सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ नामदेव की हिन्दी कविता
अपने इस सत्यान्वेषण के आधार पर वे डंके की चोट पर यह निर्णय देते हैं—
'ऐ लोगो ! करोड़ो उपाय करने पर तुम्हे मुक्ति न मिलेगी। मुक्ति पाने का राम-नाम
के स्मरण बिना कोई अन्य मार्ग नहीं है।'¹ संत नामदेव की वाणी का यही मूल
भाव है।
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेम भावना को नामदेव के ढंग पर बरताया है। वे
कहते हैं— हे अनेक गुणो से विभूषित ईश्वर ! कबीर का एकमात्र तुझसे ही प्रेम है।
यदि मै तुझे छोड़कर किसी अन्य से प्रेम करूँ तो वह मुँह पर स्याही लगाने के
समान है।'²
अपने साँई के प्रति कबीर की भक्ति अडिग है। वे राम के कुत्ते के रूप में अपना
परिचय देते नही लजाते । 'मै राम का स्वामिभक्त कुत्ता हूँ और मेरा नाम मोतो है।
मेरे गले में राम नाम की रस्सी है। राम जिधर मुझे खींचता है उधर ही मै चलता
हूँ।'³ आत्मसमर्पण की यह हद है।
कबीर जिस साँई की साधना करते थे वह मुफत की बातों से हाथ नही आता
था। उस राम से सिर देकर ही सौदा किया जा सकता था।⁴
कबीर भक्त और पतिव्रता को एक कोटि में रखते थे। दोनों का धर्म कठोर है,
दोनों की वृत्ति कोमल है। वे कहते हैं—'मेरे नेत्रों में राम की तसवीर बनी हुई है।
उनमें और किसी के लिए स्थान नहीं है। कोई पतिव्रता सिंदूर की रेखा को छोड़कर
काजल की रेखा अपनी माँग में कैसे लगा सकती है ?'⁵
१. राम भगति बिन गति न तिरत को। कोटि उपाइ जु करही रे नर ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६२ ।
२. कबीर प्रीतड़ी तो तुझ सौ बहु गुणियाले कंत ।
जे हँसि बोलौ और सौं तौ नील रंगाऊँ दंत ॥
—कबीर ग्रंथावली निष्कर्मी पतिव्रता कौ अंग, पृ० १८ ।
३. कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाउँ ।
गले राम की जेवड़ी जित खैंचै तित जाउँ ॥
—कबीर ग्रंथावली, निष्कर्मी पतिव्रता को अंग, पृ० २० ।
४. साँई सैंत न पाइये बातां मिलै न कोय ।
कबीर सौदा रामसों सिर बिन कदै न होय ॥
—सत्य कबीर साखी ८५ ।
५. कबीर रेख स्यंदूर की काजल दिया न जाइ ।
नैनूँ रमइया रमि रहया दूजा कहाँ समाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १६ ।