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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 332 में से

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पृष्ठ 260

२६६ नामदेव की हिन्दी कविता
'रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख । एक ही
ईश्वर घट घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है ।' १
कबीर में भी सर्वत्र सर्वात्मवाद और अद्वैतवाद का प्रतिपादन मिलता है । कबीर
ब्रह्म को सर्वत्र व्याप्त तो कहते ही है वे ब्रह्म में जगत् को भी व्याप्त बताते है । जगत्
उसमें और वह जगत् में दोनों एक दूसरे में ओतप्रोत है ।' २
'वह ब्रह्म व्यापक है, सब मे एक भाव स व्याप्त है । पडित हो या योगी, राजा
हो या प्रजा, सबमें वह आप रम रहा और सब उसमें रम रहे है । यह जो नाना
भाँति का प्रपंच दिखाई दे रहा है, अनेक घट, जनम भांडे दिख रहे है, सब कुछ उसी
का रूप है ।' ३
अपने ब्रह्म की अद्वैतता सिद्ध करने के लिए कबीर ने उसकी अखण्डता एव
एकरसता पर विशेष जोर दिया है । वे कहते— 'जब वह अद्वैत तत्त्व अविहृड, एक रस
और अखण्ड है तो अवश्य ही पूर्ण होना चाहिए ।' ४
प्रतिबिंबवाद का आधार लेकर कबीर कहते है—'जलाशय के किनारे बैठे
मनुष्य को लहरदार जल में जैसे अपने कई प्रतिबिंब दिखाई देते है, उसी प्रकार आत्मा
स्वयंभू देवकी सेवा जाने । तो दिव दिष्टी ह्वै सकल पिछाने ॥
नामदेव भणै मेरे यही पूजा । आतमाराम अवर नही दूजा ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २० ।
१. कहत नामदेऊ हरि को रचना देखहु रिदै विचारी ।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
—सं० ना० हि० प०, पद १५० ।
२. खालिक खलक खलक में खालिक सब घट रह्यो समाई ।
कहै कबीर मैं पूरा पाया सब घटि साहिब दीठा ॥
—कबीर ग्रन्थावली पद ५१, पृ० १०४ ।
३. व्यापक ब्रह्म सबनि मै एकै, को पंडित को जोगी ।
राणा राव कवन सूं कहिये, कवन वेद को रोगी ॥
इनमें आप आप सबहिन मै आप थापसूं खेलै ।
नाना भाँति घड़े सब भांडे, रूप धरे धरि मेलै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद १८६, पृ० १५१ ।
४. आदि मध्य और अन्त लौं अविहड सदा अभंग ।
कबीर उस कर्ता की सेवक तजै न सत ॥
—कबीर ग्रन्थावली, अविहढ कौ अंग । पृ० ८६ ।