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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 332 में से

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पृष्ठ 294

३०२ नामदेव की हिन्दी कविता
आदि स्थानों की दो बार यात्रा की थी। पहली यात्रा उन्होंने संत ज्ञानेश्वर के साथ
की जिसका उल्लेख उनके 'तीर्थावली' के अभंगों में मिलता है।
भागवत धर्म के प्रचार तथा प्रसार को ही अपना जीवित कार्य मानकर जीवन
के उत्तरार्द्ध में, लगभग बीस वर्ष, जीवन के अन्त तक वे पंजाब में रहे। संत ज्ञानेश्वर
का लोकोद्धार का कार्य उन्होंने अखण्ड रूप से जारी रखा। उनका आदर्श था—'कीर्तन
करते समय भावावेश में आकर मैं नाचूँगा और ज्ञानदीप प्रज्वलित कर अज्ञान रूपी
अंधकार को दूर करूँगा।'१
उत्तर भारत में भागवत धर्म की ध्वजा फहराने वाले नामदेव प्रथम सन्त हैं।
पंढरपुर की भक्ति-सरिता को वे सीधे पंजाब ले गये। यात्रा काल में तथा पंजाब-निवास
के काल में अपने विचार उत्तर भारत की जनता को समझाने के लिए उन्होंने हिन्दी
को अपनाया।
सन्त नामदेव ने मराठी में अभंगों (पदों) की रचना की है जिनकी संख्या
लगभग ढाई हजार है। मराठी के अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी में भी रचना की है। उनकी
कुछ हिन्दी रचनाएँ 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में संग्रहीत हैं जिनकी संख्या ६१ है। इनके
मराठी के अभंगों का संग्रह 'नामदेव की गाथा' के नाम से प्रसिद्ध है। इस गाथा में भी
नामदेव के १०२ पद हिन्दी के संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त कई प्राचीन हस्तलिखित
पोथियाँ हैं जिनमें नामदेव के हिन्दी पद मिलते हैं। विभिन्न स्रोतों में कुल मिलाकर अब
तक लगभग तीन सौ बीस पद प्राप्त हो चुके हैं।
श्री गुरु ग्रन्थ साहब में नामदेव के पद एक स्थान पर नहीं है। वे सम्पूर्ण ग्रन्थ
में बिखरे हुए हैं। नीचे पदों की संख्या और श्री गुरु ग्रन्थ साहब के पृष्ठों की सूची दी
जा रही है जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि नामदेव के पद कहाँ-कहाँ हैं—
पृष्ठ पद संख्या
३४५ १
४८५ २ से ६ तक
५२५ ७ से ८ तक
६५५-६५६ ६ से ११ तक
६६१-६६२ १२ से १६ तक
७१८ १७ से १६ तक
८५७ २० से २३ तक
१ नाचू कीर्तनाचे रंगी। ज्ञानदीप लावू जगी।
—श्री नामदेवरायाची सार्थ गाथा (भाग तीसरा) अभंग १५६, पृ० १७६।