सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० नामदेव की हिन्दी कविता
वैरागी होकर मैं राम के गुण गाऊँगा। मैं उस परम तत्व के निवास स्थान
तक जाऊँगा जो वर्णनातीत अनहद नाद में रत है तथा अगम्य है।१
अपने मराठी के एक अभंग में नामदेव कहते हैं—'पत्थर की मूर्ति भक्तों के
साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।'२
कबीर की भक्ति भी निर्गुण भक्ति ही थी। कबीर ने ब्रह्म को निर्गुणवाचक
विशेषणों से युक्त करके उसका वर्णन किया है —'ब्रह्म आँखों से देखा नहीं जा सकता
अतः वह अलख है।'३ 'वह अत्यंत सुन्दर है, सदा सर्वदा रहने वाला है, वह अनुपम
है।'४ 'ब्रह्म का भेद पाना असंभव है, उसे इन्द्रियों से पाया नहीं जा सकता अतः वह
अगम और अगोचर है।'५
'ब्रह्म को अजर-अमर तो कहते ही हैं परन्तु वह अरूप है। उसे आँखों के द्वारा
देख पाना असंभव है, इसी से वह अलख है।'६
'वह सभी कर्मों से अलिप्त है, निर्भय है। उसका कोई आकार नहीं, वह निरा-
कार है।'७
१. बैरागी रामहि गाऊँगा ।
सब्द अतीत अनाहद राता । अकुला के घरि जाऊँगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६ ।
२. पाषाणाचा देव बोलत भक्तांतें ।
सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत मणी, पृ० १५० ।
३. अलख निरंजन लखै न कोई ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २३० ।
४. अविगत अकल अनुपम देखा कहतौ कह्या न जाई ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ६० ।
५. अगम अगोचर गमि नही तहाँ जगमगै जोति ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२ ।
६. अजरा अमरा कथै सब कोई ।
अलख न कथणा जाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १४६ ।
७. निरभय निराकार है सोई ।
कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २३०