सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६७
भी एक है जो अनेक दिखाई देती है ।'१
कबीर इससे भी आगे बढ़ कर कहते हैं—'सकल विश्व में आत्म तत्त्व के
अतिरिक्त कोई दूसरा पदार्थ अन्त-तम अस्तित्व के रूप में है ही नहीं । केवल आत्मा
पारमार्थिक सत्य है ।'२
(५) अनन्य प्रेम साधना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । नामदेव की रचना में सर्वत्र अनन्य प्रेम
साधना को महत्त्व दिया गया है । वे कहते है—'राम की वंदना करने पर मैं और किसी
की वंदना न करूँगा । यदि मेरा लौकिक जीवन नष्ट हो जाता है तो अपना पारमार्थिक
जीवन क्यों नष्ट करूँ ? मै अपनी रसना से राम-रसायन का परम स्वाद लूँगा ।'३
जिस निधि के लिये मैं त्रिभुवन का चक्कर काट कर आया वह मुझे अपने हृदय
में ही मिली । नामदेव कहते हैं—तुमको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं । अपने घर
बैठकर तुम राम-नाम का जप करो ।'४
सचमुच उनके हृदय मे सब कुछ है । 'माला हृदय में है तथा गोपाल भी मेरे
हृदय में हैं । संसार का पालनहार दीन दयाल परमात्मा भी मेरे हृदय में है । मेरे हृदय
में वह दीप जल रहा है जिसके आलोक से सारा संसार आलोकित है ।'५
१. ज्यूँ जल मै प्रतिब्यंब, त्यूँ सकल रामहि जाणोजे ।
—कबीर ग्रंथावली, विचार कौ अंग, पृ० ५६ ।
२. हम सब माँहि सकल हम माँही हमथैं और दूसरा नाही ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २०० ।
३. राम जुहारि न और जुहारौ । जीवनि जाइ जनम कव हारौं ?
आन देव सौं दोज न भाषौ । राम रसाइन रसना चाषौ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये ।
सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहै कहूँ आइये न जाइये ।
अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।
५. हिरदै माला हिरदै गोपाला । हिरदै बिंणि कौ दीन दयाला ॥ टेक ॥
हिरदै दीपक घटि उजियाला । फूटि किवार टूटि गयो ताला ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६ ।