सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 250

२५६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर की रचना और पाठ निर्णय का अभी पहला प्रयास डॉ० पारसनाथ तिवारी
(प्रयाग) द्वारा हो पाया है तब नामदेव की प्राप्त रचनाओं की प्रामाणिकता का निर्णय
और भी कठिन माना जा सकता है। वास्तविक बात यह है कि संत नामदेव की
रचनाओं का अभी तक हिंदी संसार को पता नहीं था। 'ग्रन्थ साहब' के ६१ पद ही
अभी तक नामदेव की संपूर्ण हिंदी रचना समझी जाती रही है।
आचार्य विनयमोहन शर्मा ने अपनी पुस्तक 'हिंदी को मराठी संतों की देन' में
११ और पद दिये हैं जो 'ग्रन्थ साहब' से भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त संत नामदेव की
गाथा में १०३ हिंदुस्तानी पद हैं जिनमें कुछ ग्रन्थ साहब के हैं और कुछ दूसरे। किंतु
नामदेव की हिंदी रचनाएँ इतनी ही नहीं हैं। मुझे विभिन्न प्रकाशित और हस्तलिखित
प्रतियों से कुल ३०० पद नामदेव के प्राप्त हुए हैं। हस्तलिखित प्रतियां नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी, सेंट्रल पब्लिक लायब्रेरी, पटियाला, बाबा नामदेवजी का गुरुद्वारा घुमान
(गुरदासपुर), पंढरपुर, पूना विश्वविद्यालय आदि स्थानों से प्राप्त हुई हैं। कुछ
प्रतियाँ जयपुर में भी हैं जिन्हें देखने का अभी तक अवसर नहीं मिला। रज्जब की
'सर्वङ्गी' में भी नामदेव के ५० से ऊपर पद संग्रहीत हैं। और भी अनेक संत वाणियों
के संग्रहों में नामदेव के पद पाये जाते हैं।
देखना यह है कि इन रचनाओं में प्रामाणिकता कहाँ तक है। 'गुरु ग्रंथ साहब'
का संकलन १६०४ में हुआ। नामदेव की रचना सम्बन्धी यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ
अब तक माना गया है। मुझे एक हस्तलिखित प्रति सन् १६५८ ई० की देखने को मिली
है। जिसमें नामदेव के पदों की संख्या १२८ है। यही सबसे पुरानी प्रति अभी तक
मिली है। इसके अतिरिक्त १८ वीं, १६ वीं शताब्दी की कई प्रतियाँ भी मिली हैं। पाठ
की दृष्टि से 'गुरु ग्रन्थ साहब' का पाठ सबसे भ्रष्ट है। इसके कुछ पद तो अभी तक
कहीं भी नहीं प्राप्त हुए हैं। जैसे अन्य संत कवियों के नाम पर बहुत सी रचनाएँ
प्रसिद्ध हो गई हैं वैसे नामदेव के नाम पर भी हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर पाठमात्र
के आधार पर लगभग १५० पद निश्चित ही नामदेव के हैं। ५० पद ऐसे हैं जो आधे
मराठी के, आधे हिंदी के हैं या सम्पूर्ण मराठी के भ्रष्ट रूप में हैं और शेष ५० अभी तक
संदिग्ध हैं। उनमें से कुछ गोरखनाथ, कबीर आदि के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
उदाहरणार्थ—
'देवा बेन बाजे, गगन गाजे, शब्द अनाहद बोले ।।' यह पद कबीर ग्रन्थावली
(ना० प्र० स०) के पद १६६ पृ० १४४ से बिल्कुल मिलता-जुलता है। कबीर की
पाठ समस्या पर काम करने वाले डॉ० पारसनाथ तिवारी ने इसे कबीर की प्रामाणिक
रचना नहीं माना है। गुरु ग्रन्थ साहब में प्राप्त पद १६ 'तीन छंद धेनु बाछै' गोरख-
बानी (डॉ० बड़थ्वाल द्वारा संपादित) के पद ४२ से मिलता-जुलता है। इस प्रकार