सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ नामदेव की हिन्दी कविता
हुआ ।'¹
'जिसके पास राम नाम रूपी धन हो उसे किस बात की कमी है ? अष्ट सिद्धि
तथा नव निधि उसकी सेवा में तत्पर है ।'²
यही कारण है कि नामदेव ने अपने मनको पूर्णत 'नाम' पर केंद्रित किया । वे
कहते है— मेरा मन राम नाम पर इस प्रकार केंद्रित हुआ है जिस प्रकार सुवर्णकार का
सोने की तुला पर होता है ।'³
'जब तक राम नाम के लिए हृदय म सच्चा प्रेम न हो, आकर्षण न हो तब
तक 'यह मेरा है' 'यह मेरा है' कहने कहते जीवन व्यर्थ जायगा ।'⁴
नाम साधना की दिसा मे कबीर ने नामदेव का पूरा अनुसरण किया । उन्होंने
भक्ति-क्षेत्र में नाम जप को विशेष महत्त्व दिया है । कबीर साहब हाथ उठाकर कहते
हैं—'राम का नाम लेने से ही भला होगा । मैने तो कहा ही है, ब्रह्मा और महेश ने
भी कहा है कि राम का नाम ही जीवन में सार तत्त्व है ।'⁵
कबीर उस नाम स्मरण को सबसे बढ़कर मानते हैं जो मनसा, वाचा व कर्मणा
किया जाय ।⁶
१. राम नाम मेरे पूँजी धना ।
ता पूँजी मेरो लागो मना ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२८ ।
२. रामसा धन ताको कहा अब थोरी ।
अठ सिद्धि नव निधि करत निहोरी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३ ।
३. ऐसै मन राम नामै बेधिला । जसै कनक तुला चित राखिला ॥ टेक ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
४. जो लग राम नामै हित न भयो ।
तो लग मेरो मेरो करता जनम गयो ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
५. कबीर कहता जात हूँ सुणता है सब कोई ।
राम कहे भला होइगा नहि तर भला न होइ ॥
कही कहै मैं कहि गया, कहि गया ब्रह्म महेस ।
राम नाँव तन सार है सब काहू उपदेस । —कबीर ग्रन्थावली पृ० ४, ५, ।
६ भगति भजन हरि नांव है दूजा दुक्ख अपार ।
मनसा वाचा क्रमना कबीर सुमिरण सार ॥ —कबीर ग्रंथावली, पृ० ५ ।