सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 253, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २५६
साखी, सबद और रमैनी की रचना की और बिना पक्षपात किये, बिना किसी की
तरफदारी किये सब के हित की बातें कही अर्थात् मानव मात्र के हित की बातें उन्होंने
कहीं। सारे संसार पर छा गये परंतु किसी के दबाव में आकर उन्होंने मुंह-देखी नहीं
कही, किसी की ठाकुर-सुहाती नहीं की। कबीर ने परंपरा से चले आये चार वर्ग, चार
आश्रम, छह दर्शन किसी को स्वीकार नहीं किया।
सच तो यह है कि कबीर अपना घर फूंक कर लाठी लेकर बाजार में आकर
खड़े हो गये थे और उन्होंने अपने साथ आने वालों को भी वैसा ही करने की सम्मति
दी थी ।१ यही नहीं वे शब्द-प्रमाण की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव को अधिक महत्त्व देते
थे ।२ वे प्रेम के उपासक थे। इस कारण उनको पाखंड और ढोंग से चिढ़ हो गई थी।
भक्त या संत को जैसा होना चाहिए उसके विपरीत लोग आडम्बर के फेर में पड़कर
जनता को पथ भ्रष्ट कर रहे थे।
कबीर जैसा भक्त जो सभी प्रकार के धार्मिक, सामाजिक और शास्त्रीय बंधनों
का तिरस्कार कर के 'मानव धर्म' की प्रतिष्ठा करना चाहता था, उस आडम्बर का
विरोध किए बिना कैसे रह सकता था जो मनुष्य के लोक-परलोक को बिगाड़ने वाला
था। यही कारण था कि कबीर ने उस भक्ति काल में, जिसमें 'मो सम कौन कुटिल
खल कामी' कहने वाले सूर तथा 'तू दयालु दीन हौं' कहने वाले तुलसी तथा उनके जैसे
अनेक भक्त कवि विनयशीलता तथा आत्मभर्त्सना का प्रदर्शन कर रहे थे, अपनी सार-
ग्राहिणी प्रतिभा और तर्क-व्यंग्य-मय अभिव्यक्ति से धार्मिक और सामाजिक जीवन पर
पड़े हुए आडम्बर के पर्दे को छिन्न भिन्न कर दिया।
कबीर स्वभाव से फक्कड़ थे। अच्छा हो या बुरा, खरा हो या खोटा जिससे
एक बार चिपट गये उसमें जिंदगी भर चिपटे रहे, यह सिद्धांत उन्हें मान्य नहीं था।
वे सत्य के जिज्ञासु थे और कोई मोह-ममता उन्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर
सकती थी।
कबीर स्वाधीन-चिंता के पुरुष थे। उन्होंने समय का प्रवाह देखकर धर्म और
देश के उपकार के लिए जो बातें उचित और उपयोगी समझीं उनको अपने विचारों पर
आरूढ़ होकर निर्भीक चित्त से कहा। झूठे संस्कारों के कारण लोग नाना प्रकार के कर्म
१. हम घर जारा आपना, लिया मुराडा हाथ ।
अब घर जालौं तासुका जो चले हमारे साथ ॥
—संत कबीर की साखी ५।८ ।
२. मै कहता हौं आँखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे ॥
संक्षिप्त संत सुधा-सार पृष्ठ ५६