सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
२५४ नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदी रचनाएँ भी पर्याप्त मात्रा में नही थी फिर भी 'श्री गुरु ग्रन्थ' में महत्त्वपूर्ण स्थान
पाने की अधिकारी हुई ।
यहाँ एक बात और विचारणीय है । जिस समय 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' का
संकलन हुआ था, उसका स्वरूप सांप्रदायिक नहीं था । गुरु अर्जुनदेव ने तत्कालीन
प्रसिद्ध संतो की रचनाओ का संग्रह किसी विशिष्ट सांप्रदायिक आधार पर नही किया
था । यदि इसमें जरा भी सांप्रदायिक भावना होती तो नानक तथा गुरुओ के अतिरिक्त
अन्य संतो के पद संगृहीत न होते ।
'श्री गुरु ग्रंथ साहब' में प्राप्त होनेवाले संत नामदेव के ६१ पद उसमें किस स्रोत
से आये यह अभी तक ज्ञात नही हो सका है । वैसे नामदेव की हिंदी रचना सम्बन्धी
'श्री गुरु ग्रन्थ' ही सबसे प्राचीन प्रमाण है । अन्य हस्तलिखित ग्रंथ जो प्राप्त हुए है वे
उसके बाद के ही हैं । यद्यपि लगभग ४०० वर्ष पूर्व संकलित होने के कारण इसका पाठ
अधिक विश्वसनीय होना चाहिए था पर दुर्भाग्यवश ऐसा नही है । नामदेव की रचना
संबंधी जितनी मुद्रित और अमुद्रित प्रतियां अब तक प्राप्त हुई है उनमें 'श्री गुरु ग्रन्थ' का
पाठ सबसे अधिक स्वच्छंद है । इस स्वच्छंदता पर आश्चर्य भी होता है क्योकि धर्म ग्रंथ
होने के कारण इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नही किया गया । यदि शुद्ध अशुद्ध
लिखे है तो अन्य प्रति मे भी वैसे ही लिखे गये । इस संदर्भ में डॉ० पारसनाथ तिवारी
का मत दृष्टव्य है । १ किन्तु 'गुरु ग्रन्थ' के कम से कम नामदेव के पदों का पाठ देखकर
इसकी प्राचीनता पर संदेह होने लगता है । यह जाँच करना आवश्यक है कि 'गुरु ग्रन्थ
साहब' अपने संकलन के साथ ही स्थायित्व को प्राप्त हो गया था या बाद में उसको
स्थायित्व मिला । इसमे कोई संदेह नही कि इसका संकलन सिक्खो के पांचवें गुरु अर्जुन
सिंह ने किया है जिनका काल ई० स० १५६३-१६०६ माना जाता है ।
परन्तु 'गुरु ग्रंथ साहब' को उसी समय स्थायित्व प्राप्त नही हुआ । गुरु गोविद-
सिंह (ई० स० १६७५-१७०८) ने आगे चलकर इसमें कुछ वृद्धि भी की और कुछ
रचनाओ को हटा भी दिया । उन्होने मूल 'ग्रन्थ साहब' का पूरा पाठ भाई मनीसिंह को
बैठा कर लिखवाया था और उसमें गुरु तेग बहादुर की भी कुछ रचनाएँ सम्मिलित
कर ली थी । इसी के साथ कुछ नये संतों की रचनाएँ भी सम्मिलित कर ली गई होगी ।
गुरु गोविन्दसिंह जैसे प्रतिभाशाली और महत्त्वाकांक्षी कवि के लिए यह स्वाभाविक भी
१. 'गुरु ग्रन्थ साहब' का प्रकाशित संस्करण जो हमारे सामने है निरापद रूप से सं०
१६६१ की मूल प्रति का प्रतिरूप माना जा सकता है । ॰॰॰वह किसी सम्पादक या
लिपिकर्त्ता द्वारा न तो शोधा गया है और न परिवर्तित किया गया है ।'
—कबीर ग्रंथावली, पृ० ७२ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २५५
कहा जा सकता है। अतः ऐसा लगता है कि ई० स० १७०० के आसपास या उसके
पश्चात् ही 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' को स्थायित्व प्राप्त हुआ होगा। इतने लम्बे काल तक
मौखिक परम्परा में रहने वाले इन पदों की पंक्तियों और पाठों में इतना परिवर्तन हो
गया जो असम्भव नही।
'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में प्राप्त होनेवाले ६१ पदों में से ४० पद मराठी गाथा
में प्राप्त होते हैं। विभिन्न स्थानो से जो हस्तलिखित प्राचीन प्रतियाँ मिली हैं उनमें भी
'गुरु ग्रन्थ' के केवल ३० पद प्राप्त होते हैं। 'गुरु ग्रंथ' में १६ पद ऐसे हैं जो कही भी
नही मिलने। जो पद मराठी गाथा तथा हस्तलिखित प्रतियो में प्राप्त हुए हैं उनके
नामदेव रचित होने में कोई संदेह नहीं है पर शेष पदों के सम्बन्ध में निश्चित रूप से
यह नही कहा जा सकता कि ये नामदेव के पद हैं। इनमें से अधिकांश पद किसी अन्य
कवि के हैं जो नामदेव के नाम पर प्रसिद्ध हो गये।
रज्जब की 'सर्वंगी' का महत्त्व इस संबंध में अधिक है। 'सर्वंगी' का संग्रह गुरु
अर्जुनसिंह के काल में ही अथवा कुछ
२५६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर की रचना और पाठ निर्णय का अभी पहला प्रयास डॉ० पारसनाथ तिवारी
(प्रयाग) द्वारा हो पाया है तब नामदेव की प्राप्त रचनाओं की प्रामाणिकता का निर्णय
और भी कठिन माना जा सकता है। वास्तविक बात यह है कि संत नामदेव की
रचनाओं का अभी तक हिंदी संसार को पता नहीं था। 'ग्रन्थ साहब' के ६१ पद ही
अभी तक नामदेव की संपूर्ण हिंदी रचना समझी जाती रही है।
आचार्य विनयमोहन शर्मा ने अपनी पुस्तक 'हिंदी को मराठी संतों की देन' में
११ और पद दिये हैं जो 'ग्रन्थ साहब' से भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त संत नामदेव की
गाथा में १०३ हिंदुस्तानी पद हैं जिनमें कुछ ग्रन्थ साहब के हैं और कुछ दूसरे। किंतु
नामदेव की हिंदी रचनाएँ इतनी ही नहीं हैं। मुझे विभिन्न प्रकाशित और हस्तलिखित
प्रतियों से कुल ३०० पद नामदेव के प्राप्त हुए हैं। हस्तलिखित प्रतियां नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी, सेंट्रल पब्लिक लायब्रेरी, पटियाला, बाबा नामदेवजी का गुरुद्वारा घुमान
(गुरदासपुर), पंढरपुर, पूना विश्वविद्यालय आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। कुछ
प्रतियाँ जयपुर में भी हैं जिन्हें देखने का अभी तक अवसर नहीं मिला। रज्जब की
'सर्वङ्गी' में भी नामदेव के ५० से ऊपर पद संग्रहीत हैं। और भी अनेक संत वाणियों
के संग्रहों में नामदेव के पद पाये जाते हैं।
देखना यह है कि इन रचनाओं में प्रामाणिकता कहाँ तक है। 'गुरु ग्रंथ साहब'
का संकलन १६०४ में हुआ। नामदेव की रचना सम्बन्धी यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ
अब तक माना गया है। मुझे एक हस्तलिखित प्रति सन् १६५८ ई० की देखने को मिली
है। जिसमें नामदेव के पदों की संख्या १२८ है। यही सबसे पुरानी प्रति अभी तक
मिली है। इसके अतिरिक्त १८ वीं, १६ वीं शताब्दी की कई प्रतियाँ भी मिली हैं। पाठ
की दृष्टि से 'गुरु ग्रन्थ साहब' का पाठ सबसे भ्रष्ट है। इसके कुछ पद तो अभी तक
कहीं भी नहीं प्राप्त हुए हैं। जैसे अन्य संत कवियों के नाम पर बहुत सी रचनाएँ
प्रसिद्ध हो गई हैं वैसे नामदेव के नाम पर भी हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर पाठमात्र
के आधार पर लगभग १५० पद निश्चित ही नामदेव के हैं। ५० पद ऐसे हैं जो आधे
मराठी के, आधे हिंदी के हैं या सम्पूर्ण मराठी के भ्रष्ट रूप में हैं और शेष ५० अभी तक
संदिग्ध हैं। उनमें से कुछ गोरखनाथ, कबीर आदि के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
उदाहरणार्थ—
'देवा बेन बाजे, गगन गाजे, शब्द अनाहद बोले ।।' यह पद कबीर ग्रन्थावली
(ना० प्र० स०) के पद १६६ पृ० १४४ से बिल्कुल मिलता-जुलता है। कबीर की
पाठ समस्या पर काम करने वाले डॉ० पारसनाथ तिवारी ने इसे कबीर की प्रामाणिक
रचना नहीं माना है। गुरु ग्रन्थ साहब में प्राप्त पद १६ 'तीन छंद धेनु बाछै' गोरख-
बानी (डॉ० बड़थ्वाल द्वारा संपादित) के पद ४२ से मिलता-जुलता है। इस प्रकार
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २५७
अनेक ऐसे पद हैं जिनके संबंध में निर्णय करना अभी शेष है।
ये हस्तलिखित प्रतियाँ, जो विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुई हैं और नामदेव की
हिंदी पदों की परंपरा तथा नामदेव के पश्चात् होनेवाले हिंदी संत कवियों द्वारा नामदेव
की प्रशस्ति निश्चित रूप से यह प्रमाणित करती है कि नामदेव ने हिंदी में कविता की
थी और वह भी नमूने के लिए नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में।
नामदेव की उपलब्ध हिंदी पदावलियों में डॉ० भगीरथ मिश्र तथा डॉ० राज-
नारायण मौर्य द्वारा संपादित तथा पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की
हिंदी पदावली' अद्यतन और प्रमाणित पदावली है। इस पदावली में नामदेव के २३०
पद तथा १३ साखियां संग्रहीत हैं।
पर्याप्त काल तक बहुत को यह विदित न था कि नामदेव ने हिंदी में भी रचना
की है। हिंदी जगत् में इनकी रचनाओं का प्रचार पर्याप्त मात्रा में नहीं था। जहाँ
संतों की रचनाएँ संकलित की जाती थीं वहाँ नामदेव की रचनाओं को भी स्थान दिया
जाता था। इसका प्रमाण है सैकड़ों की संख्या में पाये जाने वाले नामदेव के हस्तलिखित
ग्रंथ।
इन सभी तथ्यों पर विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नामदेव
की हिंदी रचनाएँ अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के कारण उनको वह प्रधानता न मिल
सकी जो कबीर को मिली। इस संदर्भ में आचार्य विनयमोहन शर्मा की सम्मति उल्ले-
खनीय है।¹
कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव
हिंदी साहित्य में कबीर से अधिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व रखनेवाला कोई दूसरा
कवि नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व को क्रांतिकारी बनाने वाली वे परिस्थितियाँ हैं जिनमें
उन्होंने जन्म लिया और जिनमें उन्हें जीना और मरना पड़ा। इन परिस्थितियों
१. यह सत्य है कि कबीर के समान नामदेव की हिंदी रचनाएँ प्रचुर मात्रा में नहीं
मिलतीं परन्तु जो कुछ भी प्राप्त हैं उनमें उत्तर भारत की संत परंपरा का पूर्व
आभास मिलता है और उनके परवर्ती संतों पर निश्चय ही उनका प्रभाव पड़ा है
जिसे उन्होंने मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। ऐसी दशा में उन्हें उत्तर भारत में
निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक मानने में हमें कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। संभवतः,
हिंदी जगत् तक उनके संबंध में पर्याप्त जानकारी न पहुँच सकने के कारण उन्हें
वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका, जिसके वे अधिकारी हैं।
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृष्ठ १२६।
१७
२५८ नामदेव की हिन्दी कविता
के आलोक में ही हम इस तथ्य को हृदयंगम कर सकते हैं कि कबीर ने क्यों अपनी प्रखर
भाषा और तीखी भाव-व्यंजना से ऐसे काव्य का सृजन किया जो साहित्यिक मर्यादा की
चिंता न करते हुए साहित्य और धर्म में युगान्तर लाने वाला सिद्ध हुआ ।
कबीर को क्रांतिकारी बनाने वाली परिस्थितियां
वस्तुत कबीर के जन्म के समय राजनीति, समाज और धर्म में सर्वत्र एक अशान्ति
और अव्यवस्था की स्थिति थी । राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुसलमानों के आतंक से
पीड़ित हिंदू जनता राजाओं का भरोसा छोड़कर हताश हो गई थी और अपने को ईश्वर
के अधीन कर बैठी थी । धार्मिक दृष्टि से देखें तो नाथ पंथियों और सिद्धों ने रहस्यात्मक
और चमत्कारात्मक तंत्र मंत्र आदि के प्रचार द्वारा जनता को धर्म पथ से हटा दिया
था । तीर्थयात्रा, व्रत, पथ, स्नान आदि की निःसारता बताकर ये लोग जनता को
ईश्वर प्राप्ति का एक ही मार्ग दिखला रहे थे और वह था हठयोग तथा अन्य शारीरिक
क्रियाएं । भक्ति और प्रेम जैसी कोमल भावनाओं का इनके लिए कोई महत्व नहीं था ।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो हिंदू मुसलमानों में पारस्परिक कलह और कटुता के बीज
मौजूद थे । संकीर्णता, द्वेष और अविश्वास से दोनों ओर खिंचाव था ।
ऐसी विषम परिस्थिति में एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो कलह के
कुहरे को चीरता हुआ सूरज की भांति प्रकाशित होकर किंकर्तव्य विमूढ जनता को
नवीन मार्ग पर ले जाय । निरीह और निष्प्राण जनता को आत्मविश्वास और मनुष्यता
के प्रति श्रद्धा और विश्वास से सशक्त बनाकर परिस्थिति का सामना करने के लिए
खड़ा कर दे । कबीर ऐसे ही युग द्रष्टा पुरुष थे ।
कबीर के व्यक्तित्व, उनके धार्मिक आदर्शों, समाज के प्रति उनका पक्षपात रहित
स्पष्ट दृष्टिकोण तथा उनकी कथन शैली पर नाभादास के इस छप्पय में सम्यक् प्रकाश
डाला गया है ।¹ भक्ति रहित धर्म को कबीर ने अधर्म कहा और भजन के बिना तप,
योग, दान, व्रत आदि सब को तुच्छ बताया । उन्होंने हिंदू मुसलमान दोनों के लिए
१. भक्ति विमुख जो धरम ताहि अधरम करि गायो ।
जोग, जग्य, जप, दान, भजन बिनु तुच्छ दिखायो ॥
हिंदू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी ।
पक्षपात नहिं वचन सबंहि के हित की भाखी ॥
आरुढ दसा ह्वै जगत पर मुख देखी नाहिन भनी ।
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षठ दरसनी ॥
भक्तमाल (नाभादास) पृष्ठ ४६१ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २५६
साखी, सबद और रमैनी की रचना की और बिना पक्षपात किये, बिना किसी की
तरफदारी किये सब के हित की बातें कही अर्थात् मानव मात्र के हित की बातें उन्होंने
कहीं। सारे संसार पर छा गये परंतु किसी के दबाव में आकर उन्होंने मुंह-देखी नहीं
कही, किसी की ठाकुर-सुहाती नहीं की। कबीर ने परंपरा से चले आये चार वर्ग, चार
आश्रम, छह दर्शन किसी को स्वीकार नहीं किया।
सच तो यह है कि कबीर अपना घर फूंक कर लाठी लेकर बाजार में आकर
खड़े हो गये थे और उन्होंने अपने साथ आने वालों को भी वैसा ही करने की सम्मति
दी थी ।१ यही नहीं वे शब्द-प्रमाण की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव को अधिक महत्त्व देते
थे ।२ वे प्रेम के उपासक थे। इस कारण उनको पाखंड और ढोंग से चिढ़ हो गई थी।
भक्त या संत को जैसा होना चाहिए उसके विपरीत लोग आडम्बर के फेर में पड़कर
जनता को पथ भ्रष्ट कर रहे थे।
कबीर जैसा भक्त जो सभी प्रकार के धार्मिक, सामाजिक और शास्त्रीय बंधनों
का तिरस्कार कर के 'मानव धर्म' की प्रतिष्ठा करना चाहता था, उस आडम्बर का
विरोध किए बिना कैसे रह सकता था जो मनुष्य के लोक-परलोक को बिगाड़ने वाला
था। यही कारण था कि कबीर ने उस भक्ति काल में, जिसमें 'मो सम कौन कुटिल
खल कामी' कहने वाले सूर तथा 'तू दयालु दीन हौं' कहने वाले तुलसी तथा उनके जैसे
अनेक भक्त कवि विनयशीलता तथा आत्मभर्त्सना का प्रदर्शन कर रहे थे, अपनी सार-
ग्राहिणी प्रतिभा और तर्क-व्यंग्य-मय अभिव्यक्ति से धार्मिक और सामाजिक जीवन पर
पड़े हुए आडम्बर के पर्दे को छिन्न भिन्न कर दिया।
कबीर स्वभाव से फक्कड़ थे। अच्छा हो या बुरा, खरा हो या खोटा जिससे
एक बार चिपट गये उसमें जिंदगी भर चिपटे रहे, यह सिद्धांत उन्हें मान्य नहीं था।
वे सत्य के जिज्ञासु थे और कोई मोह-ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर
सकती थी।
कबीर स्वाधीन-चिंता के पुरुष थे। उन्होंने समय का प्रवाह देखकर धर्म और
देश के उपकार के लिए जो बातें उचित और उपयोगी समझीं उनको अपने विचारों पर
आरूढ़ होकर निर्भीक चित्त से कहा। झूठे संस्कारों के कारण लोग नाना प्रकार के कर्म
१. हम घर जारा आपना, लिया मुराडा हाथ ।
अब घर जालौं तासुका जो चले हमारे साथ ॥
—संत कबीर की साखी ५।८ ।
२. मै कहता हौं आँखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे ॥
संक्षिप्त संत सुधा-सार पृष्ठ ५६
२६० नामदेव की हिन्दी कविता
वादो में फँसे हुए थे, आडम्बरमूलक नाना प्रकार के आचारों-व्यवहारों को धर्म समझ
रहे थे । उनमे यह बात नहीं देखी गई । उन्होने उनके विरुद्ध अपना प्रबल स्वर ऊँचा
किया, बड़े साहस के साथ केवल अपने आत्मबल के सहारे उनका सामना किया ।
मसजिद पर बाग देते हुए मुल्ला पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं कि खुदा क्या
बहरा है जो तू इतनी ऊँची आवाज से बाँग दे रहा है ।१
यदि खुदा मसजिद में ही रहता है तो शेष विश्व किसका है ?२
अहिंसावादी कबीर मुसलमानों में प्रचलित 'खतना' को भी पसंद नही करते ।३
इस्लाम धर्म और समाज की बुराइयों पर कुठाराघात कर वे हिन्दू धर्म और
समाज की ओर मुडते है । हिंदू धर्म के तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा आदि से उन्हें बेहद
चिढ़ है।
कबीर साहब कहते है कि पत्थर की पूजा करने से यदि परमात्मा की प्राप्ति
होगी तो मै पहाड़ की पूजा करूंगा ।४
सिर मुड़ाकर सन्यासी होने वाला पर भी उन्होने व्यंग्य किया है ।५
चारो वर्णों में श्रेष्ठ ब्राह्मण को भी वे नही छोड़ते ।६
१. काँकर पाथर जोरिके मसजिद लई चुनाय ।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे (क्या) बहिरा हुआ खुदाय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ६६ ।
२. जो रे खुदाय मसीति बसत है ओर मुलिक किस केरा ?
—संक्षिप्त-संत-सुधा सार, पृष्ठ ४० ।
३. जो तूँ तुरक तुरकनी जाया ।
तो भीतर खतना कयूँ न कराया ?
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार पृष्ठ ३४ ।
४. पाहन पूजे हरि मिले तो मै पूजौं पहार ।
ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार ॥
—साखी संग्रह, पृष्ठ १८३ ।
५. मूँड मुँडाये हरि मिले सब कोई लेइ मुडाइ ।
बार बार के मूँडने भेड़ न बैकुंठ जाइ ॥
६. जे तूं बामन बमनी जाया तो आन बाट काहे नहिं आया ?
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ५३ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६१
शूद्रों के अधिकार का भी उन्होंने समर्थन किया ।¹
उन्होंने सब तरह के धार्मिक और सामाजिक जीवन की पक्षपात-रहित आलो-
चना की है । वे मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं देखते थे ।²
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए
उसकी विशेषताओं पर भली भांति प्रकाश डाला है ।³
कबीर के समय में भारत अगणित विभिन्न धार्मिक मतों एवं उनके उप-संप्रदायों
का बोलबाला था । प्रत्येक मत अपने मत के सामने अन्य मतों को हेय समझता था ।
इस समाज में दंभ, पाखंड और सामाजिक विशृंखलता का साम्राज्य छा रहा था ।
कबीर समाज के सजग प्रहरी थे । उन्होंने वर्ण-व्यवस्था, अवतारवाद, बाह्याडम्बर आदि
का अपनी निर्भय एवं कठोर वाणी द्वारा खण्डन किया और एक सामान्य सत्य का स्वरूप
उपस्थित कर उसे सुधारने का प्रयत्न किया । ऐसा करने में उन्होंने पूर्ण निष्पक्षता से
काम लिया ।
कबीर साहब के सत्य कथन का बड़ा प्रभाव रहा । उन्होंने जैसी क्रांतिकारी
बातें कही, एक युग दृष्टा ही कह सकता है । जनसाधारण को यदि ऐसा लगता था कि
सन्त साहित्य में ऐसी बातें पहली बार कही जा रही है तो इसमें आश्चर्य की कोई
बात नहीं ।
नामदेव और कबीर की रचनाओं की तुलना
वास्तविक रूप से यदि कबीर और नामदेव की रचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन
किया जाय तो दोनों की विचारधारा में अद्भुत साम्य दिखाई देता है ।
१. एक जोति थे सब उपजानां, को बामन, को सूदा ?
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २१० ।
२. सांई के सब जीव हैं कीडी कुंजर दोई ।
जात पांत पूछे नहि कोई, हरिको भजै सो हरिका होई ।
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ११५ ।
३. 'ऐसे थे कबीर । सिर से पैर तक मस्त मौला, स्वभाव से फक्कड़ आदत से अक्खड़,
भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचंड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त,
भीतर के कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय । वे जो कुछ
कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे, इसीलिए उनकी उक्तियां वेधने वाली
और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे ।
—कबीर, पृष्ठ १६७ ।
२६२ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव की हिंदी रचनाएं बहुत कम उपलब्ध हैं। ६२ पद तो 'गुरु ग्रन्थ साहिब'
में मिलते हैं तथा कुछ और मिलाकर हिंदी पदों की संख्या २३० तक हो जाती है।
विद्वानों का अनुमान है कि इनकी मराठी रचनाएं युवावस्था की हैं और हिन्दी रचनाएँ
वृद्धावस्था की हैं। कहते हैं कि नामदेव अपनी युवावस्था म सगुणोपासक थे और बाद
में निर्गुणवादी हो गये। उनके हिन्दी पदों में उनकी निर्गुणवादिता स्पष्ट हो जाती है।
नामदेव और उनकी रचनाओ का कबीर और उनकी बानी पर स्पष्ट प्रभाव दिखाई
देता है। संक्षेप में नामदेव ने कबीर को निम्नलिखित बातें विरासत के रूप में मिली
हुई जान पड़ती है क्योंकि दोनों ही में वे समान रूप में मिलती हैं—
(१) कर्म और वैराग्य का समन्वय—नामदेव भारत के प्राचीन संतों के समान
कोरे वैरागी न थे। अपनी जीविका का काम करते हुए हरि भजन या नाम स्मरण करते
रहना वे आवश्यक समझते थे। अपने एक पद म नामदेव कहते हैं—'मैं कपड़ा रंगने
और सीवने का काम करता हूँ। घड़ी भर के लिए भी भगवन्नाम विस्मृत नही करता
हूँ। मैं भगवद् भक्ति करता हूँ और उनके गुणों का गान करता हूँ। आठो पहर मैं
अपने स्वामी के ध्यान में मग्न रहता हूँ। मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है,
मेरा चित्त भगवान से लगा हुआ है।'
नामदेव की यह प्रवृत्ति कबीर में भी पाई जाती है। ज्ञान भक्ति की सतत्
साधना करते हुए भी कबीर ने अपना घरेलू व्यवसाय नहीं छोड़ा।२ कपड़ा बुनते समय
भी लौ उनकी राम से ही लगी रहती थी।
किंतु पैतृक व्यवसाय में सम्भवतः उनकी तबीयत नहीं लगती थी।३
१ रागनि रागउ सीवनि सीवउ ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥
भगति करउ हरि के गुन गावउ ।
आठ पहर अपना खसमु धियावउ ।
सुइने की सुई रुपेका धागा ।
नामेका चितु हरिसूं लागा ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८ ।
२. हम घर सूत तनहि नित ताना ।
—श्री गुर ग्रंथ साहब आसा, २६ ।
३ तनना बुनना तज्या कबीर राम नाम लिखि लिया सरीर ।
जब लग भरी नली वा वेहू तब लग टूटे राम सनेहु ॥
—श्री गुर ग्रन्थ साहब गूज, २ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६३
(२) भेदभाव विहीनता—नामदेव वर्ण व्यवस्था में विश्वास नही करते थे ।
भक्ति के क्षेत्र मे जाति पाँति के झगड़े को वे निरर्थक समझते थे । उनकी वाणी में यह
बात अनेक स्थलों पर ध्वनित की गई है । उन्होने स्पष्ट रूप से कहा है—'मैं जाति-पाँति
को लेकर क्या करूॅ ? मै तो रात दिन राम नाम का जप करता हूँ ।'१
'हिंदू अन्धा है और मुसलमान काना । इन दोनो में ज्ञानी चतुर है । मै तो ऐसे
भगवान् की आराधना करता हूँ जो न मंदिर में है और न मसजिद में ।'२
अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त इस बात का अनुसरण कबीर ने भी किया है ।
जाति व्यवस्था जीवोत्पत्ति की दृष्टि से अप्राकृतिक है । कबीर कहते हैं—'यदि सिरजन-
हार ने चार वर्णों के भेद का विचार किया है तो जन्म से ही यह एक समान सब के
साथ भौतिक, दैहिक और दैविक ये तीन दण्ड क्यो लगा देता ? कोई हल्का ( छोटा )
नही है, जिसके मुख में राम नाम नही है वह छोटा है ।'३
सन्तो की जाति नही होती । सभी जातियो में सन्त हुए हैं । सभी लोगो को
सन्तो के चरित्र से शिक्षा लेनी चाहिए ।४
सभी मानवो को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, हिन्दू या मुसलमान नही होना
है । ये विषमता पैदा करने वाले मानवीय रूप है । ये रूप हरिजन-रूप या भक्त-रूप से
तुच्छ है । भक्त के समान ये नही है ।'५
१. का करौ जाती का करौं पाँती ।
राजाराम सेऊँ दिन राती ॥ टेक ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १८ ।
२. हिंदू अन्हा तुरकू काणा । दोहाने गिआनी सिआणा ॥१॥
हिंदू पूजै देहुरा मुसलमानु मसीत ॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०८ ।
३. जो मै करता वरण विचारे,
तो जनमत तीनि डाँडि किन सारे ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद ४१, पृ० १०१ ।
४. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृ० ४८ ।
५. अवरन वरन न गनिय रंक धनि, विमल बास निज सोई ।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैस सूद्र सब गत समान न कोई ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृ० १०५
२६४ नामदेव की हिन्दी कविता
(३) ब्रह्म की निर्गुणता—प्रसिद्ध है कि सन्त नामदेव पहले मूर्ति-पूजक और
सगुणोपासक थे किन्तु बाद में वे कट्टर निर्गुणवादी हो गये। वे ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप
में विश्वास करते थे। इस निर्गुण स्वरूप का वर्णन उन्होंने अनेक प्रकार से अनेक
स्थलों पर किया है। उस निर्गुण का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं—'वह निर्गुण ब्रह्म
अनेक और एक सब कुछ है। सर्वत्र उसी का प्रकाश दिखाई पड़ता है।'¹
'मैं जिधर भी जाता हूँ उधर भगवान् है जो परमानन्द में लीन हो सदैव
लीलाएँ करता है। नामदेव कहते हैं—'हे भगवान् ! पृथ्वी के जल थल आदि सभी
स्थानों में तुम व्याप्त हो। इधर भगवान् है, उधर भगवान् है, भगवान् के बिना संसार
में कुछ भी नही है।'²
'प्रत्येक जीव के हृदय में भगवान् है। हाथी और चींटी एक ही मिट्टी के बने
हैं। ये सब उसी भगवान् के अदीय पात्र हैं।'³
निर्गुण ब्रह्म का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैं कि उसके किसी प्रकार का
रूपाकार नही है। उसके 'रूप अरूप' भी नही है। वह पुष्प की सुगन्ध से सूक्ष्म अनुपम
तत्त्व है।⁴
कबीर ने अपने ब्रह्म को अनेक निर्गुणतावाचक विशेषणों से विशिष्ट किया है।
वे कहते हैं—'वह अलख है, निराकार है, उसका कोई स्थूल रूप नहीं है, उसका आदि
भी नहीं, अंत भी नहीं। वह उत्पन्न भी नहीं होता, नष्ट भी नहीं होता। समझ में
१. एक अनेक बिआपक पूरन जत देखउ तत सोई ।
माइया चित्र विचित्र विमोहित विरला बूकै कोई ।
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंद बिनु नहि कोई ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५० ।
२. जत्र जाउँ तत्र बीठल भैला । बीठलियो राजाराम देवा ॥ टेक ॥
ईभै बीठलु उभे बीठलु बीठल बिनु ससार नही ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६१ ।
३. राम बोले राम बोले राम बिना को बोले रे भाई ॥ टेक ॥
ऐकल मीटी कुंजर चीटी भाजन रे बहु नाना ।
पाँवर जंगम कीट पतंगा सब घटि राम समाना ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६ ।
४. जाके मुंह माथा नही नाहि रूप अरूप ।
पुहुप वास ते पातरा, ऐसा तत्त्व अनूप ॥
—कबीर वचनावली, पृ० १ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६५
नही आता कि उसका वर्णन किस प्रकार किया जाय ।'१
वह गुण-रहित है, उसका नाम नही रखा जा सकता वह 'गुन विहूँन' है ।२
(४) सर्वात्मभाव और अद्वैतवाद—नामदेव में इन दोनों वादों की प्रतिष्ठा दृढ़
भूमिका पर पाई जाती है । उनके अनुसार परमात्मा सारे संसार में व्याप्त हैं । वे कहते
हैं—'हे परमात्मा ! जिससे सारे संसार की उत्पत्ति हुई है ऐसे तुम सारे संसार में
व्याप्त हो । संसार के लोगों ने माया से अभिभूत होकर उस सर्वव्यापी परमात्मा को
भुला दिया अन्यथा तुम घट-घट-वासी हो ।'३
'वास्तव में प्राणि-मात्र में परमात्मा का वास है । क्या स्थावर जंगम, क्या
कीट पतंग, सब में वह व्याप्त है ।'४
'मै जहाँ जाता हूँ केवल तुझे देखता । तू जल, थल, काष्ट, पाषाण, निगम,
आगम, वेद तथा पुराणो में भी है ।'५
अद्वैतवाद के लिए हम नामदेव की निम्नलिखित पंक्तियां उद्धृत कर सकते हैं—
'लोग मनुष्य द्वारा निर्मित मूर्ति के आगे नाचते हैं और स्वयंभू परमात्मा को भुला देते
[
२६६ नामदेव की हिन्दी कविता
'रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख । एक ही
ईश्वर घट घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है ।' १
कबीर में भी सर्वत्र सर्वात्मवाद और अद्वैतवाद का प्रतिपादन मिलता है । कबीर
ब्रह्म को सर्वत्र व्याप्त तो कहते ही है वे ब्रह्म में जगत् को भी व्याप्त बताते है । जगत्
उसमें और वह जगत् में दोनों एक दूसरे में ओतप्रोत है ।' २
'वह ब्रह्म व्यापक है, सब मे एक भाव स व्याप्त है । पडित हो या योगी, राजा
हो या प्रजा, सबमें वह आप रम रहा और सब उसमें रम रहे है । यह जो नाना
भाँति का प्रपंच दिखाई दे रहा है, अनेक घट, जनम भांडे दिख रहे है, सब कुछ उसी
का रूप है ।' ३
अपने ब्रह्म की अद्वैतता सिद्ध करने के लिए कबीर ने उसकी अखण्डता एव
एकरसता पर विशेष जोर दिया है । वे कहते— 'जब वह अद्वैत तत्त्व अविहृड, एक रस
और अखण्ड है तो अवश्य ही पूर्ण होना चाहिए ।' ४
प्रतिबिंबवाद का आधार लेकर कबीर कहते है—'जलाशय के किनारे बैठे
मनुष्य को लहरदार जल में जैसे अपने कई प्रतिबिंब दिखाई देते है, उसी प्रकार आत्मा
स्वयंभू देवकी सेवा जाने । तो दिव दिष्टी ह्वै सकल पिछाने ॥
नामदेव भणै मेरे यही पूजा । आतमाराम अवर नही दूजा ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २० ।
१. कहत नामदेऊ हरि को रचना देखहु रिदै विचारी ।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १५० ।
२. खालिक खलक खलक में खालिक सब घट रह्यो समाई ।
कहै कबीर मैं पूरा पाया सब घटि साहिब दीठा ॥
—कबीर ग्रन्थावली पद ५१, पृ० १०४ ।
३. व्यापक ब्रह्म सबनि मै एकै, को पंडित को जोगी ।
राणा राव कवन सूं कहिये, कवन वेद को रोगी ॥
इनमें आप आप सबहिन मै आप थापसूं खेलै ।
नाना भाँति घड़े सब भांडे, रूप धरे धरि मेलै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद १८६, पृ० १५१ ।
४. आदि मध्य और अन्त लौं अविहड सदा अभंग ।
कबीर उस कर्ता की सेवक तजै न सत ॥
—कबीर ग्रन्थावली, अविहढ कौ अंग । पृ० ८६ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६७
भी एक है जो अनेक दिखाई देती है ।'१
कबीर इससे भी आगे बढ़ कर कहते हैं—'सकल विश्व में आत्म तत्त्व के
अतिरिक्त कोई दूसरा पदार्थ अन्त-तम अस्तित्व के रूप में है ही नहीं । केवल आत्मा
पारमार्थिक सत्य है ।'२
(५) अनन्य प्रेम साधना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । नामदेव की रचना में सर्वत्र अनन्य प्रेम
साधना को महत्त्व दिया गया है । वे कहते है—'राम की वंदना करने पर मैं और किसी
की वंदना न करूँगा । यदि मेरा लौकिक जीवन नष्ट हो जाता है तो अपना पारमार्थिक
जीवन क्यों नष्ट करूँ ? मै अपनी रसना से राम-रसायन का परम स्वाद लूँगा ।'३
जिस निधि के लिये मैं त्रिभुवन का चक्कर काट कर आया वह मुझे अपने हृदय
में ही मिली । नामदेव कहते हैं—तुमको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं । अपने घर
बैठकर तुम राम-नाम का जप करो ।'४
सचमुच उनके हृदय मे सब कुछ है । 'माला हृदय में है तथा गोपाल भी मेरे
हृदय में हैं । संसार का पालनहार दीन दयाल परमात्मा भी मेरे हृदय में है । मेरे हृदय
में वह दीप जल रहा है जिसके आलोक से सारा संसार आलोकित है ।'५
१. ज्यूँ जल मै प्रतिब्यंब, त्यूँ सकल रामहि जाणोजे ।
—कबीर ग्रंथावली, विचार कौ अंग, पृ० ५६ ।
२. हम सब माँहि सकल हम माँही हमथैं और दूसरा नाही ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २०० ।
३. राम जुहारि न और जुहारौ । जीवनि जाइ जनम कव हारौं ?
आन देव सौं दोज न भाषौ । राम रसाइन रसना चाषौ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये ।
सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहै कहूँ आइये न जाइये ।
अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
५. हिरदै माला हिरदै गोपाला । हिरदै बिंणि कौ दीन दयाला ॥ टेक ॥
हिरदै दीपक घटि उजियाला । फूटि किवार टूटि गयो ताला ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
२६८ नामदेव की हिन्दी कविता
अपने इस सत्यान्वेषण के आधार पर वे डंके की चोट पर यह निर्णय देते हैं—
'ऐ लोगो ! करोड़ो उपाय करने पर तुम्हे मुक्ति न मिलेगी। मुक्ति पाने का राम-नाम
के स्मरण बिना कोई अन्य मार्ग नहीं है।'¹ संत नामदेव की वाणी का यही मूल
भाव है।
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेम भावना को नामदेव के ढंग पर बरताया है। वे
कहते हैं— हे अनेक गुणो से विभूषित ईश्वर ! कबीर का एकमात्र तुझसे ही प्रेम है।
यदि मै तुझे छोड़कर किसी अन्य से प्रेम करूँ तो वह मुँह पर स्याही लगाने के
समान है।'²
अपने साँई के प्रति कबीर की भक्ति अडिग है। वे राम के कुत्ते के रूप में अपना
परिचय देते नही लजाते । 'मै राम का स्वामिभक्त कुत्ता हूँ और मेरा नाम मोतो है।
मेरे गले में राम नाम की रस्सी है। राम जिधर मुझे खींचता है उधर ही मै चलता
हूँ।'³ आत्मसमर्पण की यह हद है।
कबीर जिस साँई की साधना करते थे वह मुफत की बातों से हाथ नही आता
था। उस राम से सिर देकर ही सौदा किया जा सकता था।⁴
कबीर भक्त और पतिव्रता को एक कोटि में रखते थे। दोनों का धर्म कठोर है,
दोनों की वृत्ति कोमल है। वे कहते हैं—'मेरे नेत्रों में राम की तसवीर बनी हुई है।
उनमें और किसी के लिए स्थान नहीं है। कोई पतिव्रता सिंदूर की रेखा को छोड़कर
काजल की रेखा अपनी माँग में कैसे लगा सकती है ?'⁵
१. राम भगति बिन गति न तिरत को। कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६२ ।
२. कबीर प्रीतड़ी तो तुझ सौ बहु गुणियाले कंत ।
जे हँसि बोलौ और सौं तौ नील रंगाऊँ दंत ॥
—कबीर ग्रंथावली निष्कर्मी पतिव्रता कौ अंग, पृ० १८ ।
३. कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउँ ।
गले राम की जेवड़ी जित खैंचै तित जाउँ ॥
—कबीर ग्रंथावली, निष्कर्मी पतिव्रता को अंग, पृ० २० ।
४. साँई सैंत न पाइये बातां मिलै न कोय ।
कबीर सौदा रामसों सिर बिन कदै न होय ॥
—सत्य कबीर साखी ८५ ।
५. कबीर रेख स्यंदूर की काजल दिया न जाइ ।
नैनूँ रमइया रमि रहया दूजा कहाँ समाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १६ ।
नामदेव : हिंदी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २६६
कबीर का अपने स्वामी पर अटल विश्वास है। कहते हैं—'मैं उस समर्थ का
सेवक हूँ जो महान् और असीम है। इसी कारण मेरा अनर्थ नही हो सकता। यदि
पतिव्रता नंगी रहेगी तो उसके स्वामी को ही लज्जा आयेगी ।'१
(६) निर्गुण भक्ति—भागवत में तो निर्गुण भक्ति सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। नाम-
देव में यही निर्गुण भक्ति भावना पाई जाती है।
नामदेव कहते हैं—'हे परमात्मा ! तेरी गति तू ही जानता है; मैं अल्प मति
तेरा क्या बखान करूँ ? तू वैसा नहीं है जैसा कि तेरा वर्णन किया जाता है।
तू जैसा है, वैसा है।'२
'जो परम सुख का निधान है उसको छोड़कर लोग अन्य धंधों में लग जाते
हैं। ये पत्थर की मूर्ति के आगे सजीव प्राणी की बलि चढ़ाते हैं। जिसके प्राण नहीं
उसको पूजते हैं। पत्थर को पूजा कर मनुष्य कुछ और ही हुआ है।'३
'मैं फूल तथा पत्तियों को चढ़ाकर परमात्मा की पूजा न करूँगा क्योंकि परमात्मा
मंदिर में नहीं है। नामदेव कहते हैं कि मैंने उसके चरणों पर आत्मसमर्पण कर दिया
है अतः मेरा पुनर्जन्म न होगा।'४
नामदेव के अनुसार वह परम तत्त्व ऐसा है जिसका न कोई रूप है, न रंग है,
न आकार है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।'५
१. उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होइ अकाज ।
पतिव्रता नांगी रहै तो उसही पुरिस कौ लाज ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २० ।
२. तेरी तेरो गति तूँ ही जानै । अल्प जीव गति कहा बखाने ।
जैसा तूँ कहिये वैसा तूँ नाही । जसा तूँ है तैसा आछि गुसाईं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४ ।
३. कहा करूँ जग देखत अंधा । तजि आनंद विचारे धंधा ॥ टेक ॥
पाहन आगे देव कटीला । याकौ प्राण नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारै । देखत जनम आपनौ हारै ॥
आंगणि देव पिछोड़हि पूजा । पाहन पूजि भए नर दूजा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।
४. पाती तोड़ि न पूजूं देवा । देवलि देव न होई ।
नामा कहै मैं हरि की सरना । पुनिरांव जनम न होई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६५ ।
५. कहै नामदेव परम तत है देता ।
जाके रूप न रेख वरण कहौ कैसा ॥ —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।
२७० नामदेव की हिन्दी कविता
वैरागी होकर मैं राम के गुण गाऊँगा। मैं उस परम तत्व के निवास स्थान
तक जाऊँगा जो वर्णनातीत अनहद नाद में रत है तथा अगम्य है।१
अपने मराठी के एक अभंग में नामदेव कहते हैं—'पत्थर की मूर्ति भक्तों के
साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।'२
कबीर की भक्ति भी निर्गुण भक्ति ही थी। कबीर ने ब्रह्म को निर्गुणवाचक
विशेषणों से युक्त करके उसका वर्णन किया है —'ब्रह्म आँखों से देखा नहीं जा सकता
अतः वह अलख है।'३ 'वह अत्यंत सुन्दर है, सदा सर्वदा रहने वाला है, वह अनुपम
है।'४ 'ब्रह्म का भेद पाना असंभव है, उसे इन्द्रियों से पाया नहीं जा सकता अतः वह
अगम और अगोचर है।'५
'ब्रह्म को अजर-अमर तो कहते ही हैं परन्तु वह अरूप है। उसे आँखों के द्वारा
देख पाना असंभव है, इसी से वह अलख है।'६
'वह सभी कर्मों से अलिप्त है, निर्भय है। उसका कोई आकार नहीं, वह निरा-
कार है।'७
१. बैरागी रामहि गाऊँगा ।
सब्द अतीत अनाहद राता । अकुला के घरि जाऊँगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६ ।
२. पाषाणाचा देव बोलत भक्तांतें ।
सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत मणी, पृ० १५० ।
३. अलख निरंजन लखै न कोई ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २३० ।
४. अविगत अकल अनुपम देखा कहतौ कह्या न जाई ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ६० ।
५. अगम अगोचर गमि नही तहाँ जगमगै जोति ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२ ।
६. अजरा अमरा कथै सब कोई ।
अलख न कथणा जाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १४६ ।
७. निरभय निराकार है सोई ।
कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २३०
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २७१
अंत में कबीर ने 'नेति नेति' का प्रश्रय लिया। वह ऐसा है, वैसा नहीं। इस
वाद विवाद पर समय व्यर्थ खर्च न करके उसका गुणगान करना ही श्रेयस्कर है।'१
(७) नाम साधना—यों तो नाम-साधना भक्ति के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही
प्रचलित है किंतु नामदेव ने उसको बहुत अधिक महत्त्व दिया था।
हरिनाम की महिमा अपार है। वही तो इस विश्व में एक तत्त्व है। नामदेव
कहते हैं—'हरि का नाम सारे संसार का सार है। मैंने हरिनाम रूपी नाव से भव-
सागर को पार किया।'२
'संसार माया है, तुम्हारा नाम सार-स्वरूप है। इस कलियुग में तुम्हारा नाम
एकमात्र आधार है।'३
हरि नाम ने संसार में साधारण काम नहीं किया है। 'हरि का नाम स्मरण
करने से कमला श्री विष्णु का दासी हुई। शंकर अविनाशी हुए, ध्रुव को अटल स्थान
प्राप्त हुआ और प्रह्लाद का उद्धार हुआ।'४
'राम का नाम लेने से किसका कलंक दूर नहीं हुआ? राम कहते ही, उनके
स्मरण मात्र से पापी जना का उद्धार हुआ।'५
नाम की इस महत्ता को देखकर नामदेव कहते हैं—'राम नाम रूपी पूँजी में
मैंने अपना सब कुछ लगा दिया। मुझे राम नाम से लो लगी! मैं उससे अनुरक्त
१. दीठा है तो कस कहूँ कहिया न कोई पतिआइ।
हरि जैसा है तैसा रहौ, तू हरषि हरषि गुण गाई॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ११८।
२. हरि नाँव सकल भुवन तत सारा।
हरि नाँव नामदेव उतरे पारा॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १।
३. सार तुम्हारा नाँव है झूठा सब संसार।
मनसा वाचा कर्मना कलि केवल नाव अधार॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१।
४. हरि नाव मै निज कवला दासी। हरि नावै संकर अविनासी।
हरि नाव मे ध्रू निश्चल कराया। हरि नाव मे प्रहलाद उधरीय॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४।
५. कोन के कलंक रह्यो राम नाम लेत हो।
पतित पावन भयो राम बहुत हो॥ टेक॥
—सत नामदेव की हिंदी पदाविली, पद २८।
२७२ नामदेव की हिन्दी कविता
हुआ ।'¹
'जिसके पास राम नाम रूपी धन हो उसे किस बात की कमी है ? अष्ट सिद्धि
तथा नव निधि उसकी सेवा में तत्पर है ।'²
यही कारण है कि नामदेव ने अपने मनको पूर्णत 'नाम' पर केंद्रित किया । वे
कहते है— मेरा मन राम नाम पर इस प्रकार केंद्रित हुआ है जिस प्रकार सुवर्णकार का
सोने की तुला पर होता है ।'³
'जब तक राम नाम के लिए हृदय म सच्चा प्रेम न हो, आकर्षण न हो तब
तक 'यह मेरा है' 'यह मेरा है' कहने कहते जीवन व्यर्थ जायगा ।'⁴
नाम साधना की दिसा मे कबीर ने नामदेव का पूरा अनुसरण किया । उन्होंने
भक्ति-क्षेत्र में नाम जप को विशेष महत्त्व दिया है । कबीर साहब हाथ उठाकर कहते
हैं—'राम का नाम लेने से ही भला होगा । मैने तो कहा ही है, ब्रह्मा और महेश ने
भी कहा है कि राम का नाम ही जीवन में सार तत्त्व है ।'⁵
कबीर उस नाम स्मरण को सबसे बढ़कर मानते हैं जो मनसा, वाचा व कर्मणा
किया जाय ।⁶
१. राम नाम मेरे पूँजी धना ।
ता पूँजी मेरो लागो मना ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२८ ।
२. रामसा धन ताको कहा अब थोरी ।
अठ सिद्धि नव निधि करत निहोरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३ ।
३. ऐसै मन राम नामै बेधिला । जसै कनक तुला चित राखिला ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
४. जो लग राम नामै हित न भयो ।
तो लग मेरो मेरो करता जनम गयो ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
५. कबीर कहता जात हूँ सुणता है सब कोई ।
राम कहे भला होइगा नहि तर भला न होइ ॥
कही कहै मैं कहि गया, कहि गया ब्रह्म महेस ।
राम नाँव तन सार है सब काहू उपदेस । —कबीर ग्रन्थावली पृ० ४, ५, ।
६ भगति भजन हरि नांव है दूजा दुक्ख अपार ।
मनसा वाचा क्रमना कबीर सुमिरण सार ॥ —कबीर ग्रंथावली, पृ० ५ ।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७३
कबीर ने स्पष्ट घोषणा की है कि समस्त साधनो का सार तत्त्व सुमिरन ही
है । धर्म, उपासना और साधना के समस्त अंग नाम सुमिरन की समानता नही कर
सकते ।१
कबीर ने भगवान की शरण में जाकर नाम-जप करने का उपदेश दिया है ।२
कबीर ने नाम रस का वर्णन प्रेम रस और राम रस के रूप में किया है ।
उन्होने नाम-रस का प्याला पीने का अनुरोध किया है ।३
कबीर कहते है—नाम स्मरण के बिना जप, तप, ध्यान सब झूठ हैं ।४
कबीर के अनुसार भक्त को अखंड नाम-जप करना चाहिए ।५
किन्तु नाम-स्मरण ऐसा न हो कि मुँह मे तो राम का नाम हो और मन विषयो
का ध्यान करे । राम का स्मरण तो सभी करते है लेकिन उसकी भी अनेक विधियाँ हैं ।
उसी राम के नाम का उच्चारण साध्वी और पतिव्रता भी करती है और तमाशबीन
भी करते है । जिस प्रकार आग का नाम मात्र लेने से मनुष्य जलता नही उसी प्रकार
राम का नाम लेने से वह मुक्त नही हो जाता । उसे राम के सत्य स्वरूप की अनुभूति
कर लेनी चाहिए ।६
१. कबीर सुमिरन सार है और सकल जंजाल ।
—कबीर साखी संग्रह पृ० ६६ ।
२. कहत कबीर सुनहु रे प्रानौ छाड़इ मन के भरमा ।
केवल नाम जपहु रे प्रानी परहु एक की सरना ॥
—कबीर ग्रन्थावली पृ० २६७ ।
३. पी ले प्याला हो मतवाला । प्याला नाम अमी रस का ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृ० ५३ ।
४. हरि बिन झूठे सब व्योहार केते कोऊ करो गंवार ।
झूठा जप, तप झूठो ग्यान, राम नाम बिन झूठा ध्यान ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १७४ ।
५. काम परे हरि सिमिरिये ऐसा सिमरो नित ।
अमरापुर बासा करहु हरि गया बहोरै चित ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २५० ।
६. राम नाम सबको कहै, कहिबे बहुत विचार ।
सोई राम सती कहे सोई कौलिगहार ॥
आगि कह्या दाझे नही जे नही चंपै पाइ ।
जब लग भेद न जाणिये राम कहया तो काइ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद १२२, पृ० १२७ ।
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