सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २७१
अंत में कबीर ने 'नेति नेति' का प्रश्रय लिया। वह ऐसा है, वैसा नहीं। इस
वाद विवाद पर समय व्यर्थ खर्च न करके उसका गुणगान करना ही श्रेयस्कर है।'१
(७) नाम साधना—यों तो नाम-साधना भक्ति के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही
प्रचलित है किंतु नामदेव ने उसको बहुत अधिक महत्त्व दिया था।
हरिनाम की महिमा अपार है। वही तो इस विश्व में एक तत्त्व है। नामदेव
कहते हैं—'हरि का नाम सारे संसार का सार है। मैंने हरिनाम रूपी नाव से भव-
सागर को पार किया।'२
'संसार माया है, तुम्हारा नाम सार-स्वरूप है। इस कलियुग में तुम्हारा नाम
एकमात्र आधार है।'३
हरि नाम ने संसार में साधारण काम नहीं किया है। 'हरि का नाम स्मरण
करने से कमला श्री विष्णु का दासी हुई। शंकर अविनाशी हुए, ध्रुव को अटल स्थान
प्राप्त हुआ और प्रह्लाद का उद्धार हुआ।'४
'राम का नाम लेने से किसका कलंक दूर नहीं हुआ? राम कहते ही, उनके
स्मरण मात्र से पापी जना का उद्धार हुआ।'५
नाम की इस महत्ता को देखकर नामदेव कहते हैं—'राम नाम रूपी पूँजी में
मैंने अपना सब कुछ लगा दिया। मुझे राम नाम से लो लगी! मैं उससे अनुरक्त
१. दीठा है तो कस कहूँ कहिया न कोई पतिआइ।
हरि जैसा है तैसा रहौ, तू हरषि हरषि गुण गाई॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ११८।
२. हरि नाँव सकल भुवन तत सारा।
हरि नाँव नामदेव उतरे पारा॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १।
३. सार तुम्हारा नाँव है झूठा सब संसार।
मनसा वाचा कर्मना कलि केवल नाव अधार॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५१।
४. हरि नाव मै निज कवला दासी। हरि नावै संकर अविनासी।
हरि नाव मे ध्रू निश्चल कराया। हरि नाव मे प्रहलाद उधरीय॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४।
५. कोन के कलंक रह्यो राम नाम लेत हो।
पतित पावन भयो राम बहुत हो॥ टेक॥
—सत नामदेव की हिंदी पदाविली, पद २८।