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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 332 में से

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पृष्ठ 251

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २५७
अनेक ऐसे पद हैं जिनके संबंध में निर्णय करना अभी शेष है।
ये हस्तलिखित प्रतियाँ, जो विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुई हैं और नामदेव की
हिंदी पदों की परंपरा तथा नामदेव के पश्चात् होनेवाले हिंदी संत कवियों द्वारा नामदेव
की प्रशस्ति निश्चित रूप से यह प्रमाणित करती है कि नामदेव ने हिंदी में कविता की
थी और वह भी नमूने के लिए नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में।
नामदेव की उपलब्ध हिंदी पदावलियों में डॉ० भगीरथ मिश्र तथा डॉ० राज-
नारायण मौर्य द्वारा संपादित तथा पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की
हिंदी पदावली' अद्यतन और प्रमाणित पदावली है। इस पदावली में नामदेव के २३०
पद तथा १३ साखियां संग्रहीत हैं।
पर्याप्त काल तक बहुत को यह विदित न था कि नामदेव ने हिंदी में भी रचना
की है। हिंदी जगत् में इनकी रचनाओं का प्रचार पर्याप्त मात्रा में नहीं था। जहाँ
संतों की रचनाएँ संकलित की जाती थीं वहाँ नामदेव की रचनाओं को भी स्थान दिया
जाता था। इसका प्रमाण है सैकड़ों की संख्या में पाये जाने वाले नामदेव के हस्तलिखित
ग्रंथ।
इन सभी तथ्यों पर विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नामदेव
की हिंदी रचनाएँ अल्प मात्रा में उपलब्ध होने के कारण उनको वह प्रधानता न मिल
सकी जो कबीर को मिली। इस संदर्भ में आचार्य विनयमोहन शर्मा की सम्मति उल्ले-
खनीय है।¹
कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव
हिंदी साहित्य में कबीर से अधिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व रखनेवाला कोई दूसरा
कवि नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व को क्रांतिकारी बनाने वाली वे परिस्थितियाँ हैं जिनमें
उन्होंने जन्म लिया और जिनमें उन्हें जीना और मरना पड़ा। इन परिस्थितियों
१. यह सत्य है कि कबीर के समान नामदेव की हिंदी रचनाएँ प्रचुर मात्रा में नहीं
मिलतीं परन्तु जो कुछ भी प्राप्त हैं उनमें उत्तर भारत की संत परंपरा का पूर्व
आभास मिलता है और उनके परवर्ती संतों पर निश्चय ही उनका प्रभाव पड़ा है
जिसे उन्होंने मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। ऐसी दशा में उन्हें उत्तर भारत में
निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक मानने में हमें कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। संभवतः,
हिंदी जगत् तक उनके संबंध में पर्याप्त जानकारी न पहुँच सकने के कारण उन्हें
वह स्थान नहीं प्राप्त हो सका, जिसके वे अधिकारी हैं।
—हिंदी को मराठी संतों की देन, पृष्ठ १२६।
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