सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० नामदेव की हिन्दी कविता
योगी भी इस प्रक्रिया में सहायक हुए परन्तु इस्लामी प्रहार की चोट को मुख्यतः नामदेव
ने ही संभाला ।'१
नामदेव का व्यक्तित्व
नामदेव का व्यक्तित्व महान् था । वे एक पहुँचे हुए तथा उच्चकोटि के संत
थे । उनको साक्षात्कार हुआ था । उन्होंने, जिन दिनो उत्तर भारत में अराजकता फैली
हुई थी, विदेशी आक्रमणों के कारण जनता हत-बुद्ध हो गई थी, ऐसे संक्रमण-काल में,
पंजाब में निवास कर जनता को बहुदेवोपासना, कृत्रिम आचार-विचार, जातिभेद आदि
के प्रति सजग किया । भारत में जो विदेशी संस्कृति अपने पैर जमा रही थी वह भार-
तीय जनता के इन दोषो से लाभ उठाकर अपना विस्तार कर सकती थी । नामदेव ने
ढाल बनकर हिंदू धर्म तथा भारतीय संस्कृति की रक्षा की । वैभव और शक्ति के आकर्षण
को त्यागकर हिन्दू धर्म से चिमटे रहना बड़े साहस की बात थी परन्तु हिन्दू जनता ने
तपस्या का मार्ग अपनाया । इस प्रकार की मनोदशा के लिए बड़ी तैयारी की आव-
श्यकता थी जिसकी पृष्ठभूमि नामदेव ने तैयार की । नामदेव ने अपने उपदेशो से, जैसा
कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, कबीर तथा अन्य परवर्ती सन्तो का मार्ग प्रशस्त
किया ।
नामदेव ने जहाँ उत्तर में युगानुरूप अपने क्रांतिकारी विचारो से युगान्तर
उपस्थित कर दिया वहाँ उन्होने हिंदी साहित्य की दृष्टि से खड़ी बोली के पद्य को
विभिन्न राग-रागिनियों की पद शैली भी प्रदान की । सचमुच नामदेव ने एक युग-
प्रवर्तक का कार्य किया । प्रचार तथा यातायात के साधनो का जिस काल में अभाव था,
उस काल में नामदेव ने जो महान् कार्य किया उसे देखकर हम आश्चर्यचकित हो जाते
हैं । इस्लाम के आक्रमण की छाया में उन्होंने उत्तर के हिन्दू-मात्र को भागवत् धर्म के
झंडे के नीचे एकत्रित किया । इतिहास में इसका प्रमाण मुश्किल से मिलेगा । नामदेव
की परम्परा में ही आगे चलकर रामानन्द और कबीर हुए । महाराष्ट्र के इस सन्त
कवि के ऋण से पंजाब उऋण नही हो सकता । नामदेव ने यह कार्य स्वार्थवश नहीं
बल्कि भक्ति-प्रेम तथा मानवता-प्रेम के कारण किया । परमात्मा से वे यही प्रार्थना करते
है—'सन्त सदा सुखी हों, हरि के दास चिरंजीव हो, जिनकी जिह्वा पर पाडुरंग का
नाम है उनका कल्याण हो ।'२
१. मध्ययुगीन वैष्णव संस्कृति और तुलसीदास, पृष्ठ ४ ।
—डॉ० रामरतन भटनागर ।
२. आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुला । माझिया सत्ता हरिच्या दासा ।
कल्पनेची बाधा न हो कोणे काळी । हे संत मण्डली सुखी असो ॥