सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० नामदेव की हिन्दी कविता
वादो में फँसे हुए थे, आडम्बरमूलक नाना प्रकार के आचारों-व्यवहारों को धर्म समझ
रहे थे । उनमे यह बात नहीं देखी गई । उन्होने उनके विरुद्ध अपना प्रबल स्वर ऊँचा
किया, बड़े साहस के साथ केवल अपने आत्मबल के सहारे उनका सामना किया ।
मसजिद पर बाग देते हुए मुल्ला पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं कि खुदा क्या
बहरा है जो तू इतनी ऊँची आवाज से बाँग दे रहा है ।१
यदि खुदा मसजिद में ही रहता है तो शेष विश्व किसका है ?२
अहिंसावादी कबीर मुसलमानों में प्रचलित 'खतना' को भी पसंद नही करते ।३
इस्लाम धर्म और समाज की बुराइयों पर कुठाराघात कर वे हिन्दू धर्म और
समाज की ओर मुडते है । हिंदू धर्म के तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा आदि से उन्हें बेहद
चिढ़ है।
कबीर साहब कहते है कि पत्थर की पूजा करने से यदि परमात्मा की प्राप्ति
होगी तो मै पहाड़ की पूजा करूंगा ।४
सिर मुड़ाकर सन्यासी होने वाला पर भी उन्होने व्यंग्य किया है ।५
चारो वर्णों में श्रेष्ठ ब्राह्मण को भी वे नही छोड़ते ।६
१. काँकर पाथर जोरिके मसजिद लई चुनाय ।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे (क्या) बहिरा हुआ खुदाय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ६६ ।
२. जो रे खुदाय मसीति बसत है ओर मुलिक किस केरा ?
—संक्षिप्त-संत-सुधा सार, पृष्ठ ४० ।
३. जो तूँ तुरक तुरकनी जाया ।
तो भीतर खतना कयूँ न कराया ?
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार पृष्ठ ३४ ।
४. पाहन पूजे हरि मिले तो मै पूजौं पहार ।
ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार ॥
—साखी संग्रह, पृष्ठ १८३ ।
५. मूँड मुँडाये हरि मिले सब कोई लेइ मुडाइ ।
बार बार के मूँडने भेड़ न बैकुंठ जाइ ॥
६. जे तूं बामन बमनी जाया तो आन बाट काहे नहिं आया ?
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ५३ ।