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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 332 में से

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पृष्ठ 252

२५८ नामदेव की हिन्दी कविता
के आलोक में ही हम इस तथ्य को हृदयंगम कर सकते हैं कि कबीर ने क्यों अपनी प्रखर
भाषा और तीखी भाव-व्यंजना से ऐसे काव्य का सृजन किया जो साहित्यिक मर्यादा की
चिंता न करते हुए साहित्य और धर्म में युगान्तर लाने वाला सिद्ध हुआ ।
कबीर को क्रांतिकारी बनाने वाली परिस्थितियां
वस्तुत कबीर के जन्म के समय राजनीति, समाज और धर्म में सर्वत्र एक अशान्ति
और अव्यवस्था की स्थिति थी । राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुसलमानों के आतंक से
पीड़ित हिंदू जनता राजाओं का भरोसा छोड़कर हताश हो गई थी और अपने को ईश्वर
के अधीन कर बैठी थी । धार्मिक दृष्टि से देखें तो नाथ पंथियों और सिद्धों ने रहस्यात्मक
और चमत्कारात्मक तंत्र मंत्र आदि के प्रचार द्वारा जनता को धर्म पथ से हटा दिया
था । तीर्थयात्रा, व्रत, पथ, स्नान आदि की निःसारता बताकर ये लोग जनता को
ईश्वर प्राप्ति का एक ही मार्ग दिखला रहे थे और वह था हठयोग तथा अन्य शारीरिक
क्रियाएं । भक्ति और प्रेम जैसी कोमल भावनाओं का इनके लिए कोई महत्व नहीं था ।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो हिंदू मुसलमानों में पारस्परिक कलह और कटुता के बीज
मौजूद थे । संकीर्णता, द्वेष और अविश्वास से दोनों ओर खिंचाव था ।
ऐसी विषम परिस्थिति में एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो कलह के
कुहरे को चीरता हुआ सूरज की भांति प्रकाशित होकर किंकर्तव्य विमूढ जनता को
नवीन मार्ग पर ले जाय । निरीह और निष्प्राण जनता को आत्मविश्वास और मनुष्यता
के प्रति श्रद्धा और विश्वास से सशक्त बनाकर परिस्थिति का सामना करने के लिए
खड़ा कर दे । कबीर ऐसे ही युग द्रष्टा पुरुष थे ।
कबीर के व्यक्तित्व, उनके धार्मिक आदर्शों, समाज के प्रति उनका पक्षपात रहित
स्पष्ट दृष्टिकोण तथा उनकी कथन शैली पर नाभादास के इस छप्पय में सम्यक् प्रकाश
डाला गया है ।¹ भक्ति रहित धर्म को कबीर ने अधर्म कहा और भजन के बिना तप,
योग, दान, व्रत आदि सब को तुच्छ बताया । उन्होंने हिंदू मुसलमान दोनों के लिए
१. भक्ति विमुख जो धरम ताहि अधरम करि गायो ।
जोग, जग्य, जप, दान, भजन बिनु तुच्छ दिखायो ॥
हिंदू तुरक प्रमान रमैनी सबदी साखी ।
पक्षपात नहिं वचन सबंहि के हित की भाखी ॥
आरुढ दसा ह्वै जगत पर मुख देखी नाहिन भनी ।
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षठ दरसनी ॥
भक्तमाल (नाभादास) पृष्ठ ४६१ ।