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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 332 में से

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पृष्ठ 255

नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्त्ता २६१
शूद्रों के अधिकार का भी उन्होंने समर्थन किया ।¹
उन्होंने सब तरह के धार्मिक और सामाजिक जीवन की पक्षपात-रहित आलो-
चना की है । वे मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं देखते थे ।²
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए
उसकी विशेषताओं पर भली भांति प्रकाश डाला है ।³
कबीर के समय में भारत अगणित विभिन्न धार्मिक मतों एवं उनके उप-संप्रदायों
का बोलबाला था । प्रत्येक मत अपने मत के सामने अन्य मतों को हेय समझता था ।
इस समाज में दंभ, पाखंड और सामाजिक विशृंखलता का साम्राज्य छा रहा था ।
कबीर समाज के सजग प्रहरी थे । उन्होंने वर्ण-व्यवस्था, अवतारवाद, बाह्याडम्बर आदि
का अपनी निर्भय एवं कठोर वाणी द्वारा खण्डन किया और एक सामान्य सत्य का स्वरूप
उपस्थित कर उसे सुधारने का प्रयत्न किया । ऐसा करने में उन्होंने पूर्ण निष्पक्षता से
काम लिया ।
कबीर साहब के सत्य कथन का बड़ा प्रभाव रहा । उन्होंने जैसी क्रांतिकारी
बातें कही, एक युग दृष्टा ही कह सकता है । जनसाधारण को यदि ऐसा लगता था कि
सन्त साहित्य में ऐसी बातें पहली बार कही जा रही है तो इसमें आश्चर्य की कोई
बात नहीं ।
नामदेव और कबीर की रचनाओं की तुलना
वास्तविक रूप से यदि कबीर और नामदेव की रचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन
किया जाय तो दोनों की विचारधारा में अद्भुत साम्य दिखाई देता है ।
१. एक जोति थे सब उपजानां, को बामन, को सूदा ?
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २१० ।
२. सांई के सब जीव हैं कीडी कुंजर दोई ।
जात पांत पूछे नहि कोई, हरिको भजै सो हरिका होई ।
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ११५ ।
३. 'ऐसे थे कबीर । सिर से पैर तक मस्त मौला, स्वभाव से फक्कड़ आदत से अक्खड़,
भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचंड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त,
भीतर के कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय । वे जो कुछ
कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे, इसीलिए उनकी उक्तियां वेधने वाली
और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे ।
—कबीर, पृष्ठ १६७ ।