सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 267, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २७३
कबीर ने स्पष्ट घोषणा की है कि समस्त साधनो का सार तत्त्व सुमिरन ही
है । धर्म, उपासना और साधना के समस्त अंग नाम सुमिरन की समानता नही कर
सकते ।१
कबीर ने भगवान की शरण में जाकर नाम-जप करने का उपदेश दिया है ।२
कबीर ने नाम रस का वर्णन प्रेम रस और राम रस के रूप में किया है ।
उन्होने नाम-रस का प्याला पीने का अनुरोध किया है ।३
कबीर कहते है—नाम स्मरण के बिना जप, तप, ध्यान सब झूठ हैं ।४
कबीर के अनुसार भक्त को अखंड नाम-जप करना चाहिए ।५
किन्तु नाम-स्मरण ऐसा न हो कि मुँह मे तो राम का नाम हो और मन विषयो
का ध्यान करे । राम का स्मरण तो सभी करते है लेकिन उसकी भी अनेक विधियाँ हैं ।
उसी राम के नाम का उच्चारण साध्वी और पतिव्रता भी करती है और तमाशबीन
भी करते है । जिस प्रकार आग का नाम मात्र लेने से मनुष्य जलता नही उसी प्रकार
राम का नाम लेने से वह मुक्त नही हो जाता । उसे राम के सत्य स्वरूप की अनुभूति
कर लेनी चाहिए ।६
१. कबीर सुमिरन सार है और सकल जंजाल ।
—कबीर साखी संग्रह पृ० ६६ ।
२. कहत कबीर सुनहु रे प्रानौ छाड़इ मन के भरमा ।
केवल नाम जपहु रे प्रानी परहु एक की सरना ॥
—कबीर ग्रन्थावली पृ० २६७ ।
३. पी ले प्याला हो मतवाला । प्याला नाम अमी रस का ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृ० ५३ ।
४. हरि बिन झूठे सब व्योहार केते कोऊ करो गंवार ।
झूठा जप, तप झूठो ग्यान, राम नाम बिन झूठा ध्यान ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १७४ ।
५. काम परे हरि सिमिरिये ऐसा सिमरो नित ।
अमरापुर बासा करहु हरि गया बहोरै चित ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २५० ।
६. राम नाम सबको कहै, कहिबे बहुत विचार ।
सोई राम सती कहे सोई कौलिगहार ॥
आगि कह्या दाझे नही जे नही चंपै पाइ ।
जब लग भेद न जाणिये राम कहया तो काइ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद १२२, पृ० १२७ ।
१८