सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६५
नही आता कि उसका वर्णन किस प्रकार किया जाय ।'१
वह गुण-रहित है, उसका नाम नही रखा जा सकता वह 'गुन विहूँन' है ।२
(४) सर्वात्मभाव और अद्वैतवाद—नामदेव में इन दोनों वादों की प्रतिष्ठा दृढ़
भूमिका पर पाई जाती है । उनके अनुसार परमात्मा सारे संसार में व्याप्त हैं । वे कहते
हैं—'हे परमात्मा ! जिससे सारे संसार की उत्पत्ति हुई है ऐसे तुम सारे संसार में
व्याप्त हो । संसार के लोगों ने माया से अभिभूत होकर उस सर्वव्यापी परमात्मा को
भुला दिया अन्यथा तुम घट-घट-वासी हो ।'३
'वास्तव में प्राणि-मात्र में परमात्मा का वास है । क्या स्थावर जंगम, क्या
कीट पतंग, सब में वह व्याप्त है ।'४
'मै जहाँ जाता हूँ केवल तुझे देखता । तू जल, थल, काष्ट, पाषाण, निगम,
आगम, वेद तथा पुराणो में भी है ।'५
अद्वैतवाद के लिए हम नामदेव की निम्नलिखित पंक्तियां उद्धृत कर सकते हैं—
'लोग मनुष्य द्वारा निर्मित मूर्ति के आगे नाचते हैं और स्वयंभू परमात्मा को भुला देते
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