सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव की हिंदी रचनाएं बहुत कम उपलब्ध हैं। ६२ पद तो 'गुरु ग्रन्थ साहिब'
में मिलते हैं तथा कुछ और मिलाकर हिंदी पदों की संख्या २३० तक हो जाती है।
विद्वानों का अनुमान है कि इनकी मराठी रचनाएं युवावस्था की हैं और हिन्दी रचनाएँ
वृद्धावस्था की हैं। कहते हैं कि नामदेव अपनी युवावस्था म सगुणोपासक थे और बाद
में निर्गुणवादी हो गये। उनके हिन्दी पदों में उनकी निर्गुणवादिता स्पष्ट हो जाती है।
नामदेव और उनकी रचनाओ का कबीर और उनकी बानी पर स्पष्ट प्रभाव दिखाई
देता है। संक्षेप में नामदेव ने कबीर को निम्नलिखित बातें विरासत के रूप में मिली
हुई जान पड़ती है क्योंकि दोनों ही में वे समान रूप में मिलती हैं—
(१) कर्म और वैराग्य का समन्वय—नामदेव भारत के प्राचीन संतों के समान
कोरे वैरागी न थे। अपनी जीविका का काम करते हुए हरि भजन या नाम स्मरण करते
रहना वे आवश्यक समझते थे। अपने एक पद म नामदेव कहते हैं—'मैं कपड़ा रंगने
और सीवने का काम करता हूँ। घड़ी भर के लिए भी भगवन्नाम विस्मृत नही करता
हूँ। मैं भगवद् भक्ति करता हूँ और उनके गुणों का गान करता हूँ। आठो पहर मैं
अपने स्वामी के ध्यान में मग्न रहता हूँ। मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है,
मेरा चित्त भगवान से लगा हुआ है।'
नामदेव की यह प्रवृत्ति कबीर में भी पाई जाती है। ज्ञान भक्ति की सतत्
साधना करते हुए भी कबीर ने अपना घरेलू व्यवसाय नहीं छोड़ा।२ कपड़ा बुनते समय
भी लौ उनकी राम से ही लगी रहती थी।
किंतु पैतृक व्यवसाय में सम्भवतः उनकी तबीयत नहीं लगती थी।३
१ रागनि रागउ सीवनि सीवउ ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥
भगति करउ हरि के गुन गावउ ।
आठ पहर अपना खसमु धियावउ ।
सुइने की सुई रुपेका धागा ।
नामेका चितु हरिसूं लागा ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८ ।
२. हम घर सूत तनहि नित ताना ।
—श्री गुर ग्रंथ साहब आसा, २६ ।
३ तनना बुनना तज्या कबीर राम नाम लिखि लिया सरीर ।
जब लग भरी नली वा वेहू तब लग टूटे राम सनेहु ॥
—श्री गुर ग्रन्थ साहब गूज, २ ।