सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 291, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव का साहित्य पर प्रभाव २६६
जाति-हीनत्व, क्षुद्र देवता, तीर्थों के अनाचार तथा शास्त्र-ज्ञान के अभि-
मान के विरुद्ध नामदेव की वाणी तेजस्वी हो गई। वह समझौता करना जानती ही
नही। हिंदुत्व के अभिमान को धारणा करते हुए उन्होंने विशुद्ध हृदय-धर्म को आधार
भूत सत्य माना और तत्त्व-वाद के रूप में मंदिर-मसजिद के बीच ऐसी समन्वय-भूमि
की खोज की जहाँ मनुष्य अपने मानव रूप में ही गौरवान्वित हो सकता था। इसमे
कोई संदेह नहीं कि नामदेव जैसे हीन वर्ण संतो के अडिग विश्वास ने ही धर्म-परिवर्तन
की बाढ़ को रोका। उनकी रचनाओं के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि
उनका दर्शन (निर्गुणोपासना) उत्तर भारत की नई धार्मिक तथा सामाजिक परिस्थिति
की उपज था।
महाराष्ट्र के स्वतंत्र वातावरण में उन्होंने सगुण भक्ति के आधार पर हिन्दू धर्म
के अन्तर्गत वर्णहीन सामाजिक जीवन की कल्पना की और उत्तरी भारत के इस्लामी
परिवेश में उन्होंने अपने योग-भक्ति-वेदांत के समीकरण को एक ऐसा नया रूप दिया
जो तत्कालीन सूफी मतवाद के निकट पड़ता था। वास्तव में निर्गुण मत दक्षिण के
वैष्णव भक्तिवाद का वह परिस्थितिजन्य रूप है जिसने उत्तर भारत की १४वीं शताब्दी
की हिन्दू चेतना में जन्म लिया था।
इस प्रकार नामदेव ने विदेशी संस्कृति के आघात से उत्पन्न धर्म संकोच तथा
प्रतिक्रियावाद का सामना किया। सन् १३१८ ई० के पश्चात् महाराष्ट्र में मुसलमानों
का शासन स्थापित हो जाने के बाद उत्तर भारत की तरह दक्षिण में भी सामाजिक
और धार्मिक संकट उठ खड़ा हुआ। नामदेव के वारकरी संप्रदाय को इस नई विकट
परिस्थिति का सामना करना पड़ा।
महाराष्ट्र में नामदेव की परम्परा परवर्ती संतो जैसे संत चोखामेला, संत भानु-
दास, संत निलोबा राय, जनार्दन स्वामी, दासोपंत, एकनाथ आदि में विकसित हुई और
उत्तर भारत में स्वामी रामानन्द के निर्गुणोपासक तथा सगुणोपासक शिष्यों में से होती
हुई कबीर, नानक, दादू, रज्जब तथा तुलसीदास में पल्लवित हुई। इन कवि-साधको
में हम इस्लाम के विरुद्ध प्रतिक्रिया भावना को उत्तरोत्तर तीव्र और गहन होता देखते
हैं। एकनाथ और तुलसीदास में इसकी सबसे प्रौढ़ सांस्कृतिक और साहित्यिक अभि-
व्यक्ति हमें मिलती है। डॉ० रामरतन भटनागर के अनुसार-'इस प्रकार १३०० ई०
से १६०० ई० तक मध्ययुगीन नव जागरण का चक्र बड़ी तीव्र गति से ऊपर की ओर
चढ़ता है। रामानन्द से पहले नामदेव को छोड़कर सारे उत्तर भारत में ऐसा कोई संत
नही मिलता जो इस परिवर्तन के लिए उत्तरदायी हो सके। संभवतः गोरखनाथ और