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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 332 में से

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पृष्ठ 248

२५४ नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदी रचनाएँ भी पर्याप्त मात्रा में नही थी फिर भी 'श्री गुरु ग्रन्थ' में महत्त्वपूर्ण स्थान
पाने की अधिकारी हुई ।
यहाँ एक बात और विचारणीय है । जिस समय 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' का
संकलन हुआ था, उसका स्वरूप सांप्रदायिक नहीं था । गुरु अर्जुनदेव ने तत्कालीन
प्रसिद्ध संतो की रचनाओ का संग्रह किसी विशिष्ट सांप्रदायिक आधार पर नही किया
था । यदि इसमें जरा भी सांप्रदायिक भावना होती तो नानक तथा गुरुओ के अतिरिक्त
अन्य संतो के पद संगृहीत न होते ।
'श्री गुरु ग्रंथ साहब' में प्राप्त होनेवाले संत नामदेव के ६१ पद उसमें किस स्रोत
से आये यह अभी तक ज्ञात नही हो सका है । वैसे नामदेव की हिंदी रचना सम्बन्धी
'श्री गुरु ग्रन्थ' ही सबसे प्राचीन प्रमाण है । अन्य हस्तलिखित ग्रंथ जो प्राप्त हुए है वे
उसके बाद के ही हैं । यद्यपि लगभग ४०० वर्ष पूर्व संकलित होने के कारण इसका पाठ
अधिक विश्वसनीय होना चाहिए था पर दुर्भाग्यवश ऐसा नही है । नामदेव की रचना
संबंधी जितनी मुद्रित और अमुद्रित प्रतियां अब तक प्राप्त हुई है उनमें 'श्री गुरु ग्रन्थ' का
पाठ सबसे अधिक स्वच्छंद है । इस स्वच्छंदता पर आश्चर्य भी होता है क्योकि धर्म ग्रंथ
होने के कारण इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नही किया गया । यदि शुद्ध अशुद्ध
लिखे है तो अन्य प्रति मे भी वैसे ही लिखे गये । इस संदर्भ में डॉ० पारसनाथ तिवारी
का मत दृष्टव्य है । १ किन्तु 'गुरु ग्रन्थ' के कम से कम नामदेव के पदों का पाठ देखकर
इसकी प्राचीनता पर संदेह होने लगता है । यह जाँच करना आवश्यक है कि 'गुरु ग्रन्थ
साहब' अपने संकलन के साथ ही स्थायित्व को प्राप्त हो गया था या बाद में उसको
स्थायित्व मिला । इसमे कोई संदेह नही कि इसका संकलन सिक्खो के पांचवें गुरु अर्जुन
सिंह ने किया है जिनका काल ई० स० १५६३-१६०६ माना जाता है ।
परन्तु 'गुरु ग्रंथ साहब' को उसी समय स्थायित्व प्राप्त नही हुआ । गुरु गोविद-
सिंह (ई० स० १६७५-१७०८) ने आगे चलकर इसमें कुछ वृद्धि भी की और कुछ
रचनाओ को हटा भी दिया । उन्होने मूल 'ग्रन्थ साहब' का पूरा पाठ भाई मनीसिंह को
बैठा कर लिखवाया था और उसमें गुरु तेग बहादुर की भी कुछ रचनाएँ सम्मिलित
कर ली थी । इसी के साथ कुछ नये संतों की रचनाएँ भी सम्मिलित कर ली गई होगी ।
गुरु गोविन्दसिंह जैसे प्रतिभाशाली और महत्त्वाकांक्षी कवि के लिए यह स्वाभाविक भी
१. 'गुरु ग्रन्थ साहब' का प्रकाशित संस्करण जो हमारे सामने है निरापद रूप से सं०
१६६१ की मूल प्रति का प्रतिरूप माना जा सकता है । ॰॰॰वह किसी सम्पादक या
लिपिकर्त्ता द्वारा न तो शोधा गया है और न परिवर्तित किया गया है ।'
—कबीर ग्रंथावली, पृ० ७२ ।