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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 332 में से

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पृष्ठ 263

नामदेव : हिंदी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २६६
कबीर का अपने स्वामी पर अटल विश्वास है। कहते हैं—'मैं उस समर्थ का
सेवक हूँ जो महान् और असीम है। इसी कारण मेरा अनर्थ नही हो सकता। यदि
पतिव्रता नंगी रहेगी तो उसके स्वामी को ही लज्जा आयेगी ।'१
(६) निर्गुण भक्ति—भागवत में तो निर्गुण भक्ति सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। नाम-
देव में यही निर्गुण भक्ति भावना पाई जाती है।
नामदेव कहते हैं—'हे परमात्मा ! तेरी गति तू ही जानता है; मैं अल्प मति
तेरा क्या बखान करूँ ? तू वैसा नहीं है जैसा कि तेरा वर्णन किया जाता है।
तू जैसा है, वैसा है।'२
'जो परम सुख का निधान है उसको छोड़कर लोग अन्य धंधों में लग जाते
हैं। ये पत्थर की मूर्ति के आगे सजीव प्राणी की बलि चढ़ाते हैं। जिसके प्राण नहीं
उसको पूजते हैं। पत्थर को पूजा कर मनुष्य कुछ और ही हुआ है।'३
'मैं फूल तथा पत्तियों को चढ़ाकर परमात्मा की पूजा न करूँगा क्योंकि परमात्मा
मंदिर में नहीं है। नामदेव कहते हैं कि मैंने उसके चरणों पर आत्मसमर्पण कर दिया
है अतः मेरा पुनर्जन्म न होगा।'४
नामदेव के अनुसार वह परम तत्त्व ऐसा है जिसका न कोई रूप है, न रंग है,
न आकार है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।'५
१. उस संम्रथ का दास हौं, कदे न होइ अकाज ।
पतिव्रता नांगी रहै तो उसही पुरिस कौ लाज ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २० ।
२. तेरी तेरो गति तूँ ही जानै । अल्प जीव गति कहा बखाने ।
जैसा तूँ कहिये वैसा तूँ नाही । जसा तूँ है तैसा आछि गुसाईं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४ ।
३. कहा करूँ जग देखत अंधा । तजि आनंद विचारे धंधा ॥ टेक ॥
पाहन आगे देव कटीला । याकौ प्राण नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारै । देखत जनम आपनौ हारै ॥
आंगणि देव पिछोड़हि पूजा । पाहन पूजि भए नर दूजा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।
४. पाती तोड़ि न पूजूं देवा । देवलि देव न होई ।
नामा कहै मैं हरि की सरना । पुनिरांव जनम न होई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६५ ।
५. कहै नामदेव परम तत है देता ।
जाके रूप न रेख वरण कहौ कैसा ॥ —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।