सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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प्रसिद्ध सन्तो की रचनाओ का सग्रह किसी विशिष्ट साप्रदायिक आधार पर नही किया
था । यदि उनमे जरा भी साप्रदायिक भावना होती तो गुरु नानक तथा गुरुओ के
अतिरिक्त अन्य सन्तो के पद सगृहीत न होते ।
'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' के सकलन का आधार एक विशिष्ट परम्परा के सन्तो की
रचनाओ का सग्रह अवश्य रहा होगा । इसलिए जयदेव के अतिरिक्त सभी सन्त निर्गुण
परम्परा के ही है । सन्त नामदेव की रचनाओ के 'ग्रन्थ साहिब' में सकलित होने का
यही कारण हो सकता है । जयदेव का इस सग्रह मे स्थान देने का कारण भक्ति के क्षेत्र
मे उनकी प्रसिद्धि हो सकती है ।
इस संदर्भ म रज्जब की 'सवगो' का महत्त्व अधिक है । रज्जब ने बहुत से
सन्तों तथा महात्माओ की वाणियो को विषयानुसार एकत्र कर उन्हे अपनी 'सर्वंगी'
नामक बृहत् ग्रन्थ में सगृहीत किया, जिसमे नामदेव के भी ५२ पद संगृहीत हैं ।
'सर्वंगी' का संग्रह गुरु अर्जुनसिंह के काल में ही अथवा कुछ वर्ष आगे पीछे हुआ होगा
क्योकि रज्जब का काल ई० स० १५६७ १६८६ है । 'गुरु ग्रन्थ' में गुरु गोविन्दसिंह
द्वारा कुछ परिवर्तन भी किया गया है पर 'सर्वंगी' में कोई परिवर्तन नही हुआ है इससे
नामदेव की हिन्दी रचनाओ का महत्व समझ में आता है ।
सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पंथ
चौरासी सिद्धो की सूची में नाथ पथ के कुछ प्रमुख आचार्यों के नाम गिन लिए
जाते है । जैसे मीनपा (बौद्ध सिद्ध), मत्स्येन्द्रनाथ (नाथ पथी), गोरख पा (बौद्ध
सिद्ध), गोरखनाथ (नाथ पथी), जलन्धर पा (बौद्ध सिद्ध), जालन्धर नाथ (नाथ
पथी), तारानाथ, हरप्रसाद शास्त्री जैसे विद्वानो का तो कहना है कि गोरखनाथ वस्तुत
पहले बौद्ध थे और बाद में शैव हो गये । इस तरह इन दोनो सम्प्रदायो का घनिष्ट
सम्बन्ध प्रतीत होता है ।
जहाँ तक अत साधना, पाखण्ड-खण्डन, मूर्तिपूजा, तीर्थस्नान, व्रत नियम बादि
बाह्याडम्बरो का विरोध, शास्त्र ज्ञान की व्यर्थता, गुरु-उपदेश का महत्त्व, नादबिंदु की
चर्चा, स्वसवेद्यता तथा अनिर्वचनीयता का प्रश्न है सत नामदेव अपने पूर्ववर्ती इन सिद्धो
तथा नाथो से पर्याप्त मात्रा में प्रभावित दिखाई देते है ।
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने "नाथ सिद्धो की बानियाँ" नामक सग्रह में
जिन नाथ सिद्धो की बनियाँ सगृहीत की है उनमें से अधिकांश चौदहवी शताब्दो
(ईसवी) के पूर्ववर्ती है । कुछ चौदहवी शताब्दो के हे ओर बहुत थोड़ उसके बाद के है ।
सत नामदेव का जीवन काल (स० १२७० १३५० ई०) १३वो शती का
उत्तरार्द्ध तथा १४वी शती का पूर्वार्द्ध है । यहाँ उनके पूर्ववर्ती नाथ सिद्धो की रचनाओ