वर्ण संतो के अडिग विश्वास ने ही धर्म-परिवर्तन
की बाढ़ को रोका। उनकी रचनाओं के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि
उनका दर्शन (निर्गुणोपासना) उत्तर भारत की नई धार्मिक तथा सामाजिक परिस्थिति
की उपज था।
महाराष्ट्र के स्वतंत्र वातावरण में उन्होंने सगुण भक्ति के आधार पर हिन्दू धर्म
के अन्तर्गत वर्णहीन सामाजिक जीवन की कल्पना की और उत्तरी भारत के इस्लामी
परिवेश में उन्होंने अपने योग-भक्ति-वेदांत के समीकरण को एक ऐसा नया रूप दिया
जो तत्कालीन सूफी मतवाद के निकट पड़ता था। वास्तव में निर्गुण मत दक्षिण के
वैष्णव भक्तिवाद का वह परिस्थितिजन्य रूप है जिसने उत्तर भारत की १४वीं शताब्दी
की हिन्दू चेतना में जन्म लिया था।
इस प्रकार नामदेव ने विदेशी संस्कृति के आघात से उत्पन्न धर्म संकोच तथा
प्रतिक्रियावाद का सामना किया। सन् १३१८ ई० के पश्चात् महाराष्ट्र में मुसलमानों
का शासन स्थापित हो जाने के बाद उत्तर भारत की तरह दक्षिण में भी सामाजिक
और धार्मिक संकट उठ खड़ा हुआ। नामदेव के वारकरी संप्रदाय को इस नई विकट
परिस्थिति का सामना करना पड़ा।
महाराष्ट्र में नामदेव की परम्परा परवर्ती संतो जैसे संत चोखामेला, संत भानु-
दास, संत निलोबा राय, जनार्दन स्वामी, दासोपंत, एकनाथ आदि में विकसित हुई और
उत्तर भारत में स्वामी रामानन्द के निर्गुणोपासक तथा सगुणोपासक शिष्यों में से होती
हुई कबीर, नानक, दादू, रज्जब तथा तुलसीदास में पल्लवित हुई। इन कवि-साधको
में हम इस्लाम के विरुद्ध प्रतिक्रिया भावना को उत्तरोत्तर तीव्र और गहन होता देखते
हैं। एकनाथ और तुलसीदास में इसकी सबसे प्रौढ़ सांस्कृतिक और साहित्यिक अभि-
व्यक्ति हमें मिलती है। डॉ० रामरतन भटनागर के अनुसार-'इस प्रकार १३०० ई०
से १६०० ई० तक मध्ययुगीन नव जागरण का चक्र बड़ी तीव्र गति से ऊपर की ओर
चढ़ता है। रामानन्द से पहले नामदेव को छोड़कर सारे उत्तर भारत में ऐसा कोई संत
नही मिलता जो इस परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हो सके। संभवतः गोरखनाथ और

३०० नामदेव की हिन्दी कविता
योगी भी इस प्रक्रिया में सहायक हुए परन्तु इस्लामी प्रहार की चोट को मुख्यतः नामदेव
ने ही संभाला ।'१
नामदेव का व्यक्तित्व
नामदेव का व्यक्तित्व महान् था । वे एक पहुँचे हुए तथा उच्चकोटि के संत
थे । उनको साक्षात्कार हुआ था । उन्होंने, जिन दिनो उत्तर भारत में अराजकता फैली
हुई थी, विदेशी आक्रमणों के कारण जनता हत-बुद्ध हो गई थी, ऐसे संक्रमण-काल में,
पंजाब में निवास कर जनता को बहुदेवोपासना, कृत्रिम आचार-विचार, जातिभेद आदि
के प्रति सजग किया । भारत में जो विदेशी संस्कृति अपने पैर जमा रही थी वह भार-
तीय जनता के इन दोषो से लाभ उठाकर अपना विस्तार कर सकती थी । नामदेव ने
ढाल बनकर हिंदू धर्म तथा भारतीय संस्कृति की रक्षा की । वैभव और शक्ति के आकर्षण
को त्यागकर हिन्दू धर्म से चिमटे रहना बड़े साहस की बात थी परन्तु हिन्दू जनता ने
तपस्या का मार्ग अपनाया । इस प्रकार की मनोदशा के लिए बड़ी तैयारी की आव-
श्यकता थी जिसकी पृष्ठभूमि नामदेव ने तैयार की । नामदेव ने अपने उपदेशो से, जैसा
कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, कबीर तथा अन्य परवर्ती सन्तो का मार्ग प्रशस्त
किया ।
नामदेव ने जहाँ उत्तर में युगानुरूप अपने क्रांतिकारी विचारो से युगान्तर
उपस्थित कर दिया वहाँ उन्होने हिंदी साहित्य की दृष्टि से खड़ी बोली के पद्य को
विभिन्न राग-रागिनियों की पद शैली भी प्रदान की । सचमुच नामदेव ने एक युग-
प्रवर्तक का कार्य किया । प्रचार तथा यातायात के साधनो का जिस काल में अभाव था,
उस काल में नामदेव ने जो महान् कार्य किया उसे देखकर हम आश्चर्यचकित हो जाते
हैं । इस्लाम के आक्रमण की छाया में उन्होंने उत्तर के हिन्दू-मात्र को भागवत् धर्म के
झंडे के नीचे एकत्रित किया । इतिहास में इसका प्रमाण मुश्किल से मिलेगा । नामदेव
की परम्परा में ही आगे चलकर रामानन्द और कबीर हुए । महाराष्ट्र के इस सन्त
कवि के ऋण से पंजाब उऋण नही हो सकता । नामदेव ने यह कार्य स्वार्थवश नहीं
बल्कि भक्ति-प्रेम तथा मानवता-प्रेम के कारण किया । परमात्मा से वे यही प्रार्थना करते
है—'सन्त सदा सुखी हों, हरि के दास चिरंजीव हो, जिनकी जिह्वा पर पाडुरंग का
नाम है उनका कल्याण हो ।'२
१. मध्ययुगीन वैष्णव संस्कृति और तुलसीदास, पृष्ठ ४ ।
—डॉ० रामरतन भटनागर ।
२. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला । माझिया सत्ता हरिच्या दासा ।
कल्पनेची बाधा न हो कोणे काळी । हे संत मण्डली सुखी असो ॥

: it has a single slanted line ending in a dot: that is ो (o-matra), NOT ौ (au-matra). So गो.
Look at the middle: व with a dot inside/above: वं.
Look at the first letter: ध.
So it is धवंगो.

  • Wait, is it "विश्वविद्यालय )" with a space before parenthesis? Yes, विश्वविद्यालय ).
  • Is it पृष्ठ ३१८ ।? Yes, पृष्ठ ३१८ ।.
  1. Final Polish on Structure and Formatting:
    • Add line numbers , , etc. for each line on the page.
    • Ensure exact match with the original layout and line breaks.नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०१
      आचार्य विनयमोहन शर्मा के अनुसार नामदेव हिंदी के अपने समय के (१)
      निर्गुण भक्ति के प्रथम प्रचारक और (२) हिंदी में गीत शैली के प्रथम गायक कहे जा
      सकते हैं।¹
      सन्त पीपा नामदेव के कर्तृत्व का गौरव इन शब्दों में करते हैं—
      जै कलि नाम कबीर न होते ।
      तौ लोक वेद अरु कलि जुग मिलि करि भगति रसातल देते ॥
      हमसे पतित कहाँ क्या कहते, कौन प्रतीति

३०२ नामदेव की हिन्दी कविता
आदि स्थानों की दो बार यात्रा की थी। पहली यात्रा उन्होंने संत ज्ञानेश्वर के साथ
की जिसका उल्लेख उनके 'तीर्थावली' के अभंगों में मिलता है।
भागवत धर्म के प्रचार तथा प्रसार को ही अपना जीवित कार्य मानकर जीवन
के उत्तरार्द्ध में, लगभग बीस वर्ष, जीवन के अन्त तक वे पंजाब में रहे। संत ज्ञानेश्वर
का लोकोद्धार का कार्य उन्होंने अखण्ड रूप से जारी रखा। उनका आदर्श था—'कीर्तन
करते समय भावावेश में आकर मैं नाचूँगा और ज्ञानदीप प्रज्वलित कर अज्ञान रूपी
अंधकार को दूर करूँगा।'१
उत्तर भारत में भागवत धर्म की ध्वजा फहराने वाले नामदेव प्रथम सन्त हैं।
पंढरपुर की भक्ति-सरिता को वे सीधे पंजाब ले गये। यात्रा काल में तथा पंजाब-निवास
के काल में अपने विचार उत्तर भारत की जनता को समझाने के लिए उन्होंने हिन्दी
को अपनाया।
सन्त नामदेव ने मराठी में अभंगों (पदों) की रचना की है जिनकी संख्या
लगभग ढाई हजार है। मराठी के अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी में भी रचना की है। उनकी
कुछ हिन्दी रचनाएँ 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में संग्रहीत हैं जिनकी संख्या ६१ है। इनके
मराठी के अभंगों का संग्रह 'नामदेव की गाथा' के नाम से प्रसिद्ध है। इस गाथा में भी
नामदेव के १०२ पद हिन्दी के संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त कई प्राचीन हस्तलिखित
पोथियाँ हैं जिनमें नामदेव के हिन्दी पद मिलते हैं। विभिन्न स्रोतों में कुल मिलाकर अब
तक लगभग तीन सौ बीस पद प्राप्त हो चुके हैं।
श्री गुरु ग्रन्थ साहब में नामदेव के पद एक स्थान पर नहीं है। वे सम्पूर्ण ग्रन्थ
में बिखरे हुए हैं। नीचे पदों की संख्या और श्री गुरु ग्रन्थ साहब के पृष्ठों की सूची दी
जा रही है जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि नामदेव के पद कहाँ-कहाँ हैं—
पृष्ठ पद संख्या
३४५ १
४८५ २ से ६ तक
५२५ ७ से ८ तक
६५५-६५६ ६ से ११ तक
६६१-६६२ १२ से १६ तक
७१८ १७ से १६ तक
८५७ २० से २३ तक
१ नाचू कीर्तनाचे रंगी। ज्ञानदीप लावू जगी।
—श्री नामदेवरायाची सार्थ गाथा (भाग तीसरा) अभंग १५६, पृ० १७६।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव २०३
८७२ २४ से २९ तक
८७२ ३० से ३३ तक
९६० ३४ से ३६ तक
११०३ ३७
११६४ ३८ से ४८ तक
११६८ ४६
११६५ ५० से ५२ तक
१२५१ ५३ से ५५ तक
१२६१ ५६ से ५७ तक
१३१८ ५८
१३४६ ५६ से ६१ तक
श्री गुरु ग्रन्थ साहब में पदो का विभाजन रागो, महलो और घरों में हुआ है।
'ग्रन्थ' की सूची में ही दिया है कि किस पृष्ठ पर नामदेव के पद हैं। गुरु नानक तथा
अन्य गुरुओ के पदों के लिए सूची में नाम नहीं है। शेष सभी सन्तो के नाम और पृष्ठ
दिये गये हैं। जिन रागो और पदो के लिए सूची में किसी का नाम नही है वे सभी पद
गुरु नानक तथा सिक्ख गुरुओं के हैं।
यहाँ एक प्रश्न स्वभावतः उठता कि सिक्खो के धार्मिक ग्रन्थ में महाराष्ट्रीय संत
नामदेव के हिन्दी पदो का संग्रह क्यो किया गया ? 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में गुरु नानक
तथा अन्य सिक्ख गुरुओं के अतिरिक्त कबीर, नामदेव, त्रिलोचन, वेणी, जैदेव, रविदास,
शेख फरीद आदि की रचनाएँ संग्रहीत है। श्री नानक और कबीर के बाद संत नामदेव
के ही पद अधिक हैं, जिससे यह प्रमाणित हो जाता है कि सन्त नामदेव की हिन्दी
रचनाएँ श्री गुरु ग्रन्थ साहब के संकलन के समय प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थी। सन्तो की
परम्परा में अन्य भी अनेक सन्त हुए होंगे किन्तु श्री गुरु ग्रन्थ के संकलनकर्त्ता ने इन्ही
सन्तो के रचनाएँ संकलित कीं। निश्चय ही ये सन्त इस समय तक जन मानस में स्थान
बना चुके थे। सन्त नामदेव यद्यपि महाराष्ट्रीय सन्त थे और उनकी रचनाएँ भी पर्याप्त
नही थी फिर भी वे 'श्री गुरु ग्रन्थ' के संकलन में महत्त्वपूर्ण स्थान पाने को अधिकारी
हुए।
निर्गुण पन्थ के आदि प्रवर्तक संत नामदेव की रचनाओं को 'श्री गुरु ग्रन्थ
साहब' में स्थान मिलना आश्चर्य की बात नही है क्योकि उन्होने अपनी भक्ति-साधना
और हिंदी पदो के द्वारा तत्कालीन सन्त समाज में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया था।
यहाँ एक बात और विचारणीय है। जिस समय 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' का
संकलन हुआ था उसका स्वरूप साम्प्रदायिक नही था। गुरु अर्जुनदेव ने तत्कालीन

३०४ नामदेव की हिन्दी कविता
प्रसिद्ध सन्तो की रचनाओ का सग्रह किसी विशिष्ट साप्रदायिक आधार पर नही किया
था । यदि उनमे जरा भी साप्रदायिक भावना होती तो गुरु नानक तथा गुरुओ के
अतिरिक्त अन्य सन्तो के पद सगृहीत न होते ।
'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' के सकलन का आधार एक विशिष्ट परम्परा के सन्तो की
रचनाओ का सग्रह अवश्य रहा होगा । इसलिए जयदेव के अतिरिक्त सभी सन्त निर्गुण
परम्परा के ही है । सन्त नामदेव की रचनाओ के 'ग्रन्थ साहिब' में सकलित होने का
यही कारण हो सकता है । जयदेव का इस सग्रह मे स्थान देने का कारण भक्ति के क्षेत्र
मे उनकी प्रसिद्धि हो सकती है ।
इस संदर्भ म रज्जब की 'सवगो' का महत्त्व अधिक है । रज्जब ने बहुत से
सन्तों तथा महात्माओ की वाणियो को विषयानुसार एकत्र कर उन्हे अपनी 'सर्वंगी'
नामक बृहत् ग्रन्थ में सगृहीत किया, जिसमे नामदेव के भी ५२ पद संगृहीत हैं ।
'सर्वंगी' का संग्रह गुरु अर्जुनसिंह के काल में ही अथवा कुछ वर्ष आगे पीछे हुआ होगा
क्योकि रज्जब का काल ई० स० १५६७ १६८६ है । 'गुरु ग्रन्थ' में गुरु गोविन्दसिंह
द्वारा कुछ परिवर्तन भी किया गया है पर 'सर्वंगी' में कोई परिवर्तन नही हुआ है इससे
नामदेव की हिन्दी रचनाओ का महत्व समझ में आता है ।
सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पंथ
चौरासी सिद्धो की सूची में नाथ पथ के कुछ प्रमुख आचार्यों के नाम गिन लिए
जाते है । जैसे मीनपा (बौद्ध सिद्ध), मत्स्येन्द्रनाथ (नाथ पथी), गोरख पा (बौद्ध
सिद्ध), गोरखनाथ (नाथ पथी), जलन्धर पा (बौद्ध सिद्ध), जालन्धर नाथ (नाथ
पथी), तारानाथ, हरप्रसाद शास्त्री जैसे विद्वानो का तो कहना है कि गोरखनाथ वस्तुत
पहले बौद्ध थे और बाद में शैव हो गये । इस तरह इन दोनो सम्प्रदायो का घनिष्ट
सम्बन्ध प्रतीत होता है ।
जहाँ तक अत साधना, पाखण्ड-खण्डन, मूर्तिपूजा, तीर्थस्नान, व्रत नियम बादि
बाह्याडम्बरो का विरोध, शास्त्र ज्ञान की व्यर्थता, गुरु-उपदेश का महत्त्व, नादबिंदु की
चर्चा, स्वसवेद्यता तथा अनिर्वचनीयता का प्रश्न है सत नामदेव अपने पूर्ववर्ती इन सिद्धो
तथा नाथो से पर्याप्त मात्रा में प्रभावित दिखाई देते है ।
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने "नाथ सिद्धो की बानियाँ" नामक सग्रह में
जिन नाथ सिद्धो की बनियाँ सगृहीत की है उनमें से अधिकांश चौदहवी शताब्दो
(ईसवी) के पूर्ववर्ती है । कुछ चौदहवी शताब्दो के हे ओर बहुत थोड़ उसके बाद के है ।
सत नामदेव का जीवन काल (स० १२७० १३५० ई०) १३वो शती का
उत्तरार्द्ध तथा १४वी शती का पूर्वार्द्ध है । यहाँ उनके पूर्ववर्ती नाथ सिद्धो की रचनाओ

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०५
से जो उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं उनसे स्पष्ट होता है कि नामदेव उनसे किस
प्रकार प्रभावित हैं। नामदेव ने भी उसी प्रकार की बातें कही हैं जिस प्रकार की इन
नाथों तथा सिद्धों ने कही हैं। कुछ उदाहरण नामदेव के समकालीन नाथों की रचनाओं
से भी प्रस्तुत किये गये हैं।
सिद्ध और नाथ पंथी दोनों दार्शनिक योगी थे, परम तत्त्व के अन्वेषक। दोनों
ने परमात्मा को बाह्य जगत में न ढूंढ़ा। "घट" के भीतर ही परम तत्त्व का निवास
है। वही शून्य का साक्षात्कार हो सकता है। दोनों का यही सिद्धांत था। फलतः दोनों
ने अन्तःसाधना पर जोर दिया। सरह (८वीं शताब्दी) ने 'घट' के बाहर परमात्मा
को ढूंढने वाले पंडितों को खूब फटकारा "घट" में बुद्ध है यह नहीं जानता। आवागमन
को भी खण्डित नहीं किया। तो भी निर्लज्ज कहता है कि मैं 'पण्डित हूँ।'१
'मूर्ख जो वस्तु घर में है उसे बाहर ढूंढता है। जैसे कोई मूढ़ नारी पति को
सामने देख रही हो फिर भी पड़ौसी से पूछ रही हो कि वह कहाँ है। अरे मूर्ख आत्मा
को पहचानने की कोशिश कर क्योंकि वह ध्यान, धारण या जप से नहीं मिलता।'"
नाथ पंथियों ने भी परम तत्त्व को न हिन्दू के मन्दिर में देखा न मुसलमानों
की मस्जिद में। क्योंकि योगी तो उसे वहाँ देखता है जहाँ न मन्दिर है न मस्जिद।
अर्थात् अपने 'घट' मे ही उसका साक्षात्कार करता है।३
१. पंडिअ सअल सत नवखाणइ ।
देहहहि बुद्ध वसन्त ण जाणइ ।।
अमणा गमण ण तेन विखण्डिअ ।
तोवि णिलज्ज भणइ हउं पण्डिअ ।।
"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पंथ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य" शीर्षक लेख
--"साहित्य सन्देश" मार्च १६५३ पृष्ठ ३६८ ।
२. घरे अच्छइ बाहिरे पुच्छइ ।
पहु देखइ पडियेसो पुच्छइ ।।
सरह भणइ वड़ झाणउ अप्पा ।
णउ सो धेअण, धारण जप्पा ।।
३. हिंदू ध्यावै देउरा ।
मुसलमान मसीत ।।
योगी ध्यावै परम पद ।
जहाँ देउरा न मसीत ।
-'साहित्य सन्देश' (मार्च १६५३) पृ० ३६८ ।
२०

१०६ नामदेव की हिन्दी कविता
गोरखपन्थी योगियो के अनुसार सारे तीर्थं काया गढ के भीतर ही है ।१
जिस तरह अन्त साधना पर इन दोनो पदो में जोर दिया गया है उसी तरह
बाह्याडम्बरो के तीव्र विरोध पर भी क्योकि बाह्याडम्बर अन्त. साधना का प्रबल शत्रु है।
बोधिसत्वो को ब्रह्मा, विरणु, महेशादि की पूजा नही करनी चाहिए । पत्थर
आदि देवताओ की भी पूजा नही करनी चाहिए । न तीर्थ जाना चाहिए । बाह्य देव-
पूजा से मोक्ष नही मिलता ।२
भिन्न भिन्न तीर्थों मे घूम कर अनेक देवताओ की पूजा वा आराधना को योगियो
ने मूर्खता कहा है ।३
वेद पुराणादि के अध्ययन से पडित फूला नही समाता किन्तु जैसे पके बेल के
चारो ओर भौरा मँडराता ही है, कुछ पाता नही वैसे ही यह पडित भी बाहर ही बाहर
भ्रमता है, कुछ समझता नही ।४
गोरख (९वीं शताब्दी) ने शास्त्रीय ज्ञान की स्पष्ट शब्दो मे निंदा की है ।५
"नाद' और "बिन्दु" इन दोनो तत्त्वो से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है इसे
सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पथ दोनो ही स्वीकार करते है ।६
१. घट ही भीतर अठसठी तीरथ ।
कहां भ्रमई रे भाई ॥
२. ब्रह्मा विहणु महेसुर देवा ।
बोहिसत्त ना करहु सेवा ।
देव ण पूजहु तिरथ ण जावा ।
देव पूजा ही तिरथ ण जावा ॥
—साहित्य सन्देश (मार्च १९५३) पृष्ठ ३६८ ।
३. न्हाइये नो तीरष न पूजिये को देव ।
भणंत गोरख अलख अभेव ॥
४ आगम वेअ पुराणेहि पण्डिअ माण वहंति ।
पक्क सिरिफले अलिअ जिमि बहिरिअ भ्रमन्ति ॥
५ वेदे न शास्त्रे कतेबे न पुराने ।
पुस्तवे न बाच्या जाई ।
तेवत जाणै विरला योगी ।
और दुनि सब धंधे लागी ॥
६. नादांशो नादो नादांश प्राण । शक्त्यंशो बिन्दु ।
बिन्दोरंश शरीरम् ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०७
परम तत्व की उपलब्धि होने पर अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति होती है ।
नाथपंथी उस अनिर्वचनीयता को इस प्रकार व्यक्त करते है ।१
इस सम्बन्ध में सिद्ध लुइपा (६वी शताब्दी) का कथन भी दृष्टव्य है ।२
इस अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्ति गुरु उपदेश के बिना असंभव है । सरहपा
कहते हैं कि जिसने दौड़कर गुरु-उपदेश के अमृत रस का पान नही किया वह वृथा
शास्त्रार्थ रूप मरुस्थल में प्यासा ही मर गया ।३
इसी तरह नाथ पंथ में "निगुरे" की गति नही है ।४
चरपटी नाथ (गोरखनाथ के थोड़े परवर्ती) बाह्याडम्बरों की निंदा करते हुए
कहते हैं—"नहा धोकर अंग प्रक्षालन करता है । बाहर से तो स्वच्छ है परन्तु भीतर
से मलीन । होम तथा जप भी करता है । एकादशी का व्रत भी रखता है किन्तु परब्रह्म
का स्मरण नही करता ।"५
नाग अरजुन (१२वीं शताब्दी) कहते हैं कि "अहंकार को दूर कर गुरु को
१. शिवं न जानामि कथं वदामि ।
शिवं च जानामि कथं वदामि ॥
२. भाव न होई, अभाव न होई ।
अइस संबोहे को पतिआइ ।
३. गुरु-उपए से अमिअ-रस ।
धावण पीअउ जेहि ॥
बहु सत्यत्थ मरुत्थलहि ।
तिसिए मरिअउ तेहि ॥
—"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य"
शीर्षक लेख 'साहित्य सन्देश, मार्च १६५३ से उद्धृत ।
४. गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला ।
गुरु बिन ज्ञानं न पाइला रे भाईला ॥
—"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य"
(शीर्षक लेख) "साहित्य सन्देश" मार्च १६५३ से उद्धृत ।
५. न्हावै धोवै पषालै अंग ,
भीतरि मैला बाहरि चंग ॥
होम जाप इग्यारी करै ।
पारब्रह्म के सुध न धरै । ।१५।। ।१५६।।
—नाथ सिद्धो की बानियाँ, पृष्ठ २७ ।

३०८ नामदेव की हिन्दी कविता
स्थान देकर, "उनमन की डोरी" से जब मन खींचा जाता है तब परम ज्योति का
साक्षात्कार होता है ।"१
हणवंतजी (चौदहवीं शताब्दी के पूर्व के) "घट" के भीतर ही परम तत्त्व का
साक्षात्कार कर लेने को कहते हैं—"अड़सठ तीर्थ जिसके चरणों में है वही देव तुम्हारे
अन्तःकरण में है । उसे पाने के लिए बाहर भटकने की आवश्यकता नही ।"२
घूघली मल (१४वीं शती का उत्तरार्द्ध) कहते हैं—'जो सोये वे नष्ट हुए ।
उनका जन्म व्यर्थ हो गया । काल रूपी अहेरी ने देखते-देखते काया रूपी हरिणी का
तथा संसार का संहार किया ।"३
नामदेव के समकालीन संत
सिक्खों के चौथे गुरु अर्जुनदेव ने सं० १६६१ में जिस "आदि ग्रंथ" का संग्रह
कराया उसमें स्वामी रामानन्द और उनके शिष्यों की कविताएं भी संगृहीत है । इनके
अतिरिक्त जिन अन्य संतों की कविता का भी "आदि ग्रन्थ" में संग्रह किया गया है वे
हैं जयदेव, नामदेव और त्रिलोचन । इनमें से अंतिम दो का नाम कबीर ने कई बार
१. आपा भेटिला सतगुर थापिला ।
न करिबा जोग जुगति का हेला ।
उनमन डोरी जब पेंचीजा ।
तब सहज जोति का मेला ॥२॥ ॥४२६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ ६७ ।
२. अटसठि तीरथ जाके चरणा ।
सोई देव तुम्हारे अंतहकरणा ।
हणवंत कहै मन अस्थिर धरणा ।
बाहिर कितहू भटकि न भरणां ॥६॥ ७४६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ १२७ ।
३. आइस जी सोवो ॥
बाबा से सूता ते परा विगूता ।
जनम गया अरु हारया ॥
काया हिरणी काल अहेड़ी ।
हम देखत जग मार्या ॥६॥ ४१६॥
—नाथ सिद्धों की बानियां, पृष्ठ ६५ ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३०६
लिया है।¹
संत जयदेव, संस्कृत के शृङ्गारी कवि जयदेव से निश्चय ही भिन्न हैं। उनके
सम्बन्ध में कोई निश्चित प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं है। वे जिस राजा लक्ष्मण सेन
की सभा के पंच रत्नों में से एक थे उसका राजस्व काल सन् ११७० ई० से आरम्भ
होता है। अतः ये नामदेव के समकालीन नहीं हो सकते। उनके दो पद "श्री गुरु ग्रंथ
साहब" में संगृहीत हैं।
त्रिलोचन : फरकुहर ने त्रिलोचन को नामदेव का समकालीन माना है। इनकी
कुछ कविता "आदि ग्रन्थ" में संगृहीत है। इनकी अन्य रचनाएं उपलब्ध नहीं हैं।
यह बड़े खेद की बात है कि नामदेव का समकालीन संत साहित्य प्राप्त नहीं
होता। संतों की एक परम्परा होती है। किसी संत का एकाएक आविर्भाव नहीं होता।
नामदेव के समसामयिक संत अवश्य हुए होंगे, उन्होंने रचनाएँ भी की होंगी परन्तु
दुर्भाग्य से वे रचनाएँ प्राप्त नहीं होतीं। जो थोड़ी बहुत फुटकर रचनाएँ प्राप्त होती हैं
उनमें निर्गुण विचारधारा के बहुत से तत्त्व उपलब्ध होते हैं। वस्तुतः ये सारे संत उसी
परम्परा के थे। जैसा ये लोग लिख रहे थे वैसे नामदेव भी लिख रहे थे। दोनों एक
दूसरे से प्रभाव ग्रहण कर रहे थे।
नामदेव का परवर्ती साहित्य पर प्रभाव
वास्तव में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रवर्तन और कबीर तथा उत्तरी भारत की संत
परम्परा पर नामदेव का जितना प्रभाव पड़ा उतना अन्य किसी संत का नहीं। परिणाम-
स्वरूप उनकी हिंदी रचनाओं की प्रवृत्तियों का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।
कालान्तर में ये ही प्रवृत्तियाँ निर्गुण विचारधारा के संतों और उनके काव्य का प्रेरणा-
स्रोत बनीं और उसका अभिन्न अंग बन गईं।
अब हम यह सिद्ध करेंगे कि नामदेव के हिंदी पदों में निर्गुण विचारधारा की
सारी विशेषताएँ विद्यमान हैं। साथ-साथ यह दिखाने का प्रयत्न किया जायेगा परवर्ती
संत नामदेव से किस प्रकार प्रभावित हुए हैं।
(१) ईश्वर की सर्वव्यापकता-परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है, वही सबके
बाहर तथा भीतर सब कहीं व्याप्त है और उसी के प्रति एकान्तनिष्ठ होकर हमें रहना
चाहिए। इस प्रकार के भावों से नामदेव का हृदय सदा भरा रहता है और इसी कारण,
१. जाने सुक उधव अक्रूर हणवंत जागे ले लंगूर ।
संकर जागे चरन सेव कलि जागे नामा जैदेव ॥
-- कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २१६, ३८७।

११० नामदेव की हिन्दी कविता
सारे जगत् को वे एक उदार-चेता प्रेमी की दृष्टि से देखते हैं ।
नामदेव कहते हैं— 'ईश्वर एक है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है । जिधर
भी देखो वही दिखलाई पड़ता है । माया के विचित्र चित्रों से संसार मुग्ध है, कोई
विरला ही उसे जान पाता है ।' १
कबीर साहब कहते हैं—"सगुण में निर्गुणत्व का आरोप एवं निर्गुण के लिए
सगुणत्व की भावना स्वाभाविक है । इसे त्याग, दोनों में से किसी भी एक ओर बहना
ठीक नहीं । उस अलक्ष्य के लिए अजर अमर आदि कहना भी उपयुक्त नहीं । उसका
कोई रूप नहीं, कोई वर्ण नहीं । वह घट-घट वासी है, सर्वव्यापक है ।' २
गुरु नानक कहते हैं—' घट घट में वह परम तत्त्व, वह परब्रह्म छिपा हुआ है ।
घट-घट में उसकी ज्योति प्रकाशित है ।' ३
ब्रह्म की सर्वव्यापकता का वर्णन करते हुए दादू कहते हैं—"मै उस निरंजन
को सदा अपने पास ही देखता हूँ । क्या भीतर क्या बाहर वह समान रूप से सारे संसार
में समाया हुआ है ।' ४
संत रज्जब अपनी ब्रह्म की अनुभूति का वर्णन करते हुए कहते हैं—"वह
अप्राप्य सब जगह प्राप्त होता है । सभी ठौर उसके दर्शन होते हैं । वह सब में समाया
हुआ है । उसकी गति बड़ी अज्ञेय है । वह किसी से अलग नहीं है । वह हर एक वस्तु
१. एक अनेक विआपक पूरक जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझे कोई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
२. संतो धोखा कासू कहिये ।
गुण में निर्गुण निरगुण में गुण है बाट छांड़ि क्यो बहिये ॥टेक॥
अजरा अमर कथै सब कोई अलख न करणा जाई ।
नाति सरूप वरण नहि जाकै, घटि-घटि रह्यो समाई ।
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १४६, पद १८० ।
३. घट-घट अंतरि ब्रह्म लुकाइया, घटि-घटि जोति समाई ।
वजर कपाट भुरेत गुरमती, निरभै ताड़ी लाई ।
संत काव्य, पृष्ठ २२० ।
४. निकटि निरंजन देखिहौ छिन दूरि न जाई ।
बाहरि भीतरि येकरा, सब रह्या समाई ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २५३ ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३११

का अविभाज्य अंग है ।"१
(२) प्रत्यक्ष अनुभव से सत्यान्वेषण—नामदेव स्वानुभूति पर बल देते हैं ।
उन्होंने श्रुतिप्रामाण्य अथवा शब्द-प्रमाण का विरोध किया है । वे "रिदै" (हृदय) में
विचार करने पर जोर देते हैं । वे कहते हैं कि हृदय में विचार कर देखो तो पता
चलेगा कि घट-घट में वही एक मुरारी व्याप्त है ।२
नामदेव ने सत्य का कितना मार्मिक रूप उद्घाटित किया है । वे कहते हैं—
'हे परमात्मा ! सकल जीवों की उत्पत्ति आपसे हुई है । सकल जीवो में आप हैं । आप
घट-घट व्यापी हैं । संसार के लोग माया से मोहित होने के कारण इस बात को
जानते नहीं ।'३
अपने इसी सत्यान्वेषण के आधार पर वे डंके की चोट पर यह निर्णय देते हैं
कि राम की भक्ति के बिना संसार सागर को पार करने की कोई मार्ग नहीं है ।४
नामदेव के परवर्ती संत कबीर ने भी कोरे पांडित्य की निंदा की है । वे पंडितों
को संबोधित करते हुए कहते हैं—'मैं आँखिन देखी' अर्थात् स्वानुभव की बात कहता
हूँ और तू 'कागद की लेखी' अर्थात् 'श्रुति प्रामाण्य' को लेकर चलता है । मै सुलझाने
वाली बात कहता हूँ तो तू उलझानेवाली कहता है ।'५
१. अमित मिल्या सब ठौर है अकल सकल सब मांहि ।
रज्जब अजब अगह गति काहूँ न्यारा नाहिं ।
—सत काव्य, पृष्ठ ३३६ ।
२. कहत नामदेऊ हरि की रचना देखहु रिदै विचारी ।
घट-घट अंतरि सरब निरंतरी केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
३. जामै सकल जीव की उत्पति । सकल जीवमै आप जी ।
माया मोह करि जगत भुलाया घटि घटि व्यापक बाप जी ।
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ४८ ।
४. राम भगति बिन गति न तिरन की ।
कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६२ ।
५. मै कहता हूँ आँखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे ।
मै कहता सुरझावनहारी, तूं रह्यो अरुझाई रे ॥
—कबीर ग्रन्थावली ।

३१२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने ऐसे कोरे पांडित्य को समाप्त कर देने की शिक्षा दी है। 'चारो वेदो का
अध्ययन करके भी जीवात्मा का ईश्वर से भक्ति नही हुई। भक्ति के तत्त्व रूपी फल
(बाल) को तो कबीर ने अपना लिया अब पंडित लोग तो व्यर्थ के वाद विवाद को खोज
रहे है।'१
(३) सद्गुरु-महत्त्व प्रतिपादन—हमारे यहां उपनिषद् काल से ही गुरु की
महिमा चली आ रही है। गुरु के महत्त्व का कारण यह है कि साधक को अपने
साधना-काल में अनेक प्रकार के विघ्न आते हैं जिससे वह कभी कभी पथभ्रष्ट भी हो
जाता है। ऐसी दुविधा की अवस्था में साधक अपने गुरु से अपनी शंकाओं की निवृत्ति
करा सकता है।
नामदेव कहते हैं कि 'सद्गुरु के बिना सत्य का अनुभव भी कैसे हो सकता है ?
गुरु ने अपने उपदेशों से मेरा जन्म सफल कर दिया। गुरु-कृपा से मुझे ब्रह्म ज्ञान रूपी
अंजन प्राप्त हो गया है।'२
यह निश्चित है कि बिना गुरु-कृपा के कुछ प्राप्त नही होता।३
गुरु ने नामदेव को सब कुछ दिया है। गुरु ने उनको अठसठ तीर्थों का दर्शन
घट के भीतर ही कराया। अतः वे कहीं आना जाना नही चाहते।४
इस संदर्भ में नामदेव ने अपने गुरु विसोबा खेचर का सश्रद्ध स्मरण
१. चारिउं वेद पढ़ाइ करि हरि सूँ न लाया हेत।
बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूँढे खेत॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३६।
२. सफल जनमु मोकउ गुर कीना॥
दुख बिसारि सुख अंतरि लीना॥
गिआन अंजतु मोकउ गुर दीना॥
राम नाम बिनु जोवनु मन हीना॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०४।
३. प्रणवत नामदेव गुरु प्रसादे। पाया तिनही सुहाया॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६४।
४. तीरथ जाऊँ न जल में पैसूँ जीव जंत न सताऊँगा।
अठसठि तीरथि गुरु लखाये। घट ही भीतरि न्हाऊँगा॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६६।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१३
किया है।¹
कबीर ने गुरु के महत्त्व का वर्णन मुक्त कण्ठ के किया है। उनके लिए तो गुरु
तथा गोविन्द दोनों में कोई अन्तर नही है। गुरु तो गोविन्द का दूसरा रूप ही है। इस
लिए जो व्यक्ति गुरु की सेवा में अपने को मिटा देता है वही ईश्वर को प्राप्त कर
सकता है।²
कबीर साहब कहते हैं कि मेरे समक्ष गुरु और गोविन्द दोनो खड़े हैं।
मै किस के चरण पकड़ू ? हे गुरु आप धन्य हैं कि आपने मुझे गोविन्द से मिला
दिया।³
गुरु नानक गुरु के महत्त्व का वर्णन करते हुए कहते हैं—गुरु के उपदेश से
ब्रह्मादि देवता तथा कितने ही मुनि तरे। सनक सनंदन जैसे तपस्वी महात्मा गुरु-कृपा
से पार हुए।⁴
दादू गुरु के अनुग्रह का वर्णन इस प्रकार करते—'सद्गुरु ने अंजन का प्रयोग
कर मेरे नयन-पटल खोल दिये। गुरु-कृपा से बहरे कानों से सुनने लगे तथा गूँगे
बोलने लगे।'⁵
अन्य एक स्थल पर कहते हैं—'समर्थ गुरु ने मुझे परम तत्त्व के दर्शन कराये।
१. मन मेरी सुई तनो मेरा धागा।
खेचरजी के चरण पर नामा छिपी लागा ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १८८।
२. गुर गोविंद तो एक है दूजा यहु आकार ॥
आपा मेट जीवत मरे तो पावै करतार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ३।
३. गुरु गोविंद दोऊ खडे काके लागौ पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार । पृ० ५६।
४. गुर के सबदि तरे मुनि केते, इंद्रादिक ब्रह्मादि वरे ।
सनक सनंदन तपसी जन केते, गुर परसादी पारि परे ॥
—संत काव्य, पृ० २१० ।
५. दादू सतगुर अंजन बाहि करि नैन पटल सब खोले ।
बहरे कानीं सुनने लागे गूँगे मुख सौं बोले ॥
—संत काव्य, पृ० २५६ ।

३१४ नामदेव की हिन्दी कविता
मैंने अपने भीतर ही ब्रह्मानन्द रूपी घृत खा लिया और हृष्ट पुष्ट हो गया ।'१
संत रज्जब ने गुरु को 'नीर क्षीर' विवेकवाला हंस कहा है "माया रूपी पानी
तथा दूध रूपी मन भली भाँति एकरूप हो गये। संत रज्जब कहते हैं कि गुर रूपी हंस
इन दोनों को एक दूसरे से अलग कर देता है ।'२
(४) सुमिरन अथवा नाम स्मरण का महत्त्व—नामदेव ने 'सुमिरन' को बहुत
महत्त्व दिया है। सर्वसाधारण जनता के लिए भी यह साधन सुलभ है। इस पर कुछ
खर्च नही करना पड़ता। अत नाम स्मरण पर नामदेव का आग्रह है। वे कहते हैं—
'हे परमात्मा ! तुम्हारी कृपा से पत्थर समुद्र पर तैर उठे थे । फिर तुम्हारा स्मरण
करने से भक्त भला भवसागर क्यो न तर जायेंगे ?'३
'हरि नाम की महिमा अपार है। वही तो इस विश्व में सार तत्व है। नामदेव
कहते हैं कि इसी का आधार लेकर मैं भवसागर पार हुआ।'४
'तुम्हारा नाम सार-स्वरूप सत्य है। सारा संसार मायाजाल है। कलियुग में
भक्तो के लिए केवल तुम्हारा नाम एकमात्र आधार है ।'५
नाम के इस महत्त्व का अनुभव कर नामदेव कहते हैं कि राम-नाम रूपी पूँजी
म मेरी लो लगी है ।⁶
१. साचा समरथ गुर मिल्या, तिन तत दिया बताइ ।
दादू मोट महाबली घटि घृत मधि करि पाई ॥
—संत काव्य, पृ० २५६ ।
२. माया पानी दूध मन मिले सु मुहुकम संधि ।
जन रज्जब बलि हंस गुरु सोधि लही सो संघि ॥
—संत काव्य, पृ० ३३५ ।
३. देवा पाहन तारिअलै । राम कहत जन कस न तरे ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४६ ।
४. हरि नाव सकल भुवन सतसारा ।
हरि नाव नामदेव उतरे पारा ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १ ।
५. सार तुम्हारा नांव है झूठा सब संसार ।
मनसा वाचा कर्मना कलि केवल नांव अधार ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१ ।
६. राम नाम मेरे पूँजी घनां ।
ता पूँजी मेरी लागौ मना ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२८ ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१५
कबीर साहब कहते हैं कि मैं अनेक बार कह चुका हूँ। ब्रह्मा और महेश भी
कह चुके हैं कि यदि प्राणि के मोक्ष का कोई साधन है तो वह केवल तत्त्व-रूप राम का
नाम है। वही प्रत्येक मनुष्य के लिए उचित उपदेश है।¹
यदि संसार में ईश्वर भक्ति और भजन है तो वह केवल राम के नाम का स्मरण
करना ही है। इसके अतिरिक्त जो अन्य उपायों से भक्ति का प्रदर्शन करते हैं वह सब
दुःख का कारण है। कबीरदास कहते हैं कि इसीलिए मन, वचन और कर्म से तत्त्व-
स्वरूप ब्रह्म का स्मरण करना चाहिए।²
संत रैदास नाम-महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं—'नाना प्रकार के
आख्यान, पुराण, वेद-विधि आदि वर्णमाला के चौंतीस अक्षरों के अन्तर्गत ही आते हैं।
व्यास ने ठीक ही कहा है कि ये सब राम-नाम की समता नहीं कर सकते।'³
संत दादू 'सुमिरण' के अनन्य महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—
'निरंतर नाम-स्मरण करने से एक दिन परमात्मा का साक्षात्कार होगा। 'सुमिरण' का
यह सहज मार्ग सद्गुरु ने मुझे बता दिया।'⁴
गुरु नानक नाम-स्मरण पर अपना अविचल भाव व्यक्त करते हुए कहते हैं—
'मेरा आधे शरीर काट दीजिये अथवा सिर पर करवत चलाइये अथवा हिमालय में मेरे
शरीर को गला दीजिये तो भी मेरा मन तुम्हारा गुण-गान करता रहेगा। मैने यह
१. कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस।
राम नाँव तत सार है, सब कोहू उपदेस॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ५।
२. भगति भजन हरि नांव है, दूजा दुक्ख अपार।
मनसा वाचा क्रमनां, कबीर सुमिरण सार॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ५।
३. नाना खिआन पुरान वेद विधि चउतीस अषर मांही।
विआस बिचारि कहिउ परमारथु राम नाम सरि नाही।
—संत काव्य, पृष्ठ १६५।
४—सासै सास सँभालता इक दिन मिलिहै आइ।
सुमिरण पँडा सहज का सतगुर दिया बताइ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ २७६।

३१६ नामदेव की हिन्दी कविता
अच्छी तरह जांच लिया कि रामनाम की समता अन्य कोई साधन नहीं कर सकता ।'१
(५) बाह्याडम्बर की व्यर्थता—नामदेव के अनुसार बाह्य कर्म काण्डों से कोई
लाभ नहीं होता । इनको अपना कर तो जीवन व्यर्थ ही नष्ट होता है । जब तक अंत -
करण शुद्ध नहीं है तब तक बाह्याचारों का प्रदर्शन केवल दिखावा है, ढोंग है ।
'यदि कोई शरीर में लगे कीचड़ को कीचड़ से धोना चाहता है तो वह स्वच्छ
न होगा और उसका यह प्रयास व्यर्थ ही होगा । जो भीतर से मैला और बाहर से
स्वच्छ है वह उस ढोंगी के समान है जो केवल पानी से धोता है । नामदेव कहते हैं कि
सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़कर कोई भवसागर कैसे पार कर सकता है ?'२
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । बिना विश्वास के,
बिना श्रद्धा के तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । नामदेव कहते हैं कि जब मैं अपने गन्तव्य
स्थान पर पहुँचा तब मैंने सीढ़ी छोड़ दी ।'३
मूर्ति पूजा और बलि का नामदेव ने बार-बार खण्डन किया है ।'४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है । 'मन स्थिर हो अथवा
न हो लोग दिखावा अवश्य करते हैं । अंतःकरण तो मलीन है फिर भवसागर कैसे पार
हो सकता है ? बिना उसका मर्म जाने रुद्राक्ष माला, छापा, तिलक आदि का प्रयोग
करने से क्या लाभ ? स्वयं अज्ञानी होकर दूसरों को मार्ग-दर्शन करने का दावा करते
१. अरध सरीरु कटाइऐ सिरि करवतु धराइ ।
तनु हेमंचलि गालोअै भी मन तेरो गुन गाइ ।
हरि नामै तुलि न पूजई सभ फिठो ठोकि बजाइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१८ ।
२. लागो पंक पंक से धोवै । निर्मल न होवै जनम विगोवै ।
भीतरि मैला बाहिरि धोया । पाणी पिंड पखाले धोया ।
नामदेव कहै सुरही परहरिये । भेड़ पूँछ कैसे भवजल तरिये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
३. तीरथ बरत जगत की बासा । फोकट सोजे बिन बिसवासा ।
एकादसी जगत को करनी । पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६ ।
४. पाहन लागे देव कटीला । वाको प्रान नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारे । दैवत जनम आपनौ हारे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।

नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१७
हैं। ऐसे कपटाचरण से मुक्ति कैसे होगी ?'१
कबीर ने मूर्ति पूजा का खण्डन किया है। उनके अनुसार जो लोग पत्थर
का पुतला बनाकर उसे कर्तार समझ कर उसकी पूजा करते हैं वे पाप की धारा में डूब
जाते हैं।२
मूर्ति पूजा ही नहीं, भक्ति से रहित जप और तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर
विश्वास करना भी कबीर के अनुसार भ्रम है। ये सब सेंबर के फूल के समान हैं जो
देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन हैं।३
संत मलूकदास कहते हैं कि अंतःकरण में यदि दया-भाव नहीं तो मक्का, मदीना,
द्वारका, बद्री-केदार आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा व्यर्थ है।४
स्वामी सुन्दरदास ने भी बाह्याचारों का विरोध किया है। जो मनुष्य-निर्मित
मूर्ति की पूजा करते हैं, तीर्थस्थानों को जाते हैं, गले में माला डालते हैं, माथे पर तिलक
लगाते हैं वे गुरु के बिना ईश्वर से मिलने का रास्ता कैसे पा सकते हैं ?५
१. मन थिर होइ वा रे न होइ । ऐसा चिन्ह करे संसार ।
भीतरि मैला धूतिग फिरै । क्यूँ उतरे भव पार ॥टेक॥
रुद्राष सपा जप माला भडै । ताको मरम न जाने कोई ॥
आप न देपै और दिवावै । कपट मुक्ति कयो होई ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे ते बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४३।
३. जप तप दीसै थोथरा तीरथ ब्रत वेसास ।
सूवै सेंवल सेविया, यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर, ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४।
४. मक्का मदिना द्वारका बद्री केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३६५।
५. तो भक्त न भावै दूरि बतावै तीरथ जावै फिरि आवै ।
जो कृत्रिम गावै पूजा लावै झूठ दिखावै बहिकावै ॥
अरु माला नांखै तिलक बनावै क्यों पावै गुरु बिन गेला ।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुन्दर न्यारा ह्वै खेला ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३४८।

३१८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब के अनुसार दादू पंथ में बाह्याचारों का बिल्कुल महत्त्व नहीं है।
जो, बाह्याचारों के साधन-स्वरूप माला, तिलक, तीरथ, मूर्ति आदि का त्याग करता है
वह दादू पंथ में परम पुरुष के समान माना जाता है ।¹
(६) अनन्य प्रेम भावना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । संत नामदेव कहते है—'राम की वंदना
कर मैं और किसी की वंदना न करूँगा । मेरा लौकिक जीवन भले ही नष्ट हो मैं अपना
पारलौकिक जीवन नष्ट न होने दूंगा । मैं अन्य देवताओं से याचना न करूँगा । केवल
राम रसायन का आस्वाद लूँगा ।'²
क्योकि उन्हें विश्वास है कि परमात्मा प्राणि-मात्र में समाया हुआ है ।'³
और यही कारण है कि जिसके लिए उन्होंने त्रिभुवन की खाक छानी वह अमो-
लिक 'वस्तु' उनको अपने हृदय में ही मिली । नामदेव कहते हैं कि अब मुझे कही
आने-जाने की आवश्यकता नहीं है । मैं घर बैठे अपने हृदयस्थ राम के गुण गाऊँगा ।⁴
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेमभावना को नामदेव के ढंग पर ही अपनाया है ।
वे अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं—'हे मन ! तू अनस्थिरता या चंचलता
की वृत्ति को छोड़ दे । जब तूने आत्मोपलब्धि के व्रत का अंगीकार कर लिया तो तुझे
अब अपने को जला कर समाप्त कर देने में ही कुशल है ।'⁵
'अजी ओ गुसांईं ! मैं आपका गुलाम हूँ । मुझे बेच दो । यह सारा तन मन
१. माला तिलक न मानई, तीरथ मूरति त्याग ।
सो दिल दादू पंथ में परम पुरुष सूँ लाग ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३१३ ।
२. राम जुहारि न और जुहारौं । जीवति जाइ जनम कत हारौं ।
आन देव सौं दीन न भाषौं । राम रसाइन रसना चाषौं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
३. थावर जंगम कीट पतंगा सुरय राम सबहिन के संगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये । सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहे कहूँ आइये न जाइये । अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६ ।
५. डग मग छांड़ि दे मन बौरा ।
अब तो जरै बरै वनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधौरा ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १६६ ।