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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 332 में से

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पृष्ठ 257

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६३
(२) भेदभाव विहीनता—नामदेव वर्ण व्यवस्था में विश्वास नही करते थे ।
भक्ति के क्षेत्र मे जाति पाँति के झगड़े को वे निरर्थक समझते थे । उनकी वाणी में यह
बात अनेक स्थलों पर ध्वनित की गई है । उन्होने स्पष्ट रूप से कहा है—'मैं जाति-पाँति
को लेकर क्या करूॅ ? मै तो रात दिन राम नाम का जप करता हूँ ।'१
'हिंदू अन्धा है और मुसलमान काना । इन दोनो में ज्ञानी चतुर है । मै तो ऐसे
भगवान् की आराधना करता हूँ जो न मंदिर में है और न मसजिद में ।'२
अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त इस बात का अनुसरण कबीर ने भी किया है ।
जाति व्यवस्था जीवोत्पत्ति की दृष्टि से अप्राकृतिक है । कबीर कहते हैं—'यदि सिरजन-
हार ने चार वर्णों के भेद का विचार किया है तो जन्म से ही यह एक समान सब के
साथ भौतिक, दैहिक और दैविक ये तीन दण्ड क्यो लगा देता ? कोई हल्का ( छोटा )
नही है, जिसके मुख में राम नाम नही है वह छोटा है ।'३
सन्तो की जाति नही होती । सभी जातियो में सन्त हुए हैं । सभी लोगो को
सन्तो के चरित्र से शिक्षा लेनी चाहिए ।४
सभी मानवो को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, हिन्दू या मुसलमान नही होना
है । ये विषमता पैदा करने वाले मानवीय रूप है । ये रूप हरिजन-रूप या भक्त-रूप से
तुच्छ है । भक्त के समान ये नही है ।'५
१. का करौ जाती का करौं पाँती ।
राजाराम सेऊँ दिन राती ॥ टेक ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १८ ।
२. हिंदू अन्हा तुरकू काणा । दोहाने गिआनी सिआणा ॥१॥
हिंदू पूजै देहुरा मुसलमानु मसीत ॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०८ ।
३. जो मै करता वरण विचारे,
तो जनमत तीनि डाँडि किन सारे ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद ४१, पृ० १०१ ।
४. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृ० ४८ ।
५. अवरन वरन न गनिय रंक धनि, विमल बास निज सोई ।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैस सूद्र सब गत समान न कोई ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृ० १०५